Tuesday, 4 August 2020

आईटीएम काव्योत्सव का नौवाँ वार्षिकोत्सव 2.8.2020 को व्हाट्सएप्प ग्रुप में सम्पन्न

नौ बरस पूरे होने पर काव्योत्सव कर रहा अभिनंदन

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बरसों पहले साहित्य जगत में सुंदर एक फूल खिलाया था
सकल समाज की सेवा करने का मन में उद्देश्य बनाया था। 
वही फूल अब विकसित होकर आगे बढ़ता जाता है
अपने सौरभ से धरती के हर कोने में खुशबू फैलाता है। 
भारत भूषण शारदा के इन शब्दों में आईटीएम के नौ वर्षों की गौरव गाथा का सारांश है। इतना आसान नहीं होता नौ वर्षों के लम्बे अंतराल में इतनी सुव्यवस्थित ढंग से विशाल संख्या में इतने उत्तम कवि-कवयित्रियों को लेकर इतने प्रेम और मिल्लत के साथ काव्योत्सव करते चले जाना और वह भी हर महीने । पढ़ी जानेवाली रचनाओं का स्तर सामान्य से काफी ऊंचा रखनेवाले और हर विचारधारा के लोगों के लिए मंच खुला रखनेवाले इस काव्योत्सव के पीछे मूल संकल्पना और संयोजन एक उम्रदराज किन्तु समत्कारी व्यक्तित्व वाले कवि विजय भटनागर की सर्वप्रमुख भूमिका रही है। इन्हें सहयोग देनेवाले भी असाधारण रूप से क्षमतावान जीवट प्राणी हैं जिनमें अनिल पुरबा, विश्वम्भर दयाल तिवारी, सेवा सदन प्रसाद, सतीश शुक्ल आदि प्रमुख रहे हैं। स्त्री पक्ष से उतना ही सशक्त समर्थन इन्हें प्राप्त है जिनमें माधवी कपूर (अध्यक्ष), वंदना श्रीवास्तव आदि शामिल हैं। निश्चित रूप से नवी मुंबई की यह अनूठी साहित्यिक संस्था बधाई की पात्र है  

दिनांक 2.8.2020 को नवी मुम्बई की सबसे सक्रिय काव्य संस्था का यह स्थापना दिवस होने के कारण  विशेष कवि गोष्ठी ऑनलाइन मनाई गई जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध लघुकथाकार सेवा सदन प्रसाद ने की. कुल सैंतीस लोगों ने रचनाएँ पढ़ी. इस गोष्ठी के सफल निर्वहन में इसके प्रमुख संस्थापक सदस्य विजय भटनागर और कार्यक्रम प्रबंधक अनिल पुरबा जी का प्रमुख योगोदान रहा  

इस वार्षिकोत्सव के अवसर पर कुछ चुने गए साहित्याकारों को उनकी विशिष्ट सेवाओं हेतु साहित्यिक गौरव पत्र देकर सम्मानित भी किया गया। सम्मानित होने वाले साहित्यकार हैं - किशन तिवारी, विश्वम्भर दयाल तिवारी, सेवा सदन प्रसाद, अनिल पुरबा,  हेमन्त दास 'हिम' एवं  प्रकाश चन्द्र झा।

पढ़ी गई रचनाओं की झलक नीचे प्रस्तुत है- 

अनिल पुरबा / महाकुंभ -
काव्योत्सव का यह हमारा महाकुटुंब, 
है, शायरों और कवियों का महाकुंभ  I
माधवी माँ का आशीर्वाद, जानकी मैय्या का प्यार, 
लगता कवियों का मेला, हर माह के पहले रविवार I
दिपालीजी की हंसी ठिठोली, प्रमिलाजी की अद्भुत ब्रजबोली, 
विजयाजी ने झूठ की पोल खोली, चन्द्रिका जी की मृदु बोली, 
भर देती हम सबकी, खुशियों से झोली I
भारत के हम भूषण, सत्य का ऊजला प्रकाश, 
इनकी भावनाओं से ना होते, कभी हम निराश  I
रामेश्वर, राम प्रकाश, सतीश, शामिल होते सारे इश, 
विशम्बर जी की प्रगाढ़ भाषा, कहती नित विशेष I 
गौतम जी का अंदाज़ अनुपम, अनिल के अंदाज़ में दम-ख़म,  
सेवा सदन जी के अंदाज़ में भरा जोश, हेमंत का तकनिकी जुलूस I
मधु श्रृंगी जी का अनोखा अंदाज़, है कलम की वे सिपहसालार, 
वंदना जी का कोई नहीं सानी, करती शब्दरूपी तीखा वार,
अशोक, विजयकांत, ओम प्रकाश भी अब तो आते, 
रचनायें अपनी नयी-नवेली पढ़कर हमे सुनातेI
निरुपमा जी के काव्य-पाठ में अनूठा एहसास, 
राम स्वरुप जी की प्रस्तुति में विशेष उल्हास I
अलकाजी की रचनाओं में होता सामाजिक संदेश, 
कुमकुम जी की रचनाओं में ज्ञान का समावेश I
दिलीप भाई, नज़र, त्रिलोचन, दिलशाद, चारों शायरी के उस्ताद, 
ग़ज़ल, शेर, और मिसरे, करते मीठी उर्दू को जिंदाबाद  I
अधिकारी जी कराते अध्यात्म का आभास,
पुरषोत्तम जी की रचना में होता विश्वास I
प्रकाश चन्द्र  कराते मुद्दों पर गौर, विमल का अपना अलग ठौर, 
कटु सच कहते हमेशा ही, बुरा लगे तो बदल दो अपना तौर I
विविध विचार, विभिन्न उचार, कभी कल्पनाओं की नयी उड़ान, 
शब्दों के कैनवास पर, साधते इन्द्रधनुष से रंगीन बाण I
गीत, कविता, दोहे, ग़ज़लों का छलकता नया रंग, 
विचारों और विचारधाराओं का होता काव्योत्सव में संग I
श्रोताओं की कमी तो है, पर ना गिला, ना शिकवा ना नुक्सान, 
क्योंकि किशन तिवारी जी के रूप में, स्वयं आ जाते भगवान्  I
सरस्वती माँ से है आग्रह, शारदा माँ से है बिनती, 
फले फुले हमारा महाकुटुंब, हो काव्योत्सव की उन्नति I
साहित्य की सेवा हेतु, शब्दों की फसल बोई, 
किस के अथक प्रयास से, जीत हमारी हुई  
मित्रों इस अपार सफलता का किसे दें हम श्रेय, 
एक ही नाम है, विजय, विजय, विजय I
......

भारत भूषण शारदा  - 
(काव्य उत्सव की नोवी वर्षगांठ पर)
बरसों पहले साहित्य जगत में सुंदर एक फूल खिलाया था,
सकल समाज की सेवा करने का मन में उद्देश्य बनाया था। 
वही फूल अब विकसित होकर आगे बढ़ता जाता है,
अपने सौरभ से धरती के हर कोने में खुशबू फैलाता है। 
कभी ना हिम्मत हारी इसने आगे ही आगे कदम बढ़ाया,
हर बाधा से हर मुश्किल से साहस से बढ़कर टकराया। 
भटनागर जी की सकल साधना माधवी जी का शुभ आशीष,
मानो मिलकर आज कह रहे कृपा करें सब पर जगदीश। 
नौ बरस पूरे होने पर काव्योत्सव कर रहा अभिनंदन,
हर चेहरे पर खुशियां दमके रहे महकता जीवन उपवन।
.....

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
● बिन भय जीवन कब रहे ,
जग से कब मिटे व्याधि ।
ईश्वर की ही कृपा वश ,
सुख वर्षा गृह साधि ।।
● माँ वाणी की वन्दना , राष्ट्रगान जयघोष ।
मधु श्रँगी स्वर साधना ,
भारत भूषण जोश ।। 
● अनिल बहाए मन महक ,
विजय संगठन शक्ति ।
पथ पर सत्य प्रकाश है ,
साथ नीति गुण युक्ति ।।
● सेवा सदन अध्यक्ष पद ,
करें सुशोभित आज ।
एक कुटुम्ब हैं साथ सब ,
रचना सुधि सिर ताज ।।
 ● शमर विमल पुरुषोत्तम , 
कुमकुम वेद सेन ।
उन्हें बधाई जन्म दिन ,
भगवद्कृपा सुदेन ।।
● सैंतीस रचनाएँ पढ़ें ,
कवि कवयित्री साथ ।
नेह भाव आदर लिए ,
पर न मिल रहे हाथ ।।
 ● रचनाएँ प्रेषित सकल ,
उत्तम प्रकृति विचार ।
आभासी संगोष्ठी ,
कोशिश दमन विकार ।।
● हटे व्याधि बैरी हटें ,
बरसें बादल नीर ।
मिटे प्रदूषण *विश्व* से
जीवन रहे सुधीर ।।
● धन्य भूमि माँ भारती ,
धन्य देह परमार्थ । 
सेवा निष्ठा प्रेम धन ,
धन्य प्रकृति सत्यार्थ ।।
...

दिलीप ठक्कर "दिलदार" -
वो मेरा हमसफ़र जिस रोज़ मेरे साथ हो लेगा,
हमारे दरमियां जो राज़ है हर राज़ खोलेगा!
हमारा फैसला इंसाफ के पलड़े में तोलेगा,
फिर उसके बाद जो बोलेगा वो हक बात बोलेगा!
मेरे गम को हमेशा ही वो अपना गम समझता है,
मेरे आंसू जो देखे गा तो मेरे साथ रो लेगा!
नहीं आता मुझे गैरों की थाली पे नज़र रखना,
किसी के माल पे 'दिलदार'क्या ईमान डोलेगा!
.....

किशन तिवारी भोपाल  -
बहुत बेचैन हूँ मैं आजकल अच्छा नहीं लगता
कठिन ही ठीक है जीवन सरल अच्छा नहीं लगता 
घरों के साथ सन्नाटे शहर में भी चले आए 
इन्हें डर हादसों का कोई पल अच्छा नहीं लगता 
नदी सूखी है जलती रेत जंगल कट गए सारे 
है मृगतृष्णा कहाँ से लाएँ जल अच्छा नहीं लगता 
कभी बस्ती कभी जंगल चले हम बन के बंजारे 
तुम्हारा प्यार तुम रक्खो ये छल अच्छा नहीं लगता 
किशन तिवारी भोपाल
.......

विजय भटनागर - 
अपने जीवन की डोर 
खींचो तुम मन कीओर।
कट जायेगे कष्ट तिहारे 
नही मचेगा मन मे शोर।
विजय जबये रचना सुनाए
श्रोता कह उठे वन्स मोर।
.....

हेमन्त दास 'हिम' - 
दोस्तों की महफ़िल में 'हिम'आइये जाइये
पर कानून हाथ में लेनेवालों को न बचाइए
जात पर, धर्म पर देश को, समाज को
जो बांटे उनकी तरफदारी में कभी न जाइये
इतिहास में जुल्म हुए औरत, दलित, धर्म पर
बदला न लेकर समानता को ही लागू कराइये

हनीफ मोहम्मद -
खुद को खुद  से मैं ने जब जोड़ दिया
मुकम्मल हुई बेखुदी कलम जब तोड़ दिया
हर परवेज हो यादगार  जरूरी तो नहीं
हर याद को  पीछे  सनम के कब छोड़ दिया।
खुद को खुद से मैं ने जब जोड़ दिया। ।
........

रजनी साहू "सुधा" -
जलराशि को धरती पर 
नुपूर बाँधकर नाचती देखती हूँ
तब मैं भी मयूर बनकर
नृत्य करना चाहती हूँ
........

सत्यप्रकाश श्रीवास्तव -
पूजा काल में पूजा करें,
कर धारण मन श्री राम।
स्वप्न पूर्ण होंगे सभी के,
जो हों दिल में भाव निष्काम
......

कुमकुम वेद सेन -
देखते देखते
बेटी से बहू बन गई
मां से दादी नानी बनी
बना अनुभवों का एक अनोखा सफर
हर सुबह एक
नया रंग है जीवन का
कई सपने हुए नहीं पूरे
बिन चाहे मिले नए सपने
.......

शमर देवबन्दी 'जुगाड़' / अनुवाद : विश्वम्भर दयाल तिवारी -
हम जो सरसों को हथेली पे जमाने लग जायें 
आप सोचें भी जो ऐसा तो ज़माने लग जायें ।
भेद खुल जायेंगे सब दूधिया पोशाकों के 
हम भी अगर लोगों पे दाग लगाने लग जायें ।
बे गहरी दर बदरी बे सरो सामानी है 
शायरी छोड़ के कुछ पैसे कमाने लग जायें ।
सोच के सोते हैं कि सुबह को जब आँख खुले 
खाली हाथों में किसी रोज खजाने लग जायें ।
वो तो शायर भी गायक भी अदाकार भी हैं 
भैरवी बोलें तो मल्हार सुनाने लग जायें ।
दोस्तों ने तो बजाया है ले तबला अपना 
और दुश्मन भी अगर ढोल बजाने लग जायें ।
....

शोभना ठक्कर -
मैं चूप हुं गुमसुम ये शमाँ है 
उसकी भी खामोश ज़ुबाँ है
तुम गम से बेजान हुए हो
तो मुझमे भी जान कहाँ है
चूमा था कभी प्यार से तुमने
हर गुल पे वो अब भी निशां है
अम्न का घर-द्वार जिसे कहिए
वो तो मेरा हिन्दुस्ताँ है
पाइ हुँ तहजीब जहाँ से
वो मक्तबो मेरी माँ है
"शोभना" जाने उसको पता है 
कौन छुपा है कौन अयाँ है।
....

डॉ. रामस्वरुप साहू 'स्वरुप, कल्याण मुंबई -
भाई बहन का प्यार अनोखा रक्षाबंधन।
माथे तिलक लगा भाई के करती अभिनंदन,
आजीवन रक्षा वृत्त वरदान अभय पाती है।
प्रेम उमड़ता आंखों से गले लग जाती।
पवित्र खून का रिश्ता अभिनव भव बंधन।
स्नेह भरा पूजा आराधना सुरभित चंदन।
सुखी रहे परिवार सदैव आशीष बहना का,
जीवन की सौगात अनोखा रक्षाबंधन।
जब कलाई पर सजते कच्चे प्रेम के धागे,
जन्मों की मुराद पूरी होती है बिन मांगे।
आनंद विभोर हृदय कमल खिल जाते।
कुसुमित स्नेह लता, महके नंद नंदन।
......                                                                                              
प्रकाश चंद्र झा -
या फिर गुल्ली- डंडे का खेल|
पेड़  से   कूद तालाब नहाते,
तोड़ते  अमिया  मार  गुलेल|
होली,   दिवाली,  ईद, मुहर्रम,
और  भी  कितने तीज त्योहार||
मिलजुल   कर सब मनाते ऐसे,
जैसे  पूरा  गाँव  हो एक परिवार||
....

चंद्रिका व्यास, खारघर नवी मुंबई -
भाई होने का
फर्ज वह निभाता है !
सरहद पर जब भाई होता 
 राखी भेजती चिट्ठी में
मेरी उम्र तुझे लग जाये भैया
ऐसा वरदान ईश्वर से वह लेती !
कोरोना  की दूरी  में भी
रेशम के कच्चे धागों से
सदा बंधा रहे भाई बहन का प्यार
   राखी धागों का त्यौहार 
   राखी धागों का त्यौहार !
   ....

विजयकान्त द्विवेदी -
 दिवस का मार्तण्ड नहीं
किन्तु अभी" उजास " है।
है अभी लोहित  गगन
व्योम में भरा प्रकाश  है।।१!
प्रेम के पावन पंथ पर
है खड़ी वह  द्वार मेरे !!
समर्पिता, अनुरागिनी
है उसे ,जज्बात घेरे ।‌।२!
....

पुरुषोत्तम चौधरी 'उत्तम', मुम्बई -
    जिन्दगी किस क़दर बे-वफ़ा हो गई 
    हर खुशी आजकल  बेमजा हो गई ।
    तेरे पहलू में आकर बहुत शाद थे
    तुम ख़फ़ा हो गए जाँ कज़ा हो गई ।
    तिश्नगी लब पे है चश्म पुरआब है 
    जीस्त तेरे बिना इक  सजा हो गई ।
    इश्क बरहक़ है कैसे दिलाऊँ यकीं
    हक़ बयानी मिरी जब जफ़ा हो गई ।
.....

राम प्रकाश विश्वकर्मा, खारघर नवी मुंबई -
नेह की डोर से,
प्रीति के छोर से,
भावों की गांठ बांध,
मन की पतंग उड़ी। 
खींचो न रे, डोर खींचो न रे।। 
प्रियतम के गांव में,
तारों की छांव में, 
मधुबन में प्रेम के, 
अंसुवन की बेल चढ़ी।
सींचो न रे, और सींचो न रे।।
मन की उमंग पर, 
तन की तरंग पर, 
धड़कन की ताल पर, 
स्वर की पुकार बढ़ी। 
नाचो न रे, आज नाचो न रे।।  
हिरदय की पीर पर, 
नदिया के तीर पर, 
कल्पना के पृष्ठ पर, 
पाती सप्रीति लिखी। 
बांचो न रे, आज बांचो रे।।
....

डा० हरिदत्त गौतम "अमर" -
हम कितने सौभाग्यवान जो घड़ी दिव्य पाई
राम लला का मन्दिर बनता देता दिखलाई
पुरी अयोध्या दुलहिन जैसी सज धज इतराई
वाल्मीकि के श्लोक मुग्ध तुलसी की चौपाई
(भयंकर विवाद क बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय होने पर मंदिर निर्माण हो रहा है। इस विवाद के लम्बा खिंचते चले जाने से किसी पक्ष का कोई लाभ नहीं था अत: हम सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं,  साथ ही इस विवाद से सम्बंधित सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार मस्जिद का निर्माण भी होना है। अगर गौर से देखा जाय तो यह फैसला सामाजिक सौहार्द कायम रखने का प्रयास भी लगता है और एक हमेशा चलनेवाले विवाद को पूर्ण विराम दिया गया है जो कि एक अच्छी बात है। देश में आज आवश्यकता है और जैसा कि वर्तमान सरकार और पहले की सरकारें भी कहती रही हैं कि हमें धार्मिक विषयों की बजाय विकासात्मक मुद्दों जैसे -  गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य आदि पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।)
......

विमल  तिवारी, खारघर  नवी  मुंबई -
हुई शाम,  और हुआ आगमन कुछ प्यालों के सेट का,
खुला बॉक्स और चेहरा  चमका  माथा दमका सबका !
प्याले भी तब धन्य दिखे थे पावन  घर के  आँगन  में, 
कृतियां, प्रतिमा बन कर उभरें उन चमकीले भाजन में !
......

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई -
रक्षा बंधन का त्यौहार ,भाई बहन का प्यार ,
भाई बहन का वादा , रेशम का यें धागा !!
ख़ुशियाँ  लाए अपार , प्रेम सुत्र में जोड़े  !!
 राखी का अटूट बंधन , भाई बहन का रिश्ता ।। 
.......

ओमप्रकाश पाण्डेय -
( रक्षा बंधन के अवसर पर बहनों को समर्पित )
मै तो  आज भी हूं तुम सबका प्यारा भईया
मां बाबू के बाद तो  तुम सब  से ही मिला 
अधाह मधुर  प्यार जीवन भर मुझको
आज भी रखा है दिल में मेरे वे सब यादें
मेरी प्यारी बहना हो या  हो वो बड़की दीदी .......१
.....

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, कोपरखेराने, नवी मुंबई -
राखी के पवित्र त्योहार में,
यह काला कोरोना क्यो आया।
दूरियां बनाकर, मास्क पहनकर,
कोरोना को कैसे लताड़ भगाया।।
राखी..........................3
प्रकृति हमारी मित्र है सारी,
करेगी कोई चमत्कार यारा।
फिर खिल जायेगा पुष्प मनोहर,
कोरोना जायेगा थक ये सारा।।
राखी...........................

 इस तरह से अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में इस काव्य वार्षिकोत्सव का समापन हुआ। 






























Monday, 3 August 2020

रक्षाबंधन पर रचनाएँ / रचनाकार - अलका पाण्डेय और चन्देल साहिब

कविताएँ 

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रक्षाबंधन / डॉ  अलका पाण्डेय

रक्षा बंधन का पर्व है आया
कुमकुम अक्षत थाल सजाया
भाई को प्रेम से तिलक लगा
सबने मिलकर यह पर्व मनाया
रक्षा का अनमोल वादा पाया

भाई पर अटूट प्रेम बरसाये
बहनों के मन खूब हर्ष समाये
रक्षा की डोर कलाई में सजाई
बचपन का वो लड़ना झगड़ना
पुरानी यादों से मन हर्षाये

भाई बहन रिश्ता होता खास है
कोई फ़र्क़ नहीं दूर है या पास है
हृदय से जब एक दूजे से प्रेम हो
हर दिन ही होता फिर ख़ास है

घर आँगन में ख़ुशियाँ छाई
बहनें अक्षत, रोली, राखी, ले आई
सजी हुई थाली प्रेम की हाथो मे
अधरो पर मुस्कान सजाकर आई

ह्रदय गगरी ममता रस छलके
प्रीत डोर के प्यार में में बँधके
हरदम दूर रहे विपदाऐ
दुख न हो सुख के अंकुर फूटे

मस्तक चंदन तिलक लगाकर
रक्षा का अनमोल वादा पाकर
बहना की ख़ाली झोली भर जाएँ
 धूमधाम से यह पर्व मनाएँ.
...

कभी डांटे कभी मनाए / चन्देल साहिब

क़भी डांटे क़भी मनाए.
प्यार से जो गले लगाए,
बहन वही है।

रात को ज़ब नींद न आए
लोरी सुनाकर मुझे सुलाए
बहन वही है।

सुबह नींद से मुझको जगाए
कोमल हाथों से सर सहलाए
बहन वही है।

अपने हाथ की चाय पिलाए
पापा की डांट से भी बचाए
बहन वही है।

रक्षाबंधन पर मिलने आए
कलाई पर राख़ी सजाए
बहन वही है।

मस्तक पर तिलक लगाए
लड्डुअन का भोग लगाए
बहन वही है।

गिफ़्ट की आस न लगाए
मुझे ख़ुश देख ख़ुश हो जाए
बहन वही है।
...

रचनाकार - डॉ. अलका पाण्डेय, चन्देल साहिब
प्रतिर्क्रिया हेतु इस ब्लॉग का इमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

कवयित्री - अलका पाण्डेय 

कवि चन्देल साहिब अपनी एक बहन के साथ

कवि चन्देल साहिब अपनी एक बहन के साथ

चित्र में एक कवि संजय कुमार संज अपनी बहन से राखी बंधवाते हुए 

Sunday, 26 July 2020

मुम्बई अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच का आभासी सम्मान समारोह 19.7.2020 को संपन्न

                   देर रात तक वीडियो के माध्यम से चला नृत्य संगीत और फैशन शो का कार्यक्रम 
करीब 200 लोग सम्मानित * कुछ को विशेष सम्मान * बेजोड़ इंडिया के हेमंत  'हिम' को  कलम योद्धा सम्मान 

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मुम्बई अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच ने लाकडाऊन में अग्निशिखा के संग , कोरोना की जगं, विविध काव्य के रंग , शुरु किया था जो सतत जारी रहा. कोरोना की जंग में अपनी साहित्यिक गतिविधि  51  ऑनलाइन कवि सममेलन सम्पन्न कर 52 वाँ दिन यानी 19.7.2020 को सभी प्रतिभागियों का सम्मान दिया गया.  सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ सावन के मौसम में गतिविधियों का समापन हुआ,

अलका पाण्डेय ने बताया कि लॉकडाउन में भी ओंनलाइन विडीयो के माध्यम से रंगारंग कार्यक्रम के तहत सावन के गीत, फ़ैशन शो, नृत्य के रंगारंग कार्यक्रमों के साथ सबका सम्मान, सम्मान पत्र दे कर किया गया, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे सेवासदन प्रसाद और विशिष्ट अतिथी- संतोष साहू , आशा जाकड, सुनिलदत्त मिश्रा.

समारोह अध्यक्ष. पन्ना लाल शर्मा  थे. मंच संचालन, अलका पाण्डेय और चंदेल साहिब ने तथा सरस्वती वंदना पदमा तिवारी और शोभारानी तिवारी ने की.

कार्यक्रम की शुरुआत अलका पाण्डेय ने सबका अभिनंदन किया और सावन पर एक गीत सुनाया.

मंच की अध्यक्ष अलका पाण्डेय ने बताया इस कार्यक्रम में सबको हरे वस्त्र पहन कर हरियाली में प्रस्तुति देनी थी. पुरुषों ने भी कैटवॉक व बाहर  पेड़ों के बीच प्रस्तुतियाँ दी. सबसे बड़ी बात ६० - ७० वर्ष की महिलाओं ने बहुत ऊर्जा के साथ नृत्य प्रस्तुत किया क़रीब दौ सो प्रतिभागी थे रात देर तक कार्यक्रम का आनंद लिया सबने बहुत सराहना की. इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोगी रिशु पाण्डेय , चंदेल साहिब , प्रतिभा परासर , संजय मालवी आनंद जैन आदि थे.  

रजनी अग्रवाल, विजया बाली नृत्य किया तो पद्माक्षी शुक्ला , शोभारानी तिवारी , ऐश्वर्या जोशी मधु मान्या वैष्णवी  ने फ़ैशन शो किया. शकुन्तला पावनी, मीना पराशर, रश्मि शुक्ला ने नृत्य कर समा बांधा तो वहीं मंजूला वर्मा, स्मिता धीरासरिया  ने हरियाली के बीच ले जाकर फ़ैशन शो कर सुंदर गीत प्रस्तुत किया. सुनीता चौहान ने हिमाचल की हरियाली व सौन्दर्य के दर्शन कर गीत सुनाया.  रेखा पाण्डेय , आशा जाकड , ममता तिवारी , रानी अग्रवाल , साधना तोमर , दीपा परिहार , चंदाडागी चंद्रिका व्यास, अंकिता सिंहा, रानी नारंग, सुनिता अग्रवाल, सुषमा शुक्ला. गीता पाडेंय, शुभा शुक्ला , मीना त्रिपाठी, अश्मजा प्रियदर्शनी, अनीता झा , माधवी अग्रवाल , प्रेरणा सेन्द्रे, गरिमा  ने हरे भरे वृक्षों के बीच जाकर अपनी प्रस्तुतियाँ दी.  पुरुषों ने भी उपवन में जाकर गीत गाये कैट वाक किया.

सुरेन्द्र हेगड़े , उपेन्द्र अजनवी , शेखर तिवार , श्रीहरि वाणी भरत नायक, रविशंकर कोलते, संजय मालवी  कान्हा बन कर छाए तो जनार्दन शर्मा राजस्थानी सेठ बने चंदेल ने एक लेखक का किरदार में अवतरित हुए और  आनंद जैन जी व्यापारी सुनिलदत्त मिश्रा मज़दूर का अभिनय, आश्विन पाण्डेय. राजेंश बंजारा सागर तट पर जाकर गीत गाया तो बैजेन्द्र मारायण ने संत का रुप लिया गोवर्धन लाल बंघेल,  पेड़ के झुरमुट में दिनेश शर्मा, छगनराव, ओम प्रकाश पाण्डे , रामेश्वर गुप्ता, महताब आजाद, विजयकांत द्विवेदी, ज्ञानेश्वर मिश्रा, गुलाबचंद पटेल, ज्योति भास्कर ने पेडो के गिर्द गिर्द गीत गाये दो दो बाल कलाकार आहन पाण्डेय अवीर पाण्डेय ने कविता सुनाई.

नीरजा ठाकुर, अर्चना पाण्डेय, नेहा इलाहाबादी, पदमा तिवारी, सिमा दुबे, वंदना शर्मा प्रतिभा पराशर, निलम पाण्डेय,  मधु तिवारी, रागनि मित्त , ऊषा पाण्डेय, मुन्नी गर्ग, द्रोपदी साहू, संगीता पाल, गुरमित गिल, कल्पना भदौरिया, कांता अग्रवाल, सुमित्रा तिवारी, लीला दीवान, अंजूल कंसल, मीरा भार्गव, अर्चना पाठक, अंजली तिवारी  प्रिया उदयन आदि ने विविध रंगा रंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया. सभी को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया. क़रीब दौ सो लोगों का सम्मान किया गया. यह तीसरी बार सम्मान दिया गया लाकडाऊन में ,

विशेष सम्मान दिया गया सेवासदन प्रसाद , संतोष साहू, डॉ. अवधेश अवस्थी , आशा जाकड , श्री हरिवाणी , विनय शर्मा दीप , रमाकांत पाण्डेय,. डा जनार्दन सिंह , हेमंतदास हिम , भास्कर राव पाढरे, पन्ना लाल शर्मा , संध्या रायचौधरी , अभिलाष अवस्थी , डॉ अंरविंद श्रीवास्तव, बिजैन्द्र मेव, शिव पूजन पाण्डेय , रिशु पाण्डेय , चंदेल साहिब , संजय मालवी , जनार्दन शर्मा , सुरेन्द्र हेगड़े , डॉ प्रतिभा पराशर , शोभारानी तिवारी. 

अब राष्ट्रगान से कार्यक्रम का समापन १५ अगस्त को "मेरे वतन" पर ज़ोरदार कार्यक्रम की तैयारी चल रही  है.
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रपट की लेखिका - डॉ. अलका पाण्डेय
परिचय - रा. अघ्यक्ष, अग्निशिखा काव्य मंच 
रपट की लेखिका का ईमेल आईडी - alkakpandey74@gmail.com
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Thursday, 23 July 2020

भा.युवा साहित्यकार परिषद द्वारा आभासी लघुकथा सम्मेलन 19.7.2020 को संपन्न

सृजनात्मकता की प्रासंगिकता कभी प्रश्नों के सलीब पर नहीं टँगती
लघुकथा समीक्षक निशांतर की मृत्यु पर शोक प्रकट किया गया 

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पटना :"समयगत सच्चाईयों  को पूरी शिद्दत के साथ बयां कर रही हैं, नए मूल्यों को प्रतिस्थापित कर रही हैं समकालीन लघुकथाएं। "भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में आयोजित तथा अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के फेसबुक पेज पर ऑनलाइन आयोजित हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन का संचालन करते हुए, संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया। 

यह सारस्वत समारोह वरिष्ठ लघुकथा समीक्षक स्व निशांतर की स्मृति को समर्पित था। इस  लघुकथा सम्मेलन में पढ़ी गई लघुकथाओं में लवलेश दत्त (बरेली) ने "नेकी की दीवार", प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र 'ने  'तितलियां', विजयानंद विज(मुजफ्फरपुर)'', ने' प्यासी नदी', राजप्रिया रानी ने ' परिवेश', पुष्परंजन कुमार ने'पॉर्न वीडियो', पूनम सिन्हा श्रेयसी  ने ' इंतजार', प्रियंका त्रिवेदी (बक्सर) ने "दहेज प्रथा", मीना कुमारी परिहार ने 'औरत तेरी यही कहानी', मधुरेश नारायन ने 'बिखरते रिश्ते', बिंदेश्वर प्रसाद गुप्ता ने' प्रतिक्रिया' लघुकथाओं का पाठ किया। इसके अतिरिक्त डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉक्टर शिवनारायण, डाॅअनिता राकेश, सिद्धेश्वर, पुष्पा जमुआर, सविता मिश्रा मागधी आदि ने भी लघुकथाओं का पाठ किया।

मुख्य अतिथि में डॉ सतीशराज पुष्करणा ने लघुकथा की सृजनात्मक प्रासंगिकता विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि- "  सिद्धेश्वर द्वारा आयोजित ऑनलाइन. लघुकथा सम्मेलन, अपने आप में समकालीन लघुकथा की प्रासंगिकता को नए अर्थ से अभिव्यक्त करने का प्रयास है। इसके पहले उन्होंने लघुकथा समीक्षक निशांतर की आकस्मिक मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए उनके व्यक्तित्व कृतित्व पर विस्तार से चर्चा की। 

विशिष्ट अतिथि डॉ. शिव नारायण ने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि इधर के वर्षों में अनेक रचनाकार सामने आये हैं जो अच्छा लिख रहे हैं |

विजयानंद विजय ने कहा-" मुझे खुशी है कि मेरी लघुकथा पर लघुकथा मर्मज्ञों की सकारात्मक टिप्पणियाँ आईं।यह लघुकथा अभी कुछ दिनों पहले अनुभव पत्रिका में प्रकाशित हुई है और मेरे सद्यः प्रकाशित लघुकथा संग्रह " संवेदनाओं के स्वर" का हिस्सा है।"

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉक्टर अनिता राकेश ने कहा कि सृजनात्मकता की प्रासंगिकता प्रश्नों के सलीब पर नहीं टंगती। लघुकथा की कृतियों में बहुरंगी पुष्पों का विकसित होना ही लघुकथा  के महत्व को रेखांकित करता है। सृजनात्मकता की प्रासंगिकता कभी प्रश्नों के सलीब पर नहीं टँगती | चाहे वह किसी भी विधा  की सृजनात्मकता हो | रचनाकार सदैव अपने समकालीन परिवेश से संचालित होता है, प्रभावित होता है  - यह अकाट्य सत्य है| लघुकथा की बगिया में  बहुरंगी पुष्पों का विकसित होना उसकी समृद्धि का ही द्योतक है | पुष्प छोटे ,बड़े ,सुगंधित, गैर सुगंधित रंगीन सभी प्रकार के हो सकते हैं और सब का अपना महत्व है | आवश्यक नहीं ये सभी फूल देवों पर ही चढ़ाए जाएं |कुछ बगिया की सुंदरता के लिए भी आवश्यक है |

इस संगोष्ठी में संजय राॅय, आलोक चोपड़ा, ऋचा वर्मा,पुष्पा जमुआर, वीणाश्री हेम्ब्रम, विनोद प्रसाद, घनश्याम समेत बड़ी संख्या में रचनाकारों ने अपनीउअपस्थ्तिति दर्ज की। 
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प्रस्तुति -  सिद्धेश्वर 
प्रथम प्रस्तोता का चलाभाष - 9234760365
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Tuesday, 21 July 2020

राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच' की बिहार इकाई की कवि गोष्ठी 19.7.2020 को सम्पन्न

फूल नहीं खिलते उपवन में काँटे बोने से / खुशियाँ नहीं मिला करती हैं जादू-टोने से

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दिनांक 19.7.2020 को 'राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच' की बिहार इकाई की ओर से दोपहर तीन बजे से रात्रि नौ बजे तक ऑनलाईन काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह गोष्ठी मंच के संस्थापक नरेश नाज़ की उपस्थिति  में हुई।

गोष्ठी की अध्यक्षत, मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष एम.एस.जग्गी  ने की। विशिष्ठ अतिथि; संस्था की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा सविता चड्ढ़ा  तथा राष्ट्रीय सलाहकार राजेंद्र निगम रहे। मंच का संचालन पूर्वी उत्तर प्रदेश की अध्यक्षा  मणिबेन द्विवेदी  ने किया।नरेश नाज़  द्वारा मां सरस्वती की वन्दना से कवि गोष्ठी का शुभारंम्भ हुआ।

गोष्ठी में भारत के बीस राज्यों के कवि-कवयित्रियों ने भाग लिया। सबने अपनी कविताएं, गीत, गजल, कजरी ; ऑडियो के माध्यम से सुनाईं ।

इक्कीस राज्य जिसमें, ओड़िसा, पंजाब,चंडीगढ, हरियाणा, दिल्ली, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तराखंड, आसाम, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, और कर्नाटक से 52 कवि,कवयित्रियों एवं  गजलकारों ने भाग लिया। सभी ने बहुत हीं सुन्दर, सुमधुर स्वर में समां बांधा और माहौल को गुलजार कर दिया ।

हरेंद्र सिन्हा ने मिलकर बातें की -
आओ हमतुम दोनों मिलकर बात करें मन की ,रे सजनी
गांठ खोलें मन की।
कभी तुम रूठी,कभी मैं रूठा 
अब बात करें मन की ,रे सजनी ।

किरण गर्ग (पटियाला) ने आजकल दूर कर लिया है खुद को एक नशे से -
मोहब्ब्त की बातें अब हमसे न किया करो
आजकल हम इस नशे से बहुत दूर रहते हैं
कभी रहते थे डूबे इश्क़ की मस्ती में
आजकल हर दर्द ओ गम से दूर बैठे है,,,,

डॉ.प्रणव भारती ने उम्र की रवानगी को कुछ यूँ बयां किया -
चिंदी चिंदी समय की कतरन,
देख देख घबराता ये मन।
आड़ी तिरछी सी रेखाएं ,
पोंछ पोंछकर जाता ये मन ।

डॉ श्रीलता सुरेश, बैंगलोर, कर्नाटक कोई बंधन नहीं मानती प्रेम में -
इस पर नहीं है बंधन
       किस पर कब आ जाएं
मनोभावों से सृजन कर
              अपना इसे बनाए

राशि श्रीवास्तव, चंडीगढ़ ने बड़ी मार्मिकता से कहा -
जीवन जो देती हमको 
उसे देंगे क्या भला 
मां मांगती कहां है कुछ 
दुआओं के सिवा

राजेन्द्र निगम 'राज' ने आंखें खोलीं भटके हुए लोगों की -
  गुरुग्राम
फूल नहीं खिलते उपवन में 
काँटे बोने से
खुशियाँ नहीं मिला करती हैं
जादू-टोने से

जिधर देखो सब सिर्फ माँ  की महिमा गाने में लगे हैं।  लेकिन डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार' जानते हैं कि पिता भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं -
पिता पर्वत है सूरज है,
सुबह की भोर लाली है 
पिता है घर में तो,हर रोज़ होली है दीवाली है ।
पिता ही दोस्त, साथी, मित्र
बंधु ,  है सखा अपना 
‘उदार’ हमने हैं देखे सब,
वही बगिया का माली है।


डॉ. मंजु रुस्तगी, चेन्नई उस सावन को बेकार मानती हैं जो साजन के बिन हो -
बिन साजन के आया सावन 
क्या क्या करूँ जतन, 
कैसे धीर धरे ये मनवा, 
चैन न पाए तन--- 

महेन्द्र जैन, हिसार हर सजा को तैयार हैं कोई उनका ज़ुर्म तो बताए -
ज़ुर्म क्या है मेरा ये बता दीजिए
फिर जो चाहे मुझे वो सजा दीजिए
आ गया तेरे मयख़ाने में साक़िया
आज जी भर के मुझको पिला दीजिए

अरुण दुबे  मध्यप्रदेश ने शायरी के करीब आने का राज बताया - 
सच से ऐसा हुआ सामना बेख़ुदी के करीब आ गए
इश्क़ में चोट खा खा के हम शायरी के करीब आ गए

     
डाः नेहा इलाहाबादी (दिल्ली) ने देश की हिफाज़त में लगे लोगों को गम्भीर होने को कहा -
अँधेरे कूकते  हैं बागबाने,
          दिल  की  गलियों  में ।
कहर  बरपा  न हो  जाए,
         कहीं मासूम कलियों में ।।
हिफा़जत देश की है आज ,
         जिन लोगों के काँधे पर ।
वही  खोए  हुए  हैं आज ,
           बहशी  रंग  रलियों  में ।।

सरला विजय सिंह 'सरल' चेन्नई ने देशभक्ति की मशाल जलाई -
हिंद के निवासी हैं तो हिंदी के लिए दिलों में 
गीत वंदे मातरम जीवंत होना चाहिए 

भारती जैन 'दिव्यांशी' ने गीत को सरगम पर ढाला -
मेरे गीत तुम्हारी सरगम,  अधर -अधर पर जब महकेंगे
कितने ही मन व्याकुल होंगे, कितनों की उर पीर हरेंगें

विजय मोहन सिंह, चेन्नै मे सीमा की स्थिति का जायजा लिया - 
उनसे कह दो कि ना देखें वो,  इस तरह से बदगुमान.. 
सीमाएं हमारी चाक-चौबंद हैं, 
डटे खड़े हैं वीर जवान..

मंजु महिमा भटनागर, अहमदाबाद ने बढ़ती उम्र की दास्तां बताई -
ज्यूं ज्यूं उम्र बढ़ती है, मन पीछे लौटता है,
किसे ढूँढता है? कुंआरी क्यारियों में छिपे,
संजीवनी के बीज या फिर अग्नि- कुसुम. -- 

राजेश अनुभव  झारखंड आसपास चल रहे महाभारत की बात कही -
हमारे आसपास भी
एक महाभारत पल रहा है।
अनजाने शत्रुओं से
हमारा एक युद्ध चल रहा है।

डॉ सुमन दहिया, जयपुर राजस्थान ने पुराने  दिनों की बात बताई -
यह तब की बात है ........
जब जीना सीखा न जाता था
हम यूं ही बिंदास जिया करते थे 
हम भी रईस हुआ करते थे
यह तब की बात है.........…

सुधा सिन्हा सावन के झूलों को खूब पसंद करती दिखीं -
सावन के झूले लगने लगे
गुलशन फूलों से सजने लगे 

धन्यवाद ज्ञापन मणिबेन द्विवेदी  ने किया।  गोष्ठी के समापन की घोषणा मंच के राष्ट्रीय महासचिव  हरेंद्र सिन्हा ने की।
.......

रपट के प्रस्तोता - हरेंद्र सिन्हा /  हेमन्त दास 'हिम'
प्रस्तोता का ईमेल आईडी - 
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अजगैवीनाथ साहित्य मंच, सुलतानागंज (भागलपुर) द्वारा अंतरराष्ट्रीय आभासी कवि गोष्ठी 19.7.2020 को सम्पन्न

ये दरिया रूख बदलना चाहता है
ब्रह्मलीन कवि कैलाश झा किंकर को सभी कवियों  ने श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई

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(भावानंद सिंह प्रशांत एक ओजस्वी रचनाकार हैं जो अंगिका और हिंदी में रचनाकर्म करते हैं तथा सुल्तलनगंज में सक्रिय अपनी संस्था के माध्यम से नियमित रूप से कवि-गोष्ठी का आयोजन करते रहते हैं. लॉकडाउन के करणों से आजकल ये गोष्ठियाँ आभासी (ऑनलाइन) हो रही है तो इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने अमेरिक, कनाडा, नेपाल के हिंदी साहित्यकारों को इकट्ठा करते हुए और उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महराष्ट्र , बिहार के साहित्यकरों के साथ एक जोरदर कवि-गोष्ठी कर डाली. ऐसी ही एक गोष्ठी की रपट नीचे देखिए-  सम्पादक)

अजगैवीनाथ साहित्य मंच सुलतानागंज भागलपुर के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय आनलाइन कवि गोष्ठी का आयोजन मंच के संस्थापक सदस्य डॉक्टर श्यामसुंदर आर्या की अध्यक्षता में दिनांक 19.7.2020 को आयोजित की गई जिसका संयोजन खडगपुर के ख्यातिलब्ध शायर ब्रह्म देव बंधु ने किया और संचालन मंच के अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत ने किया। यह आयोजन देश-विदेश की शामिल कवियित्रियों के नाम रहा जिसमें सिअट्ल (अमेरिका) ,काठमांडू (नेपाल) ,टोरंटो (कनाडा) के अलावा पानीपत, सोनीपत (हरियाणा), गोरखपुर, खीरी, आगरा (उ/प्र.), मुंबई तथा बिहार के कवि-कवयित्रियों ने भाग लिया। सभी आमंत्रित कवयित्रियों को साहित्य रत्न सम्मान से मंच द्वारा सम्मानित किया गया।

सर्वप्रथम गोरखपुर से सुनीता सामन्त ने अपनी कविता से सबको सराबोर कर दिया. उन्होंने कहा -
 चलो मोहब्बत की कश्ती में बैठ, 
फरिस्तों के उस देश चलें ,
जहाँ चाँदी सी चमकती नदी बहती है...। 

वहीं टोरंटो (कनाडा) से कवियित्री रीनू शर्मा ने समां बाँधा - 
अब मेरी सहमी सी वो सूरत न रही 
चश्म नम करने की तो आदत न रही 
हम तलब में ही तेरी बेताब रहे
,पास तेरे ही कभी फुरसत न रही।

सिअट्ल (अमेरिका) से कविता माथुर ने कविता के माध्यम से कहा - 
लकीरबद्ध सभ्यता ओ संस्कृति की तरह 
सर्द मौसम में जमी हुई हिमनदी की तरह 
अब कतरा बन पिघलना चाहता है 
ये दरिया रूख बदलना चाहता है । 

अंजू डोकानिया ने काठमांडू (नेपाल) से एक सुरीला गीत सुनकर सबको झुमने पर मजबूर कर दिया - 
मास सुहावन रीतु मनभावन ,
मेघ बहार छाई सी ,
शीतल चंदन सी पवन बहे ,
बरखा बूंद अकुलाई सी । 

खीरी (उ.प्र.) से मोहिनी गुप्ता ने अपनी रूमानी गजल सुनाकर मन मोह लिया - 
कई जन्मों के पुण्यों का मिला उपहार ही हो तुम 
करू मैं गर्व जिसपर वो मेरा तो प्यार ही हो तुम ।

सोनीपत हरियाणा से राधिका राधा जयसवाल ने अपनी गजल से प्रेम का अंदाज बयां किया - 
दूर हमसे तो न यूं रहा कीजिए
कम से कम इतनी हमसे वफा कीजिए 
हम यहाँ तक चले आए हैं इश्क में 
आप भी तो जरा हौसला कीजिए। 

मुंबई से नीलिमा दूबे पांडे ने दोहा के माध्यम से कहा - 
दर्द सहे पीड़ा सहे,रहे व्यथा से चूर।
असली शालीग्राम है ,धरती का मजदूर ।।

पानीपत हरियाणा से सोनिया अक्स ने समकालीन व्यवस्था पल प्रहार करते हुए कहा -
कोई मासूम सा जब शजर देखिये ,
काटने वाले हैं किस कदर देखिये ,
मौन धारण किया है समंदर ने फिर, 
सहमी सी है नदी की लहर देखिये । 

वहीं आगरा से कवियित्री निभा चौधरी ने गजल कही  - 
रौशनी के घरों में अंधेरे मिले , 
धुंध का शाल ओढ़े सवेरे मिले ।

वहीं उषाकिरण साहा ने बेटी भ्रूण हत्या पर बेटी पर संताप करते हुए अपने शब्दों में कहा -
क्या गलती मेरी थी ओ माँ ,क्या मैने किया था गुनाह ।

मुंगेर से शायर विकास ने कहा - 
हर कदम साथ मुस्कुराहट है ,
दूर रहती अभी थकावट है ,
क्या किसी ने कोई शरारत की ,
आज गलियों में सुगबुगाहट है ।

ख्याति लब्ध शायर राजेंद्र राज ने कहा - 
ऐसी तन्हाई है तन्हाई नहीं ,
शौक फिर भी मिरा जुदाई नहीं।

मंच के अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत ने कहा - 
शहर के हर मोड़ पर गाँव जिन्दा है , 
है उदर में भूख मन में छाँव जिन्दा है ।
हम पसीने से नहाएं धूप की खातिर , 
हम चलेंगे मंजिल तक ,पाँव जिन्दा है । 

वहीं खड़गपुर के ख्याति लब्ध शायर व कार्यक्रम के संयोजक ब्रह्मदेव बंधु ने अपनी गजल म़े कहा -
इन पुराणों में पता भी ढ़ूंढ़ लेंगे, 
पर्वतों में हम सदा भी ढ़ूंढ़ लेंगे, 
दिल में लोगों ने दबा रख्खी है चिंगारी,
उसकी खातिर वो हवा भी ढ़ूंढ़ लेगें ।

बरियारपुर के गजल गो दिलीप कुमार सिंह दीपक ने कहा -
इश्क और शराब का गुलाम है दुनिया । 

वहीं मंच के संस्थापक सदस्य ने एक गीत गाकर मन मोह लिया - 
जिन्दगी अपना ठिकाना ढ़ूंढ़ ले 
जीने का कोई बहाना ढ़ूंढ़ ले 
हमसफर कोई नया मिलता नहीं 
यार ही कल का पुराना ढ़ूंढ़ ले । 

युवा कवि मनीष कुमार गूंज ने बच्चों को प्रेरित करती अंगिका कविता का पाठ किया - 
चुपा चुपा रे नूनू रे चुप रे ,
तोरा हटिया मे देबौ गुपचुप रे । 

अंत में ब्रह्मलीन कवि कैलाश झा किंकर को सभी कवियों  ने श्रद्धांजलि अर्पित की ।
......

रपट के लेखक - भावानंद सिंह 'प्रशांत'
रपट के लेखक का ईमेल आईडी -
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Sunday, 19 July 2020

यथार्थवादी शायर कैलाश झा किंकर

धन जोड़ते जाते  मगर / खुशियां नहीं टकसाल से
अति-लोकप्रिय प्रखर दिवगंत कवि कैलाश झा किंकर को श्रद्धांजलि स्वरूप  (पुण्य तिथि - 13.7.2020)

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अंतिका और हिंदी के प्रसिद्ध कवि कैलाश झा किंकर


हिंदी और अंगिका में अपनी सशक्त लेखनी के बलबूते खगड़िया की उर्वर साहित्यिक माटी की उपज शायर कैलाश झा किंकर किसी परिचय के मोहताज नहीं बल्कि दर्जनों पुस्तकें लिखकर उन्होंने हिंदी काव्य-संसार में अपनी सिद्धस्तता का लोहा मनवा लिया और विशिष्ट पहचान कायम की, जहां वे आजीवन अपनी साहित्य-साधना में लीन रहकर अन्य साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी करते रहे। अनेकानेक सम्मानों से सम्मानित कविवर किंकर हिंदी साहित्य परिषद खगड़िया के महासचिव और 'कौशिकी' त्रैमासाकी के यशस्वी संपादक के रूप वर्षों से अपने साहित्यकार मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय थे। ग़ज़ल उनकी सर्वप्रिय विधा थी जिसमें उनके आधे दर्जन से भी अधिक संकलन प्रकाशित  हो चुके हैं---'हम नदी की धार में', ' देखकर हैरान हैं सब', ' ज़िन्दगी के रंग हैं कई' ,'मुझको अपना बना बना के लूटेगा', ' गज़ल तो गां-घर में पसर चुकी है' आदि, जिसमें 'मुझको अपना बना के लूटेगा' 'की ग़ज़लों ऐसी धूम मचाईं कि समूचा साहित्य-संसार इन्हें निहारने लगा। जहां वे अपनी शायरी में जीवन की तमाम सच्चाइयों की यथार्थपरक तस्वीर उतारने में सफल रहे।

कल्पनालोक से उतरी ग़ज़ल लेखन की परंपरा ने जब यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर अपने कोमल और ख़ूबसूरत पांव धरे तो फिर कल्पनालोक की इंद्रधनुषी चमक यों ही दूर होती गई जिसका परिणाम हुआ कि रमणियों  के सौंदर्य की चकाचौंध की जगह पीड़ित अबलाओं की आह के आंसू हिंदी ग़ज़लों की मंदाकिनी में बहने लगे। और इसी परिदृश्य के मध्य गज़लकार कैलाश झा किंकर का अभ्युदय हुआ जिसने आम आदमी की ज़िंदगी के यथार्थ को एक संजीदा एडवोकेट की भांति सवालिया लहजे में उठाना शुरू कर दिया । घर-घर में घटित होने वाली घटनाओं की न सिर्फ उन्होंने आग ली बल्कि उससे नि:सृत धुओं को भी उन्होंने छोड़ना मुनासिब न समझा:
" ज़िन्दगी क्या है? बता पाता है
जब बुढ़ापे का वक़्त आता है।
जो भी आया है, उसे जाना है
चंद दिवसों का फक़त नाता है।
घोंसले में जो कलह हो हरदम
चैन जीवन का चला जाता है।" 

तो बेरोजगार बेटों से त्रस्त -अभ्यस्त  परिवार के  उस चित्र पर भी दृष्टि डालें जहां अभी-अभी नौकरी की सौगात आई है:
" जीवन में खुशहाली आई
   सब होंठों पर लाली आई।
   बेटों को अब मिली नौकरी
    मुस्काती घर वाली आई।
   दिनभर होली होली थी तो
    सचमुच रात दिवाली आई।" 

तो सचमुच घर में उल्लास रूपी पंछी ने घोंसला ही बना डाला तो शायर का मन भी मचल उठा:
    " आ गए उल्लास के दिन।
       मिट गए संत्रास के दिन।
       लोग   करते  हैं  प्रशंसा
      अब नहीं उपहास के दिन।
       अन्न से घर  भर गया  है
       अब गए उपवास के दिन।" 

कवि को कभी घर की चिंता तो कभी समाज की फिक़्र ने चैन से रहने-जीने न दिया। गंगोत्री -सी खिलखिलाती कभी खुशियां इनके आंगन उतरती तो बाढ़-सी परेशानियां भी उनके घर की हंसी-खुशी को बहाकर ले जातीं :
     " सुंदर घर-परिवार लगे।
        सबसे ऊपर प्यार लगे।
        माता जी का आंचल ही
        जीवन का आधार लगे।
        बाबू  जी  के  बाजू   तो
        नावों की पतवार  लगे। " 

लेकिन बहुत सारी घटनाएं तो जीवन में आती रहती हैं, अभाव -ग़रीबी और अजनबीपन के नाग ने भी घर के  किसी कोने में  कुंडली मार लिया है और  इन्हीं दुखों की इस परिधि में जीते हुए आदमी की जिजीविषा जब कुछ सांसें लेने लगती हैं तो नज़रों से कुछ-कुछ दिखाई भी पड़ने लगती है तो कविवर किंकर भी आशान्वित हो उठते हैं:
    " 'किंकर' आज भले किंकर
       पुत्र 'शंकरानंद ' हुआ  है।"

मगर सारी खुशियां तब काफ़ूर हो जाती हैं जब औफिस के काइयां बड़ा बाबू की जेब में ही सारे विपत्र अंटके कुछ 'आक्सीजन' की मांग करते  नजर आते हैं तो पीड़ित अवाम कलेजा थामकर गेट पर ही बैठ जाता है:
        " बात-बात  में   उठा  पटक।
          बिल सभी गये हैं फिर लटक।
          जीतने  को  तिकड़मी   हुए
          लोकतंत्र  के   सभी   घटक।
          अफसरों की चाल चल  गई
          डर से सब गये हैं अब सटक।"

कार्यालयीन तिकड़मों की ऐसी जीवंत तस्वीर भला कौन खींच सकता है तो ऐसी वारदातों से मन का  खिन्न होना स्वाभाविक है । तभी तो शायर कैलाश झा किंकर के मन में  ऐसी ख़्वाहिशों ने जन्म लेना शुरू कर दिया कि तो उनकी कलम दार्शनिकता के आकाश में उडा़न भरने लगती है:
  " एक ही ख़्वाहिश हमारी, एक ही अरमान है।
    तब तलक जिंदा रहें हम, जब तलक सम्मान है।
   रोशनाई  से  रचे  सब पात्र हो  जाते  अमर
   मांस, हड्डी ,खून का पुतला बड़ा नादान  है।
    आदमी से आदमी की दूरियां खलने लगीं
   व्यर्थ की बातों में शायद खो गई पहचान है।"

लय-छंद और बह्रों के गंभीर प्रवक्ता किंकर जी को हिंदी छंद और उर्दू बह्रों की अच्छी पकड़ थी। यही कारण है कि बिना छंद और लय की रचनाओं से दूरी बनाए रहते थे और इनकी ग़ज़लें भी हमेशा बाबह्र ही हुआ करती हैं।छंदमुक्तता के वे कभी हिमायती न रहे जिसे उनके चंद अश्'आरों में झलक देखी जा सकती है:
     " संगत ढोलक-झाल से
       गाएं जरा सुर-ताल से
       धन जोड़ते जाते  मगर
       खुशियां नहीं टकसाल से।
      ' किंकर' सुनहरी पत्तियां
       रोती बिछुड़कर डाल से।"
या,
       "नज़रों की पहचान  गई
         जब से दौलतमंद हुआ है।
         गद्य- पद्य का सब भेद  मिटा
         यह भी कोई छंद हुआ है?"

उपर्युक्त अश्'आर में यह भी द्रष्टव्य है कि इनके लिए दौलत ही सबकुछ नहीं है और वे साहित्य को ही सबकुछ समझते हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा ही उनके लिए सर्वोपरि है । तभी तो वे उन पियक्कड़ों को भी नसीहत देने से न चूकते, जब अपने ही खानदान या गांव के किसी ने ऐसी हरकतें की होगी:
  " बूंद ओंठ पर पर मैंने कभी ली ही नहीं
    पर प्रतिष्ठा रात-दिन की आबकारी में गई।
    खानदानी थी दौलत हम ग़रीबों के लिए
   कुछ शराबी में गई तो कुछ जुआरी में गई।

घर-द्वार, समाज ,चौक-चौराहों से होती हुई किंकर जी की ग़ज़लें राजनीति के दरबार में नहीं बल्कि चौखटे तक पहुंचकर उसे आंखें दिखाने और ललकारने में भी पीछे नहीं रहती। जरा देखें हम इनके चंद अश्"'आर को:
  " पग -पग कौन सहारा देगा।
     बहुत हुआ तो नारा देगा।
     धोखा जो इक बार दिया है
     धोखा वही दुबारा देगा।"

इस तरह इनकी ग़ज़लों के चंद अश्'आर की पड़ताल से हम निश्चित ही उस गवाक्ष तक पहुंचते जहां से शायर की लेखन -प्रविधि, उसके सामाजिक -राजनीतिक-आर्थिक चिंतन और हृदय की गहराइयों में मानव-कल्याण  के लिए कितने दर्द समाहित हैं जिसे हम कल्पना की नाव में  बैठकर नहीं बल्कि यथार्थ के हिमालय पर चढ़कर ही दर्शन कर सकते हैं। एतदर्थ हम कह कह सकते हैं कि शायर कैलाश झा किंकर निश्चित ही यथार्थवाद के शायर हैं मात्र कल्पना में जीना उनके कृतित्व की नियति नहीं रही है।
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लेखक - ज्वाला सांध्यपुष्प
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