Wednesday, 20 February 2019

‘कश्मीर : कल, आज और कल’ : "दूसरा शनिवार" समूह का कार्यक्रम 17.2.2019 को पटना में संपन्न

कश्मीर के इतिहास को वस्तुनिष्ठ तरीके से समझने की जरूरत 
"कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल" के लेखक अशोक कुमार पांडेय का व्याख्यान और उस पर चर्चा


दिनांक 17 फरवरी 2019 को दोपहर दो बजे – पटना के माध्यमिक शिक्षक संघ भवन का सभागार आगत लेखकों, पाठकों एवं जिज्ञासु श्रोताओं से जीवंत हो रहा था। ‘दूसरा शनिवार’ के महत्वपूर्ण आयोजन में "कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल" के लेखक अशोक कुमार पांडेय का व्याख्यान होना था। विषय था - "कश्मीर : कल, आज और कल"।

पटना एवं अन्य जगहों से आये श्रोताओं में कर्मेन्दु शिशिर, अवधेश प्रीत, जितेन्द्र कुमार, अनिल विभाकर, प्रभात कुमार, मुकेश प्रत्युष, अरुण सिंह, पुरुषोत्तम, प्रशांत विप्लवी, राजेश कमल, सुनील श्रीवास्तव, अभय कुमार शर्मा, नताशा, समता राय, रीतिका सिंह, मंजीत कुमार सिंह, श्रीधर करुणानिधि, विद्या भूषण, योगेश प्रताप शेखर, अरुण नारायण, प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा, नरेन्द्र कुमार, अस्मुरारी नंदन मिश्र, श्यामकिशोर प्रसाद, आदित्य कमल, अरविंद पासवान, रणविजय सिंह, मनोज कुमार, सत्येन्द्र कुमार, अरुण शीतांश, संजय कुमार कुंदन, शाहनवाज, उत्कर्ष, शशांक मुकुट शेखर, जफर इकबाल, धनंजय कुमार, उमेश कुमार राय, ध्रुव कुमार, रहमान, राकेश कुमार कश्यप, संतोष कुमार मनमोहन, केशव कौशिक, अमीर हमजा, संतोष झा, अरविंद कुमार, डॉ. बी. एन. विश्वकर्मा, मनजीत कुमार, संजीव, जयप्रकाश एवं अन्य कई लोग शामिल थे।

व्याख्यान और चर्चा के इस कार्यक्रम का संचालन किया लेखक अस्मुरारी नंदन मिश्र ने। कार्यक्रम की शुरुआत में पुलवामा एवं राजौरी हमले में शहीद हुए जवानों एवं साहित्यकार अर्चना वर्मा के निधन पर उनकी स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। उसके पश्चात अस्मुरारी नंदन मिश्र ने लेखक अशोक कुमार पांडेय का परिचय देते हुए उनकी कृति ‘कश्मीरनामा’ की विशेषताओं पर बात की। उन्होंने कहा कि यह एक संग्रहणीय किताब है जिसमें मिथकों से समकालीन इतिहास तक की यात्रा है। उसके पश्चात उन्होंने अशोक कुमार पांडेय को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया।

अशोक कुमार पांडेय ने अपनी बात युसुफशाह चक से शुरू की  जिसकी कब्र देखने वे नालन्दा जिले के बेशवक गाँव गये थे। उन्होंने कहा कि वह चक साम्राज्य का आखिरी स्वतंत्र राजा था तथा दिल्ली बुलाकर उसे अकबर ने गिरफ्तार करा लिया। यह दिल्ली द्वारा कश्मीर को दिया गया पहला धोखा था। उन्होंने कहा कि कश्मीर दक्षिणी एशिया का ऐसा पूरा भूभाग है जिसका इतिहास लिखित है। इसके उद्भव को बताती तीन मिथकीय कथायें हैं - हिन्दू, बौद्ध एवं इस्लाम के दृष्टिकोण से। हमें इतिहास पढ़ते हुए सावधान रहना चाहिए क्योंकि जो सत्ता में होता है वह ऐसा आख्यान लिखाना चाहता है जो उसके लिये अनुकूल हो। कश्मीर को लेकर अबतक जितने भी इतिहास लेखन हुए हैं, उनका मुख्य आधार धर्म को बनाया गया है। जाहिर है हिन्दू और मुसलमान के आधार पर विभाजित कर लिखे गए इस इतिहास लेखन में वहाँ के समाज की सामूहिक स्मृतियाँ गायब रहीं हैं। मेरा कहना यह है कि कश्मीर पर जो भी इतिहास पढ़े उस लेखक की अवस्थिति (लोकेशन) को जरुर ध्यान रखें, तभी आप वस्तुनिष्ठ तरीके से अपनी समझ विकसित कर पाएँगे।

उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर का शुरुआती 400-500 साल का इतिहास उतना विश्वसनीय नहीं है। कल्हण ने इसकी शुरुआत की जो कल्पना और समझ से भरा था। आप अभिनवगुप्त को जाने बिना कश्मीर के इतिहास को नहीं समझ सकते। राजतरंगिणी के रचयिता कल्हण के पिता हर्ष के राज्य में ऊँचे पद पर थे, इस कारण अवस्थिति (लोकेशन) वहाँ भी मायने रखती है। राजतरंगिणी कश्मीर के कुलीन (एलीट) समाज का इतिहास है। कश्मीर को जानने के लिए वहाँ के भूगोल को समझना भी जरूरी है।

उन्होंने हिन्दू, बौद्ध एवं इस्लाम धर्मों एवं उनके संरक्षक राजाओं द्वारा बनते-बिगड़ते कश्मीर पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने चक साम्राज्य के पतन की चर्चा करते हुए कहा कि मुस्लिम सामंतों ने कश्मीरी पंडितों पर भरोसा किया क्योंकि सत्ता में उनका स्टेक (दाँव) नहीं था। इस प्रकार राजस्व व्यवस्था कश्मीरी पंडितों के हाथ में जाना शुरू हो गया । कश्मीरी ब्राह्मण समाज का सारा जोर नौकरी पर होता है तथा इसके लिए वे देशी रजवाड़ों में जाते रहते हैं। श्रीनगर में अंग्रेजों के हस्तक्षेप के समय शासन की भाषा फ़ारसी की जगह उर्दू कर दी जाती है जो फ़ारसी के जानकार कश्मीरी पंडितों को मंजूर नहीं होता है। वे पंजाब, उत्तरप्रदेश, बंगाल से लाये गये लोगों के विरुद्ध ग़ैरमुल्की आंदोलन चलाते हैं, पर मुसलमान इसमें शामिल नहीं थे। फिर नागरिकता कानून बनता है जिसमें नौकरी एवं जमीन खरीदने की सहूलियत लोकल लोगों को दी जाती है। शिक्षा का विस्तार होता जा रहा था पर राज्य जनता की आकांक्षा पूरी करने में सक्षम नहीं होती है। फिर साम्प्रदायिक  विभाजन होने लगता है। सूफी संस्कृति टूटने लगती है और कट्टर इस्लामिक परंपरा जन्म लेती है। वहाँ ‘नियंत्रित प्रजातंत्र’ चलता है तथा केंद्र समर्थित पक्ष जीतता रहता है। इस कारण विपक्ष का लोकतंत्र से विश्वास उठता चला जाता है। नब्बे के दशक के बाद स्थिति उलझती चली जाती है। अटल बिहारी वाजपेयी के काल में सकारात्मक पहल होती है और दोनों पक्षों में बात शुरू होती है, पर यह अपना आकार नहीं ले पाती है।

उन्होंने अंत में कहा कि भरोसा बंदूकों से नहीं बातचीत से ही स्थापित होता है। अगर कर पाये तो आगे बात बनेगी, नहीं तो ??

पूरे व्याख्यान में श्री पांडेय ने विस्तारपूर्वक कश्मीर के अतीत, वर्तमान और आनेवाले कल के बारे में बतलाया। उन्होंने उपस्थित श्रोताओं के प्रश्नों के जवाब भी दिये। श्रोताओं में योगेश प्रताप शेखर, धनञ्जय कुमार, अरविंद पासवान, अरुण सिंह ने अपनी जिज्ञासाएं रखीं।

व्याख्यान पर बात करते हुए कर्मेंदु शिशिर ने कहा कि श्री पांडेय ने कश्मीर के बारे में प्रचलित लीक से हटकर काम किया है। हिंदी में लोग इस तरह का काम कर रहे हैं। ज्यादातर इतिहासकार की दृष्टि डॉक्टर की तरह होती है। साहित्यकार ऐसा नहीं करता। वह जब इतिहास की साहित्य के नजरिये से देखता है तो इतिहासकार का कद बहुत छोटा हो जाता है। कश्मीरनामा को पाठ सुख के लिए भी पढ़ना चाहिए।

आरा से आये जितेंद्र कुमार ने कहा कि कश्मीर के समकाल की अपनी अलग व्याख्या के लिए यह किताब चर्चित रही है। उन्होंने कहा कि कश्मीरनामा के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय ने कश्मीर के दो हजार वर्षों के इतिहास और संस्कृति को बहुत संतुलित और वस्तुनिष्ठ ढंग से पटना के प्रबुद्ध श्रोताओं के सामने रखा।”

कथाकार अवधेश प्रीत का कहना था कि कश्मीर को आंकड़ों और उद्धरणों वाले नज़रिये से जानने की बजाय लोक, समाज, स्मृतियों और इतिवृत को समय, संवेदना और मनुष्यता की कसौटी पर देखने का प्रयास सराहनीय है। अशोक कुमार पांडेय ने कई धुंध साफ की, कई भ्रम निष्प्रभावी किये।

लेखक मुकेश प्रत्युष का कहना था कि वाकई यह एक सार्थक आयोजन था। ऐसे आयोजनों की जरूरत बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही थी।

विमर्श के इस गहन दौर के लंबा खिंच जाने के कारण सामूहिक काव्य-पाठ का द्वितीय सत्र नहीं करवाया जा सका। अंत में ‘दूसरा शनिवार’ की तरफ से धन्यवाद ज्ञापन प्रत्यूष चन्द्र मिश्र के द्वारा किया गया।
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आलेख - नरेन्द्र कुमार 
लेखक का ईमेल आईडी - narendrapatna@gmail.com
लेखक का लिंक - http://aksharchhaya.blogspot.com/
छायाचित्र - दूसरा शनिवार 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com

















Monday, 18 February 2019

'जनशब्द' द्वारा बर्तोल्त ब्रेख्त पर केन्द्रित साहित्यिक गोष्ठी और पत्रिका लोकार्पण 17.2.2019 को पटना में संपन्न

ब्रेख्त - पहले से ज्यादा जरूरी एक मशाल 
आगे कूप, पृष्ठ में खाई / कहो प्रिये! किस मग से जाऊं? - डॉ. विजय प्रकाश 
[Small Bite-9 / खगड़िया में सैनिक स्कूल के बच्चों द्वारा कार्यक्रम- 17.2.2019  के लिए - यहाँ क्लिक कीजिए]

(बर्तोल्त ब्रेख्त बीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध जर्मन कवि, नाटककार और नाट्य निर्देशक थे।उनकी किशोरावस्था में ही प्रथम विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो चुका था और उन्हें अपने गृह क्षेत्र में ही मेडिकल कोर में काम करने का अवसर मिला. युद्ध की विभीषिका के प्रभाव को अपनी आंखो से देखकर उनपर गहरा प्रभाव पड़ा और उनमें रचनाशीलता का प्रखर विकास होता चला गया। आगे चलकर उन्होंने  "एपिक थिएटर" की स्थापना की जो घूम घूम कर अपने नाटकों का प्रदर्शन यूरोप  के विभिन्न भागों में किया करता था। उनके नाटकों पर मार्कवादी विचारधारा का प्रभाव है। नीचे प्रस्तुत है समकालीन कविता के राष्ट्रीय स्तर के जाने माने कवि श्री शहंशाह आलम के द्वारा तैयार की गई ब्रेख्त पर आधारित कार्यक्रम की रपट.)


पटना के महाराजा कॉम्प्लेक्स में स्थित टेक्नो हेराल्ड में साहित्यिक संस्था ‘जनशब्द’ द्वारा जर्मन के प्रसिद्ध कवि बरतोल्ट ब्रेख़्त पर केंद्रित समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित था। पहला सत्र ‘आज के समय में ब्रेख़्त’, जबकि दूसरा सत्र ब्रेख़्त को समर्पित कवि-सम्मेलन का था। 

कार्यक्रम का आग़ाज़ कथाकार राणा प्रताप द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कथांतर’ के ब्रेख़्त अंक के लोकार्पण से हुआ। तत्पश्चात् ब्रेख़्त पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने गंभीर विचारों को श्रोताओं से साझा किया।

ब्रेख़्त पर बोलते हुए समता राय ने कहा कि ब्रेख़्त आज के समय में पहले से अधिक प्रासंगिक हैं, क्योंकि आज हमारे सामने फ़ासीवादी शक्तियाँ अधिक सक्रिय हैं। वरिष्ठ कवि श्रीराम तिवारी ने ब्रेख़्त को एक ऐसी मशाल बताया  जो पहले से हमारे लिए अधिक ज़रूरी है।

मुख्य वक़्ता के रूप में बोलते हुए कथाकार राणा प्रताप ने विस्तार से ब्रेख़्त के कवि और नाटककार जीवन पर प्रकाश डाला। इनका कहना था कि ब्रेख़्त सिर्फ़ एक कवि या नाटककार ही नहीं थे अपितु पूरी दुनिया के लिए प्रतिरोधक संस्कृति के संवाहक थे। 

इस अवसर पर वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज, कथाकार शेखर, रंगकर्मी जयप्रकाश, कवयित्री रानी श्रीवास्तव, कवि सुजीत वर्मा आदि ने भी ब्रेख़्त के साहित्यिक जीवन को रेखांकित किया।

दूसरे सत्र में पटना और आसपास से आए चर्चित कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया, जिनमें शिवनारायण, विजय प्रकाश, शहंशाह आलम, राजकिशोर राजन, मुसाफ़िर बैठा, अरविन्द पासवान, सुजीत वर्मा, रोहित ठाकुर, एम के मधु, पूनम सिन्हा श्रेयसी, वीणा बेनीपुरी, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, श्वेता शेखर, अमीर हमज़ा, केशव कौशिक, लता प्रासर, अभिषेक कुमार आदि शामिल रहे।

शहंशाह आलम ने 'रोहू' शीर्षक कविता में क्षणिक लाभ पर आधारित प्रेम-भ्रान्ति का प्रभावकारी चित्र खींचा- 
जाड़े की ठिठुरन वाली रात
मैंने ताज़ा रोहू मछली लाई
और तुमको मुझसे प्यार हो गया
तुमको माछ-भात पसंद जो है
मगर क्या यह एक ज़रूरी बात
इस रोहू को भी मालूम रही होगी
कि प्यार का सफ़र लंबा होता है।

विजय प्रकाश ने आसन्न चुनावी माहौल की ऐसी सटीक व्याख्या की जिसे समझकर सभी नागरिकों को सचेत होने की जरूरत है-
ऐसे प्रश्न उछाले जाते 
मूल बात से जो भटका दे 
रोटी, जल औषधि के बदले 
धनु, त्रिशूल पर नजर टिका दे 
इस मुगालते में मत रहना 
जो विपक्ष में हरिश्चंद्र हैं 
आगे कूप, पृष्ठ में खाई 
कहो प्रिये! किस मग से जाऊं?

श्वेता कुमारी ने सूचनाओं के विश्वयुद्ध की ओर इशारा किया जो आज का सबसे बड़ा सवाल है- 
तुम्हारे जाने के दशकों बाद 
आजकल सूचनाओं का 
विश्वयुद्ध चल रहा है 
जहाँ सोलहवें साल में प्रेम की खबरें 
पैदा कर सकती है
बर्लिन से भी उँची दीवार
जिसे तुमने देखा तक नहीं था।

लता प्रासर ने 'वसंत' का स्वागत कुछ यूं किया- 
तन बसंती, मन बसंती, जीवन का हर क्षण बसंती
सुबह की धुंध, फूल के सुगंध हम तुम पर छा जाएंगे।

समारोह की अध्यक्षता प्रभात सरसिज ने, संचालन राजकिशोर राजन ने तथा धन्यवाद शहंशाह आलम ने किया। मुख्य अतिथि ‘नई धारा’ के संपादक शिवनारायण तथा कथाकार शंभु पी सिंह थे।
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मूल आलेख - शहंशाह आलम 
छायाचित्र - जनशब्द
संकलन और प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com

  











 






















Sunday, 17 February 2019

नवी मुंबई में "विविध भाषा संस्कृति संगम" की कवि गोष्ठी 12.2.2019 को संपन्न

लड़ते रहे जो अपनी अपनी कौम के लिए  / वो सारे लोग हिन्दू मुसलमान बन गए




साहित्यिक संस्था "विविध भाषा संस्कृति संगम, नवी मुंबई" की एक काव्य गोष्ठी अरुंधती आवास, उलवे में 12.2.2019 को आयोजित की गयी। इस गोष्ठी की अध्यक्षता लता तेजेश्वर ने की और सञ्चालन किया अश्वनी उम्मीद ने 

संस्था का परिचय देने के पश्चात अश्वनी उम्मीद ने विधिवत गोष्ठी का प्रारंभ किया एवं अपनी ग़ज़लों को गाकर पेश किया -

इन्सानियत को मान के मज़हब जो चले थे
वो सब के सब इक रोज़ तो इंसान बन गए
लड़ते रहे जो अपनी अपनी कौम के लिए
वो सारे लोग हिन्दू मुसलमान बन गए।

पता हो लापता फिर भी ठिकाना ढूंढ लेते हैं
जो मिलना चाहते हैं वो बहाना ढूंढ लेते हैं
हुनर की रोशनी लेकर जो निकलते हैं दुनिया में
वो गुमनामी में शोहरत का खजाना ढूंढ लेते हैं

मुख्य अतिथि चर्चित कवयित्री मीनू मदान ने अपनी क्रांतिकारी कविताओं से समाजिक परिवेश में परिवर्तन लाने की बात कही। 

अरुंधती की स्नेहिल कविता समाज का दर्पण, वंदना श्रीवास्तव की रचना अनमोल जीवन का सार, पूनम खत्री की दिल की आवाज गजब की शायरी प्रसतुत की। सबकी बेहतरीन रचनाओं ने गोष्ठी को एक मधुर और यादगार कवि गोष्ठी बना दिया। 

अध्यक्षा लता तेजेश्वर ने बहुत ही प्यार से सभी भारतीय भाषाओं को जोड़कर, मानवता समानता की ज्योत जलाकर सभी को एक सूत्र में बांधने की बात कही।

अश्वनी  उम्मीद के कुशल संचालन ने कार्यक्रम को और अधिक रोचक बना दिया।

सुभद्रा, एवं मेघा की उपस्थिति में बहुत ही हर्षोउल्लास के साथ यह साहित्यिक गोष्ठी संपन्न हुई। अपनी शायरी कविताओं, सुंदर रचनाओं से सभी ने एक दूसरे का मन मोह, दिल से आनंद लिया।

आलेख - श्रीराम शर्मा
चित्र सौजन्य- अश्वनी 'उम्मीद' 
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नोट- प्रतिभागी कवि/ कवयित्रियाँ गोष्ठी में अपनी पढ़ी गई रचनाओं की चुनिन्दा पंक्तियाँ भेजें इस रपट में जोड़ने के लिए. हमारा ईमेल आईडी है - editorbejodindia@yahoo.com