Tuesday, 14 January 2020

"Dayashankar Ki Dairy" performed at Versowa (Mumbai) on 12.1.2020

A Lunatic Fringe

(View it after every 12 hrs - FB+ Bejod India)



At first glance you may misperceive this as a stroy of a street boy Dayashankar who is deeply indulged in reveries. But while you reach the midway of the story you come to know that Dayashankar is just a means to convey the message on burning contemporary issues boggling the whole nation. 

A young man Dayashankar has big dreams before his arrival in Mumbai. His self-appraisal about  capabilities is very high which does not match any way to the hard realities of life. One of his relatives manages to get him a job of clerk in the office of a local MLA.  Dayashankar treats himself as a big film-star-in-making and think that his present job is just a launching pad of his flying career in future.

One day the daughter of the MLA comes to the office for some work and Dayashankar is smitten. He now think day and night only about Sonia, that girl. Nevertheless he is rudely treated by the Head Clerk there and unable to cope with the snub he absents from the office the next day and goes to a Park where he talks with the statue of Gandhi ji. He feels that Gandhiji has told him that he is the new King of Nepal as the old King had just died. And he is now in an air of Kingship wherever he moves. People think him a lunatic and send him to an asylum where he is badly beaten by the other lunatic people. Ultimately he comes to senses. 

The whole play is replete with slang commonly used among the ordinary people. In a dialogue Dayashankar says when a mad person can hold the important post of a nation why not another mad person can be designated as the same. The whole system is perverted and nobody talks in sense and Dayashankar is just representing the derailed system 

This  solo play is written by the renowned theater artist Nadira Zahir Babbar and was directed and acted by Alok Gagdekar at Veda Factory, Versova (Mumbai)  on 12.1.2020. On backstage were Arif (Light), Anup (Music) and Ankit, Aditya, Vijay provided the necessary support.

Alok proved that for a brilliant actor like him the rhythm of body movement is itself a statement and the air created by it is the whole message. Words are just confirmatory.

A marvelous show like it will stay for years in the memory of the viewers.
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Review  by - Hemant Das 'Him'
Photographs by - Bejod India blog
Send your feedback to - editorbejodindia@gmail.com
Note- This is the first draft of the review written in a hurry. Mistakes will be corrected later.














Monday, 6 January 2020

आईटीएम काव्योत्सव की 105वीं गोष्ठी खारघर (नवी मुंबई) में 5.1.2020 को संपन्न

गिरते का हाथ थामना तो दूर की है बात / बेदर्द जमाना है जो हँसने में लगा है

(हर 12 घंटों के बाद एक बार जरूर देख लीजिए- FB+ Today Bejod India)



जब आंधियों के बीच कोई खड़ा रहता है तो उसे अपवाद कहते हैं. जब देश भर में उथल-पुथल मची हो ऐसे में नववर्ष जैसा उत्सव मनाना तो दूर की बात है दिल को कोई ढाढस भी बँधा दे तो बहुत समझिये. इस परिदृश्य में एक काव्योत्सव की गोष्ठी विविध विचारधाराओं के कवियों के बीच अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में चली इसे एक सुखद आश्चर्य कहा जा सकता है. और आप जानकर हैरान होंगे कि एक ही स्थल पर ऐसी आश्चर्यपूर्ण घटनाओं का यह 105वाँ उदाहरण था.

दिनांक 5.1.2020 को आईटीएम, नवी मुम्बई के एक कमरे में काव्योत्सव की 105वीं गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसमें मुम्बई के लगभग 30 वरिष्ठ और युवा साहित्यकारों ने पूरी गर्मजोशी से भाग लिया. इस गोष्ठी के अध्यक्ष थे डॉ. हरिदत्त गौतम, विशिष्ट अतिथि थीं कुमकुम और संचालक थे अनिल पुरबा.

भारत भूषण शारदा ने नववर्ष का अभिनंदन बड़े ही सुंदर शब्दों में किया -
आशा और उत्साह, उमंग का, / लेकर मन में स्पन्दन!
आओ करें हम मिलजुल कर / नये वर्ष का अभिनन्दन!
पिछली  कटुताओ' को भूले / निर्मल मन को बनाये
भेदभाव की जंजीरों में / अब कोई नहीं जकडा जाये!
ऐसे भाव उठ जायें हृदय में, / कुछ रहे ना तेरा मेरा,
विमल प्रेम की वर्षा करता / आये सुखद सवेरा!
इस आशा से आज करें / मिल कर सब संघर्ष
शायद राहत लेकर आये / अब तो नूतन वर्ष!

सिराज गौरी ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर बेदर्द ज़माने की फितरतों को बयाँ कर डाला -
नफरत का नाग मुल्क को डँसने में लगा है / ख़ुद ही बिछा के जाल वो फँसने में लगा है
सोना निकाल ले गए होशियार जौहरी / मजदूर तो बस कोयला घसने में लगा है
दुनिया ये चाहती है कैसे उजाड़ दूँ / एक मेरा ख़ानदान जो बसने में लगा है
गिरते का हाथ थामना तो दूर की है बात / बेदर्द जमाना है जो हँसने में लगा है

विश्वम्भर दयाल तिवारी अपनी साधना और आराधना के दीप सौपने हेतु सुयोग्य पात्र को ढूंढ रहे थे -
साधना के दीप / किसको सौंप दूँ
आराधना के दीप /  किसको सौंप दूँ
सुमन-श्रद्धा साथ ले / तन मन उपस्थित
अभ्यर्थना के थाल / किसको सौंप दूँ?
मानता हूँ देव / पृथ्वी पर बहुत हैं
भक्त हठधर्मी विविध / अनुरक्त हैं
रक्त भी होता कुपित / नर पैशाचिक देखकर
जान स्वजनों की है / किसको सौंप दूँ

नज़र हयातपुरी ने पहले तो चुप रहना चाहा पर अपने यारों के आगे धीरे-धीरे दिल की सारी बातें कह डालीं -
जुनूने-शौक जो कुछ न कहें तो अच्छा है / ये दिल की बात है दिल में रहे तो अच्छा है
हम एक शजर के हैं डाली हमारा गुलशन है / हरेक शाख ही फूले-फले तो अच्छा है
उखाड़ फेकेंगे हम इत्तेहाद से अपनी / वो अपने-आप ही चलता बने तो अच्छा है
जरा ये कह दो अभी सरफिरी हवा से 'नज़र  / चले न तेज, हद में रहे तो अच्छा है

कुलदीप सिंह 'दीप' ने नेताओं की चमक-दमक के बीच भुला दिये गए देश के अनमोल रतन, लाल बहादुर को याद किया -
माँ के बहादुर लाल थे वो
कद के छोटे मगर दिल के विशाल थे वो

त्रिलोचन सिंह अरोड़ा ने ज़िंदगी के इम्तिहान में हमेशा डटे रहने की बात की -
मुश्किल  में भाग जाना आसान होता है
हर पल ज़िंदगी का इम्तिहान होता है

दिलीप ठक्कर 'दिलदार' के दिल का दीपक न डरता है कभी न बुझता है -
की कोशिशें आंधी ने बुझाने की मगर / था हौसला हमारा कि अबतक बुझा नहीं
'दिलदार' उसके ख़ौफ से क्यूँकर हम डरें /  होगा किसी का मगर मेरा खुदा नहीं

चन्द्रिका व्यास को युगों पहले एक कोने में किसी के साथ ली गई चाय की चुस्की हमेशा याद रहती है-
याद है कैफे के उस कोनें में  / चाय की चुस्कियों के साथ
तुमनें कुछ बातें की थीं / आज मैं तिरस्कृत
तुम्हें देख याद करती हूँ

अशोक प्रीतमानी सुट्टा लगाते हुए जीवन दर्शन के विविध आयामों से परिचय कराते चलते हैं -
क्या तुझे मालूम है / आखरी सुटे का मज़ा ही कुछ और है
फिर चिलम झाड़ देंगे / धो पोंछ के रख देंगे
फिर जब यार मिलेंगे भर देंगे / बड़ा रिस्की काम है यार
इस तरह चिलम पीना आखरी कश तक / कभी नाम के आगे, कभी पीछे
भोले बाबा का स्टीकर चिपक जाता है / इधर किस को फिकर है

निरुपमा को सन्नाटों भरी रात का ब्यौरा देती दिखीं -
आज फिर सन्नाटों ने / कोई चीख सुनी होगी
आज फिर स्याह रात पर / कोई कालिख पुती होगी

हेमन्त दास 'हिम' हालाँकि पत्थरदिल नहीं है पर उनकी अपनी परेशानियाँ हैं -
ग़ो दिल ये मेरा कोई पत्थर नहीं है / पर जहाँ मैं रहता हूँ, मेरा घर नहीं है
जो शख्स बोला उसका ऐसा हुआ इलाज / कि अब भी बोलता है पर असर नहीं है

वंदना श्रीवास्तव ने आजकल समाज में बच्चियों की सुरक्षा को लेकर सशंकित हैं -
अपनों के वेष में हौवान फिरा करते हैं / घर की बिटिया को क्या शमशीर थमा दी जाय
हाथ से छूटा, गिरा,  छन्न से टूट गया / चीज नाज़ुक थी कब तक ये संभाली जाय

चंदन अधिकारी ने पड़ाव को ही मंज़िल कह डाला -
सीखने का जज़्बा रखकर / आगे तू बढ़ता चल
हर पड़ाव है एक मंजिल / यह सोच तू बढ़ता चल

दीपाली सक्सेना ने इस गोष्ठी में एक फिटनेस एस्पर्ट की भूमिका निभाई
बॉडी का कैलोरी थोड़ा कम कीजिए
एक्सरसाइज, योगा या जिम कीजिए

अशोक वशिष्ट ने विरहिणी की व्यथा को चित्रांकित किया -
अंखिया पंथ निहारती / सजन न आये गेह
मन बंजारा हो गया / बंजर हो गई देह
चूड़ी खन-खन खनकती / पायल करती शोर
बार-बार हिचकी कहे / आवेगा चितचोर

विजय भटनागर जो  इस काव्योत्सव के मुख्य संयोजक रहे हैं वे अपनी शल्य-चिकित्सा होने के बावजूद भी कुछ देर के लिए उपस्थित होकर सभी लोगों के हौसले में उछाल भर गए -
जब हौसला भर लिया उड़ान का
फिर क्या कद देखते हो आसमान का

जय सिंह की नजरों में पहले सभी एक ही मिट्टी ले लाल हैं फिर हिंदू या मुसलमान -
तुम ईद को हमें गले लगा लो / हम होली में डालें गुलाल
हिंदु-मुस्लिम बाद में हैं हम / पहले हैं इस मिट्टी के लाल

विमल तिवारी अपने  ही लोगों को चिन्हित करने पर बड़ा आश्चर्य जताया -
क्या खुशियों को सीमित कर लें / क्या अपनों को चिन्हित कर लें?
कि विश्व रहा परिवार यहाँ / जन-जन दायित्व निभा जाएँ

ओम प्रकाश पांडेय ने फिर से जवानी की बात की -
आओ फिर से मुहब्बत करते हैं
माना कि हम उनके काबिल न थे

अभिलाज ने अनोखे बिम्बों के सहारे अपनी बातें दो कविताओं में रखीं
कल रात तेरी महफिल में / रात को देखा था
तारों के साथ हमनें / महताब को देखा था (1)
रोऊँ मैं यूँ जेठ में रोए / जैसे छत का टीन है
आधी जल में आधी बाहर / जैसे रोए मीन है (2)

सुनीता घोष को बमुश्किल नींद आई भी तो देखिए क्या हुआ -
अब्बल तो ये कि नींद न आए तमाम रात / आए तो आके ख्वाब में सताए तमाम रात
बेदारियों ने ख़्वाब दिखाये तमाम रात / या रब उसे भी नींद न आये तमाम रात

प्रकाश चन्द्र झा आज के युग में सुंदरता के नए विधान पर करारा व्यंग्य किया -
अब तो खा लो पान प्रिये
इस सुंदर कोमल काया से / तुम कितना वर्जिश करती हो
इस अंगूरी यौवन को तुम / पिघलाकर किशमिश करती हो
सिगरेट सरीखी बाँहें कर लीं / मोमबत्ती सी टाँग
मन ही मन भरने लगी / सुंदरता का स्वांग
स्वस्थ, सुडौल, सुंदर काया को / अब कहाँ हसीन कहते हैं
जिसके बदन की हड्डी गिन लो /  उसको अब ब्यूटी-क्वीन कहते हैं
सुंदरता परिभाषित करने का / यह है नया विधान प्रिये
अब तो खा लो पान प्रिये.

मो. हनीफ ने आज के अस्त-व्यस्त हालात को बयाँ किया -
शहर में हर कोई बिखरा पड़ा है
कहीं पे तन तो कहीं पे चिथड़ा पड़ा है

डॉ. मनोहर अभय ने "गजरे बेच रही लड़की" की गरीबी को बेधक शब्दों में प्रस्तुत किया -
जूड़ा खोले / बाल बखेरे
गजरे बेच रही लड़की
बाप गाँठता जूते / भैय्या रिक्शा खींचे
गुदड़ी   सीती मैय्या/ बैठ नीम के नीचे
कड़क ठण्ड सी / झेल रहे सब कड़की |
*गली- गली में फिसलन / पाँव नहीं फिसले
मणि वाले नागों के/ मुखड़े हैं कुचले
देते  रहे  मवाली / पग- पग पर घुड़की |
*बादल गरजे पानी बरसे / गजरे बेचेगी
घिरे अँधेरे की / लम्बी जुल्फें खींचेगी
रस्ता रोक रही  आँधी/ तड़क-तड़क बिजली तड़की|
*गिन्नी देख इकन्नी / बड़े- बड़े बिक जाते
जी हुजूर की थामे पगड़ी / घुटनों तक झुक जाते
*घास -फूँस की बनी रहे छपरी/ गरीबी बेच रही लड़की |

विशिष्ट अतिथि कुमकुम ने पहरे को प्यार का एक अंदाज़ बताया- 
ये इश्क़ नहीं तो और क्या है
हर पल तेरे नाम का पहरा है.

गोष्ठी के अध्यक्ष डॉ. हरिदत्त गौतम ने एक लम्बी किंतु अत्यंत भावपूर्ण रचना सुनाकर पिताजी के गुणों का अत्यंत सजीव वर्णन किया -
जब स्खलित हुआ, बहका, डूबा / तब हाथ बढ़ाकर आ जाते
आचार्य,  मित्र, मंत्री, नाविक / कितने किरदार पिताजी थे
बन सका न मैं जो आवारा / ऐयाश, नशेरी, नाकारा
रुक गई पतन की सुनामी / वह दीवार पिताजी थे

अनिला पुरबा जो इस कार्यक्रम का अत्यंत रोचक ढंग से संचालन कर रहे थे, ने  दोस्ती निभाने में माफी माँगने से कभी नहीं हिचकने की बात की -
दोस्त बनाने के मौका तलाश लेता हूँ
गलती हो न हो माफी जरूर माँग लेता हूँ.

अंत में आये हुए कवियों का ज्ञापन किया गया और अध्यक्ष की अनुमति से सभा की समाप्ति की घोषणा हुई.
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रपट का आलेख - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
नोट - जिनकी पंक्तियाँ ठीक से सम्मिलित नहीं हो पाईं हैं वे अपनी पंक्तियाँ ऊपर वाले ईमेल पर भेजें.





































Thursday, 2 January 2020

हस्तीमल 'हस्ती' के साथ कवि-गोष्ठी त्रिवेणी साहित्य संगम के द्वारा कुर्ला (मुम्बई) में 1.1.2020 को सम्पन्न

दोनों ही एक डाल के पंछी की तरह थे / ये राम वो रसूल, अभी कल की बात है

(हर 12 घंटों के बाद एक बार जरूर देख लीजिए- FB+  Bejod)




नए वर्ष का स्वागत कुछ धमाकेदार तरीके होना लाज़मी होता है इसी बात को ध्यान में रखते हुए त्रिवेणी साहित्य संगम ने पहली जनवरी 2020 को कुर्ला (मुम्बई) के टैक्सीमेन सोसाइटी में स्थित कवयित्री शोभा स्वपनिल के आवास पर देश के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार हस्तीमल 'हस्ती' को आमंत्रित किया. ये वही ग़ज़लकार हैं जिन्होंने "प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है" (आवाज - जगजीत सिंह) जैसी अनेक लोकप्रिय ग़ज़लों की रचना की है.

इस कवि गोष्ठी के अध्यक्ष हस्तीमल हस्ती थे और संचालन कर रहे थे अवनीश दिक्षित 'दिव्य'. अन्य प्रतिभागी कविगण थे - अशवनी उम्मीद, शोभा स्वप्निल, हेमन्त दास 'हिम', प्रभा शर्मा 'सागर', गुलशन मदान, रेखा किंगर 'रोशनी', प्रमिला शर्मा, हेमा चंदानी और सतीश शुक्ला 'रक़ीब'. गोष्ठी की संयोजक थीं शोभा स्वप्निल और धन्यवाद ज्ञापन किया संतोष खंडेलवाल ने.

गोष्ठी में शुरु से अंत तक सिर्फ और सिफ ग़ज़लें ही छाईं रहीं.  सब ने एक से बढ़कर एक रचनाएँ सुनाईं लेकिन निश्चित रूप से हस्तीमल 'हस्ती' तारों के बीच चांद के समान जगमगाते रहे. उनकी गज़लें जहाँ मुहब्बत की ताजगी से भरी होती है वहीं समाज और दुनिया के हालात से भी काफी गहराई में जाकर संवाद करती है.लफ्ज़ इतने सरल इस्तेमाल करते हैं कि हर कोई अचम्भे में रह जाता है पर जब मायनों में डूबता है तब उनके बड़प्पन का अहसास होता है. हालांकि इस गोष्ठी में उन्होंने अध्यक्ष होने के नाते सबसे अंत में अपनी रचनाएँ सुनाईं लेकिन यहाँ पाठकों की बेसब्री को देखते हुए हम सबसे पहले उन्हीं की सुनाई ग़ज़लों की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-

हर सू नहीं थे शूल, अभी कल की बात है
राहों के थे उसूल, अभी कल की बात है
क़ाफी थी एक ठेस बिखरने के वास्ते
इंसान भी थे फूल, अभी कल की बात है
उम्रों का वो लिहाज़ कि बरगद की राह में
आते न थे बबूल, अभी कल की बात है
दोनों ही एक डाल के पंछी की तरह थे
ये राम वो रसूल, अभी कल की बात है
आती थी बात जब भी वतन के वक़ार की
कुर्बानी थी क़ुबूल, अभी कल की बात है
(-हस्तीमल 'हस्ती)

चाहे जितने तोड़ लो तुम तोड़ लो तुम मंदिरों के वास्ते
फूल फिर भी कम न होंगे तितलियों के वास्ते
अस्ल में मुजरिम जो थे घर में ख़ुदा के जा छुपे
अब मसीहा रह गये हैं सूलियों के वास्ते'
इश्क, इमां, इल्म, इज़्ज़त, दोस्ती, शोहरत, ज़मीर
ये सभी सामान हैं सौदागरों के वास्ते
(-हस्तीमल 'हस्ती)

वो अंधेरों को भी पुरनूर बना लेते हैं
जो चिरागों की जगह दिल को जला लेते हैं
वो जगह स्वर्ग में तब्दील हुई जाती है
तेरे दीवाने जहां बज़्म जमा लेते हैं
(-हस्तीमल 'हस्ती)

इश्क, उदासी, ग़म, तनहाई
तुझसे मिलने के रस्ते हैं
हम शबरी के बैर सरीखे
जैसे भी हैं प्यार भरे हैं
(-हस्तीमल 'हस्ती)

प्रभा शर्मा  ने सामाजिक विरोधाभास को इस तरह से बयां किया -
"वो अक्सर जागते रहते हैं अपने शीशमहलों में
जिन्हें नींद आती है उन्हें बिस्तर नहीं होते
सागर जिनमें जितना जर्फ़ हो खामोश रहता है
 यहां उड़ते वही पंछी जिनके पर नहीं होते"
फिर उन्होंने बुरे काम करनेवालों को उनका अंजाम दिखाया -
"यकीनन वो खुद ही एक दिन उसमें डूब जाएगा
जो दूसरों के वास्ते केवल दलदल बनाता है."

प्रमिला शर्मा जानती हैं कि चांद और चांदनी  के बिना शायरी में मजा कहां? बड़ी नज़ाकत से वो कहतीं हैं -
"चांद की बाहों में जाकर चांदनी थी सो गई
 रात होगी, बात होगी, ख्वाब में थी खो गई"
पर रसोईघर की याद आते ही उनका ख्वाब टूट जाता है -
"मेरी पड़ोसन मुझको अक्सर बहुत सताती है
जब भी प्याज खरीद लाती है मुझको दिखाती है'

गुलशन मदान को आशिकी में अजीबोगरीब शिकायतें और और जरूरतें हैं-
"ये लहजा प्यार का सीखा कहां से? / मिला था कौन तुम को हम से पहले?
मुहब्बत के हंसी आलम से पहले / कहां था ग़म तुम्हारे ग़म के पहले"
"कुछ तो बोलो ये खामुशी क्या है? / बेखुदी है या बेरुखी? क्या है?"
कश्तियों को नाख़ुदा भी भी चाहिए / और ख़ुदा का आसरा भी चाहिए
इन हवाओं ने बुझाएं हैं चिराग / और चिरागों को हवा भी चाहिए
रखनी हो कायम जो ये नजदीकियां / रखना थोड़ा फासला भी चाहिए"

अशवनी 'उम्मीद' ने एक बार शायरी के दम पर घर चलाने की ठानी थी तो देखिए क्या लेकर आए -
"कलम से घर को चलाना एक सुनहरा ख्वाब है / ग़ज़ल से रोटी कमाना एक सुनहरा ख्वाब है
इमारत निर्माण करनेवाले एक मजदूर का / फकत अपना घर बनाना एक सुनहरा ख्वाब है"
इसके बाद उन्होंने आज के दौर में सफलता का नुस्खा दिया वह भी विशुद्ध हिंदी में -
"धन लगाकर स्वयं विज्ञापित हुए / इस तरह कुछ लोग स्थापित हुए
सच कहूँ वरदान के हकदार थे / व्यर्थ ही कुछ लोग जो शापित हुए
हैं सुखद अवशेष ये विच्छेद के / जो पुराने पत्र प्रत्यार्पित हुए"

हेमन्त दास 'हिम' को कोई सवाल पूछने से रोक रहा है -
"जिनसे करने हैं हमें लाखों सवाल / है शर्त उनकी कि कुछ न पूछेंगे
उसका एहसां हैं ये बड़ा सा दु:ख / अब किसी ग़म को 'हिम' न बूझेंगे"
फिर वो जहां रहते हैं उसे घर कहने से कोई रोकने लगा -
"गो दिल ये मेरा कोई पत्थर नहीं है / पर जहां रहता हूँ, मेरा वो घर नहीं है
सरहद-ए-उसूल पे हूँ रोज जंग लड़ता / ये अश्क मेरा खून से कमतर नहीं है
जो शख्स बोला उसका ऐसा हुआ इलाज / कि अब भी बोलता है पर असर नहीं है"

शोभा 'स्वप्निल' ने नए साल में भी हाल के न बदलने की बात कही -
"हाँ, सच तो यही है, बदलता है नया साल
सन बदलता है, कैलेंडर बदलता है
पर नहीं बदलता है अपना हाल"
फिर उन्होंने नई सभ्यता की खराबियों से दूर पहले की पहाड़ी संस्कृति की बात की -
"नई सभ्यता का ज्यादा चलन नहीं था
या कहिए कि खरचने को बहुत धन नहीं था"

हेमा  चंदानी अपने को कभी तन्हा नहींं होने देतीं-
"अपने को तन्हा मत कर / अपना भी कोई सानी रख
उम्र पके चाहे जितनी / दिल में कुछ नादानी रख
माँ ही काशी काबा है / चरणों में पेशानी रख"
फिर उन्होंने रिश्ता निभाने का शायराना अंदाज दिखाया -
"न उसका दिल बदल पाये ना अपना दिल बदल पाये
न वो कश्ती बदल पाये, न हम साहिल बदल पाये
मुहब्बत में अदावत है, अदावत में मुहब्बत है
न वो फितरत बदल पाया न हम कातिल बदल पाये
बहुत से मोड़ आये थे, बहुत सी मंज़िलें आईं
न उसने रास्ता बदला, न हम मंज़िल बदल पाये"

रेखा किंगर 'रोशनी'  इश्क की बेखुदी में डूबकर कहती हैं -
"आरजू तेरी, जुस्तजू तेरी / और कोई दुआ से क्या मतलब
जो है हुस्ने-अमल का शैदाई / उसको गम्ज़ो-सना से क्या मतलब
उनकी फितरत बदल नहीं सकती / अब वफा से जफा से क्या मतलब
जिसे इंसाफ की तवक्को थी / उसे सजा-रिहा से क्या मतलब
ये मरज लादवा है चारागर / दर्दे-दिल को दवा से क्या मतलब"
फिर वो एक पुरानी मधुर स्मृति के पन्ने पलटती हैं -
"गमों की आड़ में था मुस्कुराता / वो जालिम दर्द का मारा बहुत था
अभी तो कर रहा है बेवफाई / मगर उसने मुझे चाहा बहुत था
कसक अंजान सी दिल में छुपाए / वो बंजारा मुझे भाया बहुत था
मुसलसल तीरगी में जगमगाता /  बकौले 'रोशनी' तारा बहुत थ"

अवनीश दिक्षित 'दिव्य' जो इस गोष्ठी का शानदार संचालन कर रहे थे ने अपनी रचनाओं से पहले तो इश्क-मुहब्बत का समां बांधा और फिर जमाने के विपर्यय पर ध्यान खींचा -
"उनको वो सब दीजिए जिनको जो दरकार / मुझको अपना प्यार ही दे दीजिए सरकार"
"जिसको खुद पे यक़ीन होता है / उसका होना हसीन होता है
अपनी हस्ती की जानकारी से / आदमी बेहतरीन होता है"
"मुहब्बत आशनाई भर नहीं है / हिसाब इक पाई पाई भर नहीं है
बहुत कुछ मिल गया है आदमी को / तबीयत मुस्कुराई भर नहीं है
मेरे भाई मेरी एक बात तू सुन ले / तू मेरा एक भाई भर नहीं है"
"चश्म तर हों, होठों पर भी हंसी छाई हो / ऐसे होता है मुलाकात को ज़िंदा रखना
एक राहू का गला कटवा दिया अमृत ने / जहर को आता था सुकरात को ज़िंदा रखना"

सतीश शुक्ला 'रक़ीब' की कशमकश अजीब है -
"बोल भी सकता नहीं है ठीक से जो / उसके अंदाजे-बयां पे बोलना है
खामुशी से ही 'रक़ीब' इस बज़्म में अब / अब ज़िंदगी की दास्तां पर बोलना है"
फिर वे ज़िंदगी जीने की कुछ नसीहतें देते हैं -
"जब कभी मिला करो / कुछ कहा करो, कुछ सुना करो
हुस्न की शिक़ायते /  इश्क से किया करो
बांट कर किसी के ग़म / राह तय किया करो
कह के सोचना नहीं / सोचकर कहा करो
मुफ्त कुछ कर लो कभी / कीमतें दिया करो"

अंत में संतोष खंडेलवाल ने आए हुए साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन किया और अध्यक्ष की अनुमति से आशिकी और फिक्र से लबरेज़ एक शानदार कवि-गोष्ठी हमेशा के लिए सभी प्रतिभागियों की सुनहरी स्मृति में समा गई.  यह एक ऐसी गोष्ठी साबित हुई जिसके बारे में पढ़कर हजारों लोग आनेवाले सालों में शायरी का भरपूर लुत्फ़ उठा पाएंगे.
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रपट के लेखक - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
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