Friday, 21 June 2019

अस्मिता पर्व : पुस्तक-समीक्षा : विनोद कुमार सिंह रचित कथा-संगह / समीक्षक - किरण सिंह

विवाह और मर्यादा के बीच प्रेम की तलाश

(आज का fb watch  देखने के लिए-  यहाँ क्लिक कीजिए)



मन के क्षितिज में उमड़ती - घुमड़ती भावनाओं की बदरी हमेशा ही बरसने को आतुर रहतीं हैं और  बरस कर वहाँ के जनमानस को तो तृप्त करतीं ही हैं साथ ही उन्हें स्वयं भी तृप्ति का आभास होता है। कुछ ऐसी ही तृप्ति का आभास कथा संग्रह अस्मिता पर्व के लेखक विनोद कुमार सिंह को भी निश्चित ही हुआ होगा जब उन्होंने पुस्तक के नाम के अनुरूप ही खूबसूरत आवरण में सुसज्जित अपने इस कथा संग्रह स्मिता पर्व को अपने हाथों में लिया होगा। फिर भी एक लेखक की आत्मा तब तक पूर्ण तृप्त नहीं होती जब तक कि उसके लेखन को पाठको के द्वारा स्वीकारी और सराही न जाये। और जब संग्रह प्रथम हो तो उद्विग्नता और भी बढ़ जाती है। 

पुस्तक की पहली कहानी "अस्मिता पर्व" एक स्त्री की डायरी है जिसमें उसके जन्म से लेकर विवाह के उन्नीस साल तक के सफर का बहुत ही सूक्ष्मता से विस्तृत वर्णन किया गया है। इस कहानी में एक मजबूर पिता अपनी पुत्री लावण्या का विवाह एक अकर्मण्य शराबी से कर देता है जो अपनी पत्नी की प्रतिभा और सुन्दरता की दास्तान अपने इष्ट मित्रों तथा सगे सम्बन्धियों से सुनकर कुण्ठा से ग्रस्त हो जाता है। परिणाम स्वरूप वह अपनी पत्नी लावण्या के साथ मनमानी करता है और उसे शारीरिक तथा मानसिक यातना देता रहता है फिर भी स्त्री आम भारतीय महिलाओं की ही तरह अपना पत्नी धर्म निभाते हुए इस यातना को अपनी नियति मानकर झेलती रहती है ताकि रिश्ता बचा रह सके। जब घर में आर्थिक तंगी होती है तो वह मेहनत और प्रतिभा के बल पर आगे की पढ़ाई कर नवोदय विद्यालय में प्रवक्ता के पद पर पदस्थापित हो जाती है लेकिन उसके पति का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। 

किन्तु जब उसके पति का अत्याचार अब उसकी पुत्री पर भी बढ़ने लगता है तो वह पति से अलग होने का निर्णय लेती है और मनाती है अस्मिता पर्व।

कथा संग्रह की दूसरी कहानी "गोधूलि वेला" एक खूबसूरत और पाक प्रेम कहानी है जिसमें नायक और नायिका को किशोरावस्था में ही प्रेम हो जाता है लेकिन जाति-बंधन उनके विवाह में आड़े आता है। फलस्वरूप नायक का विवाह किसी और से हो जाता है लेकिन नायिका अविवाहित रहने का फैसला लेती है। फिर भी दोनों का मिलना - जुलना कायम है पर कभी उनमें शारीरिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता है। लेकिन समाज को तो यह भी मंजूर नहीं होता और जीवन के गोधूलि वेला में वे अलग हो जाते हैं।

संग्रह की तीसरी कहानी परछाइयाँ "अपराधबोध" की एक पिता की ऐसी संतान की कहानी है जो बीमार पिता के इलाज के लिए एक अन्जान व्यक्ति जिससे एक अपनापन सा महसूस होता है से सहायता मांगती है लेकिन वह सरकारी काम में व्यस्तता के चलते उसकी मदद नहीं कर पाता है । पिता की मृत्यु के पश्चात हताश होकर पुत्री भी प्राण त्याग देती है और वर्षों बाद उस व्यक्ति को ये बात पता चलती है तो वह अपराधबोध से ग्रसित हो जाता है। 

और चौथी कहानी "पश्चाताप" में उस रात को हिन्दू मुस्लिम समुदाय के बीच पनपते अविश्वास के कारण रातभर मानसिक यातना झेलने पर विवश होने की उहापोह को बहुत ही बारीकी से वर्णन किया गया है। 

इस तरह संग्रह की पाँचवी कहानी "वह बेवफा नहीं थी", छठी "बेबसी", सातवीं "मैं अभियुक्त हूँ" तथा आठवीं "नई सुबह" सभी प्रेम कहानियाँ हैं। 

इन कहानियों की विशेषता यह है कि नायक नायिका के मध्य प्रथम प्रेम पुष्प की महक ताउम्र रहती है भले ही कितनी भी दूरियाँ और मजबूरियाँ क्यों न हों। हाँ, उन्होंने कभी भी अपनी मर्यादा का लक्ष्मण रेखा लांघने का प्रयास नहीं किया है। 

संग्रह की अंतिम और नवीं कहानी "कतरा-कतरा जिंदगी" में त्रिया चरित्र के वीभत्स रूप को दिखाया गया है जिसमें एक स्त्री अपने से कम उम्र के युवक की मजबूरियों का फायदा उठाकर अपनी शारीरिक पिपासा को शान्त करती है और जब वह युवक इस पाप कर्म से मुक्त होना चाहता है तो उसे बदनाम कर देती है। 

इस प्रकार इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। अतः रोचक, प्रेरक, तथा कौतूहल पूर्ण हैं। हाँ, यदि पहली कहानी अस्मिता पर्व का कथानक बहुत सशक्त है। यदि इसे लघु उपन्यास का रूप न देकर कहानी ही रहने दिया जाता तो मेरे ख्याल से और भी रोचक और सुन्दर होता।  

संग्रह में कुल नौ कहानियाँ हैं जो एक सौ निन्यानवे पृष्ठों में समाई हैं। कहानियों में प्रवाह है तथा भाषा सरल है अतः पाठकों के मन मस्तिष्क पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता है। कहानियाँ जहाँ पहले प्यार की खूबसूरती, पवित्रता तथा विवशता का सजीव चित्रण करते हुए पुरानी पीढ़ी को अपने अतीत में ले जाती है वहीं नई युवा पीढ़ी को आश्चर्य में डाल देने वाली हैं कि प्रेम का स्वरूप ऐसा भी होता था। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी के लिए तो 'लव' और 'ब्रेकअप' आम बात हो गई है। 

पुस्तक की छपाई तो स्पष्ट है लेकिन कहीं-कहीं शब्दों की अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं जिसके लिए प्रकाशक दोषी है। 

हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक पठनीय तथा संग्रहणीय है। पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है। मूल्य भी कम ही है

इस खूबसूरत संग्रह के लिए हम इस पुस्तक के लेखक विनोद कुमार सिंह बधाई के पात्र हैं और हम आशा करते हैं कि आगे भी हम उनके लेखन का रसास्वादन करते रहेंगे। 
.......

अस्मिता पर्व - कथा संग्रह
लेखक - विनोद कुमार सिंह 
प्रकाशक - साहित्यपीडिया पब्लिशिंग, पृष्ठ - 199 , मूल्य - 250 रुपये 
समीक्षक- (श्रीमती) किरण सिंह
समीक्षक का ईमेल आईडी - kiransinghrina@gmail.com
समीक्षक का मोबाइल नं- 9430890704
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com

समीक्षक - किरण सिंह


Wednesday, 19 June 2019

बज़्मे हफ़ीज़ बनारसी द्वारा हफीज बनारसी की याद में एक मुशायरा पटना में 16.6.2019 को सम्पन्न

मैं भी ‘हफ़ीज़’ उनका पैग़ाम चाहता हूँ

(विविध भा. भाषा संस्कृति संगम द्वारा उपन्यास 'नंदिनी का लोकार्पण की रपट के लिए- यहाँ क्लिक कीजिए)



भूलेगा कोई कैसे ‘हफ़ीज़’ अपने वतन को
काबे में भी काशी की गली याद रहेगी

मुद्दत की तश्नगी का इनआम चाहता हूँ
मस्ती भरी नज़र से इक जाम चाहता हूँ
कल हमसे कह रहा था शोहरत तलब ज़माना
तुम काम चाहते हो मैं नाम चाहता हूँ
बादे-सबा से कह दो मेरी तरफ़ भी आये
मैं भी ‘हफ़ीज़’ उनका पैग़ाम चाहता हूँ

इस नाम की निस्बत से खाए हैं फ़रेब इतने
भूले से मुहब्बत का अब नाम नहीं लेंगे
या सब को पिला साक़ी, या हम को भी प्यासा रख
तनहा तेरे हाथों से हम जाम नहीं लेंगे

हरचंद ग़म के हाथों सताये  हुए तो हैं
हम ज़िन्दगी का बोझ उठाये हुए तो हैं

ज़िन्दगी तो उसी की है जिस पर
वह नज़र मेहरबान होती है
इश्क़ की ज़िन्दगी ‘हफ़ीज़’ न पूछ
हर घड़ी  इम्तहान होती है

बला की नजाकत के साथ जिंदगी के फलसफे को बयाँ करनेवाले हफीज बनारसी की याद में एक शानदार कार्य्रक्रम हाल ही में हुआ जिसमें पटना और आसपास के नामी गिरामी शायरों और नए लोगों ने पूरी गर्मजोशी से शिरकत की।

रविवार दिनांक 16 जून 2019 को मरहूम उस्ताद शायर हफ़ीज़ बनारसी के यौमे-वफ़ात के मौके पर "बज़्मे हफ़ीज़ बनारसी : मरकज़-ए-रंग-ए-हुनर" (उनके शागिर्द और वरिष्ठ शायर रमेश 'कँवल' द्वारा स्थापित एक संस्था) ने "एक शाम हफ़ीज़ बनारसी के नाम" से एक मुशायरा बिहार उर्दू अकादमी के सभागार में मुनअक़िद किया था। 

इम्तियाज़ अहमद करीमी निदेशक राजभाषा विभाग(उर्दू),  बिहार सरकार, कार्यक्रम के मुख्य तिथि थे। अन्य ख़ुसूसी शख्सियतों में, जिन्होंने कार्यक्रम को अपनी मौजूदगी से नवाज़ा उनमें प्रमुख थे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ, बिहार उर्दू अकादमी के सचिव अजीमुल्लाह अंसारी, प्रो. अलीमुल्ला हाली, खुर्शीद अकबर, मोतबर उस्ताद  हफ़ीज़ बनारसी के दो सुपुत्र अख़्तर मसूद व अब्दुल क़ादिर। 

मुख्य अतिथि मो इम्तियाज़ अहमद करीमी ने बज़्म की स्मारिका का विमोचन करते हुए इसके संस्थापक रमेश कँवल की भूरी भूरी प्रशंसा की और कहा कि आज की तिथि में रमेश कँवल ऐसी शख़्सियत हैं जो अपने उस्ताद हफ़ीज़ बनारसी की याद में ऐसी शामें मुनअक़िद कर रहे हैं । इस अवसर पर रमेश कँवल जी की ग़ज़लों और नज़्मों के संग्रह “स्पर्श की चांदनी” का भी लोकार्पण किया गया । 

हफ़ीज़ बनारसी की अज़ीम शख़्सियत और शायरी पर ख़ुसूसी मेहमानों के इज़हार-ए-ख़्याल के बाद जिंदगी, मुहब्बत और मयखाना मौजू पर हफ़ीज़ बनारसी के अश'आर मरकज़ के मेम्बरान ख़्वातीन-ओ-हज़रात की जुबानी शाम को और दिलशाद व रंगीन कर गई।  हफ़ीज़ बनारसी साहब के दो मिसरा-ए-तरह “अपनी न है यारों पराई है जिंदगी” और  "मीर सी कोई ग़ज़ल हो ये कहाँ मुमकिन है" पर मरकज़ के मेम्बरान व पटना के बाहर से आये शोअरा-ए-एकराम ने अपने क़लाम पेश किए।

आराधना प्रसाद  ने ज़िंदगी पर अपने अशआर पेश किये-
मौत को भी मार आई ज़िंदगी
दार पर यूं  मुस्कुराई ज़िंदगी
सारा आलम रौशनी से भर गया
नूर में जिस दम नहाई ज़िंदगी
भूल कर मैं भूल ही करती रही
कब हुई अपनी, पराई ज़िंदगी
चार जानिब आ गया सैलाब फिर
आंसुओं से जब नहाई ज़िंदगी
ऐसा लगता है मुहब्बत हो गई
आप  आये  मुस्कुराई  ज़िंदगी
बारहा बेचैनियां, बर्बादियां
ज़िंदगी भर डगमगाई ज़िंदगी

शकील सासरामी  ने मैखाने के नाम से अपनी कई बेशकीमती बातें कही-
उदास क्यों है मेरी  ज़िन्दगी का मयख़ाना
कहॉ मिलेगा बताओ ख़ुशी का मयख़ाना
चहार सम्त अंधेरा है गुमरही का यहां
मिले कहीं तो मिले रौशनी का मयख़ाना
मेरी  निगाह में बज़्मे-हफ़ीज़  ऐ लोगो
ग़ज़ल  की शक्ल में है शायरी का मयख़ाना
शकील कर ली जो तौबा शराब से मैंने
भरा नहीं है कहीं भी किसी का मयख़ाना।

घनश्याम ने अपनी सांसों, धड़कनों में समाई हुई ज़िंदगी की बात की-
जन्नत से चल के सामने आई है ज़िंदगी
साँसों में, धड़कनों में समाई है ज़िंदगी
उस बागबां के हाथ का जादू तो देखिए
सूखे हुए शजर ने पाई है ज़िंदगी
जब ज़िंदगी की डोर भी औरों के हाथ हों
तो जान लीजिए कि पराई है ज़िंदगी
इस ज़िंदगी को खून-पसीने में सींचकर
'घनश्याम' ने जरा सी कमाई है ज़िंदगी।

सुनील कुमार ने वक्त के उर्दू और हिंदी के मिश्रण का अनोखा अंदाज दिखाया-
वक़्त सबका ही प्रबल हो ये कहाँ मुमकिन है
एक सा तेज हो बल हो ये कहाँ मुमकिन है
दिल ने संताप कई झेले थे हँसते हँसते
अब ये पहले सा सबल हो ये कहाँ मुमकिन है
मैं भी आया तो हूँ उम्मीद लिए महफ़िल में
मीर सी कोई ग़ज़ल हो ये कहाँ मुमकिन है
ज़ुल्फ़ शानों पे किसी रोज़ जो लहरा जाती
मन में खिलता न कँवल हो ये कहाँ मुमकिन है
है बसी सूखे गुलाबों की महक साँसों में
भूलना तुमको सहल हो ये कहाँ मुमकिन है
रोज़ वादों का पिटारा ही लिए फिरते थे
इक मुनासिब सी पहल हो ये कहाँ मुमकिन है

मो. नसीम अख्तर ने ज़िंदगी को तकब्बुर न करने की सलाह कुछ इस तरह से दी -
ख़ाक होती है दुनिया में हर ज़िन्दगी
इसलिए तू तकब्बुर न कर ज़िन्दगी
तुझको कहता मैं रश्के क़मर ज़िंदगी
चार दिन की न होती अगर ज़िन्दगी
एक दिन होगी अपनी सिफर ज़िन्दगी
मौत का कर रही है सफर ज़िन्दगी
दाल रोटी पे आफत हमारे लिए
हम ग़रीबों की ख़ातिर सक़र ज़िन्दगी
छोड़िए डरना मरना तो है एक दिन
चैन से आप करिए बसर ज़िन्दगी
जैसा बोते हैं हम वैसा हैं काटते
अपने कर्मों का "अख्तर "समर ज़िन्दगी।

डॉ आरती कुमारी वो शायरा हैं जो ख़ार से उलझते हुए भी फूल सी महकती शायरी करती हैं - 
ख़ार से भी उलझती रही ज़िंदगी
फूल बन के महकती रही ज़िंदगी
वक़्त की कैद में सांस की है लड़ी
लम्हा लम्हा तड़पती रही ज़िन्दगी
इश्क़ में वस्ल कम था, जुदाई बहुत
करवटों में सिसकती रही ज़िंदगी
कौन समझायेगा ज़ीस्त का फ़लसफ़ा
आज खुद ही समझती रही ज़िंदगी
मैं उठाती रही नाज़ इसके सभी
इसलिए तो बहकती रही ज़िन्दगी

डा.अर्चना त्रिपाठी अपनी गुबारो-गर्द ज़िंदगी को भी सार्थक मानती हैं क्योंकि वो किसी की राहते-जाँ हैं- 
उनकी नज़र में राहते-जां से न है ये कम
मेरी नजर  में  है गुबारो-ग़र्द जिंदगी
न बंदगी, न सज्दा ख़ुदा का कभी किया
फिर आपके लिए तो है सहरा ये ज़िन्दगी

पूनम सिन्हा श्रेयसी का मानना है कि मुहब्बत में आँखें बन जाती हैं जुबाँ -
मुहब्बत में कोई गिला तब कहाँ था
दिलों में रखें फासला तब कहाँ था।
मुहब्बत में आँखें बनी है ज़ुबाँ भी
कि बातों का ये सिलसिला तब कहाँ था।
मुहब्बत में दिल ये परेशाँ रहे क्यों
करें जो तुरंत फैसला तब कहाँ था।
मुहब्बत में हारे कि जीते दिलों को
हिक़ारत से दिल अब मिला तब कहाँ था।
किये जा रही क्यों मुहब्बत है 'पूनम'
बढ़ा जो अभी हौसला तब कहाँ था ।

डॉ. सुधा सिन्हा ने अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी जिसकी पंक्तियाँ कुछ यूं थीं -
आपकी याद आपका गम है
जिंदगी के लिए यह क्या कम है ?

इनके अलावा जिन शायरों और शायरात ने अपने कलाम पढ़े वो ये हैं घनश्याम, निकहत आरा, अरुण कुमार आर्य, इरफान अहमद बेदालवी, कुमारी स्मृति, नईम सबा, नेयाज़ नज़र फातमी ,मासूमा खातून, शाज़ीया नाज़, डॉ. शालिनी पाण्डेय ,शुभ चन्द्र सिन्हा, हिना रिज़्वी हैदर, ज़ीनत शेख, मीना कुमारी परिहार इत्यादि। जनाब बर्क़, तलअत परवीन, आर पी घायल आदि नहीं आ पाये

इस तरह से हफीज़ बनारसी साहब की बेमिसाल ग़ज़लों का पूरे जोशो-खरोश के साथ पाठ करते हुए और आज के ग़ज़लकारों ने अपने भी कलाम सुनाते हुए उस महान शायर की याद में आयोजित कार्यक्रम को अपने यादगार अंजाम तक पहुँचाया। 
...........

आलेख - सुनील कुमार / मो. नसीम अख्तर
छायाचित्र सौजन्य - सुनील कुमार / मो. नसीम अख्तर
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
नोट- डॉ. सुधा सिन्हा का नाम और उनकी पंक्तियाँ बाद में दि. 25.7.2020 को जोड़ा गया है उनके द्वारा यूट्यूब वीडियो दिखाए जाने के बाद.

  










 


  















Sunday, 16 June 2019

"Monalisa ki muskan" staged at Vile Parle (Mumbai) on 15.6.2019

The dynamism of female psyche

हिन्दी में यहाँ पढ़िए यह नाटक समीक्षा - यहाँ क्लिक कीजिए



The most difficult question of this universe is what does a woman really want. A riddle for others is herself riddled on why she wants to stay riddled with the nonsensical talks of a man. And this play takes on the challenge of solving it in a most beautiful manner even though being fully aware that it is only a defeating game.

There is a stalemate in the conjugal life of Ruhi. Her chemistry with Armaan is just not going through. When he is away the door is knocked by an unknown man Ikbal who introduces himself as an old friend of him. The rest story hinges around this enigmatic man who is a liar, badly mannered, discourteous, almost cruel and yet liked internally by each and every woman without any plausible reason. From the very beginning up to the end Ruhi is bemused. Even her overt resistance to this unknown man is thoroughly emaciated .  

The beautiful woman Ruhi is almost hypnotized by Ikbal's winding language and a mannerism befitting to a man. The tenor of his voice ranges from adulating obsequious to that of life-threatening criminal. He seems to be fond of feminine variety and flirts with every woman he comes across. May be she is house owner Ruhi, housemaid Hira, homely woman Uparwali or the elegant modernised club-member girl Sakina. All pretend to give a resistance to this totally unwarranted creature Ikbal and vocally proclaims that he is worthy to go from there. Still, the more notable fact is no woman actually make attempt to throw him out and from within they all are spectator of the manly magic and want eagerly to be a part of it.

Though Ruhi is again and again on the verge of total surrender to Ikbal and this is absolutely voluntary when she is once interjected by Hira, the housemaid. On another instance when Ruhi is about to share bed with him when her friend Sakina suddenly comes to her safeguard by a sheer chance.

Ikbal has a simple trick - praise the beauty and exploit the sensual pleasure to the extent possible. And women of all sorts are rushing to fall in line with his ulterior motives. They register their opposition but try subconsciously to meet and get closure to him as more as possible.  Sakina emerges as the most sensible woman who talks of the limit that should not be crossed by a woman. Though she also does not wage a full-fledged war against Ikbal still, she keeps on resisting vociferously.

In the end Armaan is seen to have returned cutting short his outstation stay and it is revealed that Ikbal was not the old friend of Arman. What happens further is not shown in the play as the object of it was just to show the psyche of a woman and not to present a tell-tale story of traditional kind.

The story of Krishna Baldev Vaid was written in 1970s and is still relevant in toto. He has well analysed the psyche of a woman and the factors affecting her decision about crossing over. 

Sushmita Vishwas, Pradeep Nigam, Reetika Shah, Garima Shrivastav, Rajveer Gunjal and Mamta Singh had acted in this show directed by Sushmita Vishwas and produced by Harpreet Sethi.

The man in the cameo role of Dr. Bose left his long lasting impression on the viewers with his round-mouth dialogue delivery with a bonafide Bengali accent.

The play analyses female psyche and all the female character acted brilliantly. 'Ikbal' seemed flawless and yet to be giving his low-tone performance.  Perhaps that was itself his nuance. To let the female characters dominate was a calculated decision on his part otherwise he might have been misconstrued as a ringleader or protagonist of the show defeating the very purpose of the play.  'Ruhi' was able to show the internal dilemma of a beautiful woman who is disenchanted with her life-partner and attracted to another man. Her facial expression and body language was a true representation of that.

'Hira' with her innocent blushing smile drew the attention of all. 'Sakina' played successfully the role of a brave sensible woman and "Uparwali' of a woman who wants that all of the women in her apartment should lead a moral life except her.

Director Sushmita Vishwas has extracted the talent of the actors to their respective maximum. Still more rehearsal can make it more effective.

The loud applauds of viewers kept the hall resounding. The whole team should be praised for remarkable discharge of their theatrical duty as artist. 
.....

Review by - Hemant Das 'Him'
Photographs by - Bejod India blog
Send your responses to - editorbejodindia@yahoo.com





















Thursday, 13 June 2019

नाटककार, अभिनेता व चिंतक गिरीश कर्नाड की स्मृति में सभा पटना में 12.6.2019 को सम्पन्न

परम्परा और प्रयोग के विलक्षण नाटककार का अवसान


अभी हाल ही में देश के प्रख्यात रंगकर्मी, नाटककार, अभिनेता और चिंतक गिरीश कार्नाड का निधन हो गया। वे मूलत: अपने नाटकों के लेखन के लिए जाने जाते हैं जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं - हयबदन और तुगलक। उनके नाटक दंतकथाओं और मिथकों के माध्यम से समाज और व्यवस्था के छद्म और विरोधाभास से युक्त ताने-बाने पर कड़ा प्रहार किया।  नीचे पहले उनके बारे में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली से प्रशिक्षित  प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक पुंज प्रकाश के विचार देखिए । उसके बाद  स्व.गिरीश कर्नाड की स्मृति में हुई एक सभा की रपट प्रस्तुत है -

गिरीश कर्नाड को 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1974 में पद्म श्री, 1992 में पद्म भूषण, 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1998 में उन्हें कालिदास सम्मान से सम्‍मानित किया गया है. 1980 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ पटकथा - गोधुली (बी.वी. कारंत के साथ) इसके अतिरिक्त कई राज्य स्तरीय तथा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। बाकी जहां तक सवाल शिक्षा का है तो गिरीश कर्नाड ने कर्नाटक आर्ट्स कॉलेज से मैथेमेटिक्स और स्टेटिक्स में किया था बैचलर ऑफ आर्ट्स। ऑक्सफोर्ड से हासिल की फिलॉसफी, पॉलिटिकल साइंस और इकोनॉमिक्स में मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री। 1974 से 1975 तक फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के डायरेक्टर रहे। 1988 से 1993 तक संगीत नाटक अकादमी के चैयरमैन पद को संभाला।

गिरीश कर्नाड की मूल पहचान एक ऐसे नाटककार के रूप में हैं जो किसी एक भाषा के नाटककार न होकर भारतीय नाटककार हो गए। मूलतः कन्नड़ में लिखे उनके नाटक देश के विभिन्न भाषाओं में ना केवल अनुदित हुए बल्कि ख़ूब खेले भी गए और आज भी इनके नाटकों का मंचन लगातार जारी है। ये परम्परा और प्रयोग के ऐसे नाटककार हैं जो भारतीय इतिहास, संस्कृति, परम्परा, इतिहास आदि को अपने नाटकों के केंद्र बिंदु बनाते तो हैं लेकिन यह सब होते हुए इनके नाटक दरअसल आधुनिक या वर्तमान विमर्श को पुरज़ोर तरीक़े से अपने विमर्श के केंद्र में रखता है। उनका नाटक तुगलक केवल तुगलक की बात नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे शासक का प्रतिनिधि हो जाता है जो अपने समय से आगे की सोच रखता है लेकिन रूढ़िवादी सोच के लोग न केवल उसके साथ असहयोग करते हैं बल्कि साजिश के तहत उसे बदनाम और उसकी हत्या तक कई साजिश रचते हैं। यहां तुगलक मात्र एक व्यक्ति न होकर आधुनिक विचारों का एक दृढ़ प्रतिनिधि हो जाता है। 

वहीं हयवदन के केंद्र में स्त्री और मन और शरीर का विमर्श है। यह नाटक किसी पारंपरिक दंतकथा का भ्रम देता है लेकिन अपने मूल में यह दरअसल दिमाग और शरीर की ही कथा है जिसके केंद्र में बौद्धिक और शारीरिक दोनों आकर्षण है जिसे सुलझा पाना आज भी एक पहेली ही है।

वहीं नागमण्डल का मूल आधार भी दंतकथा ही है लेकिन विमर्श के केंद्र में आधुनिक प्रेम और त्याग ही है। कहने का तातपर्य यह कि कार्नाड ऐतिहासिक और आधुनिक चेतना से लैस एक प्रयोगवादी भारतीय ऐसे नाटककार थे जिन्होंने कभी भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ इन्होंने अपनी आवाज़ बतौर एक लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार और नागरिक बुलंद की, इस बात की परवाह किए बगैर कि इसका अंजाम क्या होगा। वो हमारे समय के बसवन्ना थे। बसवन्ना अर्थात इनके ही नाटक रक्त कल्याण का वो ऐतिहासिक चरित्र जो 12 वीं सदी में कट्टरपंथी विरोध और सुधार आंदोलन, लिंगायतवाद के प्रमुख योद्धाओं में एक रहे थे।
..............


दिनांक 12.6.2019  को पटना के रंगकर्मियों द्वारा नाटककार, अभिनेता व चिंतक गिरीश कार्नाड की याद में प्रेमचंद रंगशाला के प्रांगण में "स्मृति-सभा का आयोजन किया गया। इस आयोजन में पटना के विभिन्न नाट्यदलों के रंगकर्मियों के अलावा नृत्य, संगीत, सिनेमा और साहित्य से जुड़े लोगों ने अपनी भागीदारी की। सभा को संबोधित करते हुए फिल्म व रंगमंच अभिनेता विनीत कुमार ने कहा कि उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा और कहा है उसे जीवन मे अनुसरण करें।

वरिष्ठ साहित्यकार हृषिकेश सुलभ जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मृत्यु का भी अपना एक सौंदर्य होता है। वो एक सृजनशील व्यक्ति थे। प्रत्येक लेखक अपनी कृति में हमेशा उपस्थित होता है और उस कृति के द्वारा उसके विचार युगों युंगो तक जिंदा रहता है। उन्होंने अपने नाटको के द्वारा देश और भारतीय समाज की समस्याओं को मुखरता के साथ प्रस्तुत किया । हमें औपचारिकता से बचना चाहिए। युवाओं के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को अपने देश कला के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।

वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर ने इनके द्वारा लिखित और अपने द्वारा निर्देशित रक्तकल्याण का जिक्र करते हुए कहा कि कर्नाड जी का सामाजिक सरोकार बहुत ज्यादा था । वे हमेशा सामाजिक न्याय के समर्थन में खड़े रहे। कार्नाड का जीवन और रचनाकर्म एक कलाकार की सामाजिक ज़िम्मेदारी का भी एक जीत जागता उदाहरण है।

वरिष्ठ रंगकर्मी संजय उपाध्याय ने कहा कि उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हम कर्नाड जी को समझे, उनके विचारों को समझे। किसी भी नाटक को आधुनिकता से जोड़ कर प्रस्तुत करना चाहिए क्योंकि नाटक सवाल खड़ा करता है। उन्होंने युवा रंगकर्मी को साहित्य से जुड़ने और अपनी बौद्धिकता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम उपरोक्त लोगों से सहमति जताते हुए उनके सिनेमा में योगदान के संदर्भ में बातें की।

वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर ने अपने द्वारा अभिनीत नाटक रक्तकल्याण को याद करते हुए श्रदांजलि दी।युवा रंगकर्मी और अभिनेता पुंज प्रकाश ने उन्हें याद करते हुए कहा कि गिरीश कर्नाड जी से हमे एक चीज़ सीखने को मिलती है कि कैसे लोकतांत्रिक अधिकारों का समुचित इस्तेमाल करते हुए असहमति भी शालीनता के साथ दर्ज की जाती है। किसी भी विचारों से सहमत या असहमत होने के पहले उनके बारे में अच्छी तरह से जानें फिर सहमति या असहमति प्रकट करें। 

साथ ही रंगकर्मी विनीत कुमार झा, मोना झा, मिथलेश सिंह, रेखा सिंह, कुंदन कुमार, रघु, आदर्श रंजन आदि रंगकर्मियों ने भी संबोधित किया। इस मौके पर बहुत सारे युवा रंगकर्मी भी मौजूद थे जिन्होंने अपने अपने विचार रखे। सभा का आयोजन पटना के तमाम रंगकर्मियों द्वारा किया गया, जिसका संचालन पुंज प्रकाश ने किया।
......

आलेख - पुंज प्रकाश
रपट की प्रस्तुति - सुभाष कुमार, परिकल्पना मंच
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com

लेखक - पुंज प्रकाश 




Monday, 10 June 2019

Sakaar's Gujarati play "Veenaben Viral thaya" staged at Ghatkopar (Mumbai) on 26.5.2019

The biggest menace to the mankind of today
It is not mobile that is being used by you rather it is the mobile that is using you.


हिन्दी में इस नाटक की समीक्षा पढ़ने के लिए - यहाँ क्लिक कीजिए



Everyone in nowadays is a slave of mobile phones. It's a fad of new youths. The children also treat it as a part and parcel of their daily life for video games. The housewives like it as a tool of having endless gossips with their relatives and friends. The men use to do all business work only over mobile phone only. But how much disastrous it can be has been well illustrated in this play. The tragedy comes up ल्कin garb of a full-blown comedy in the first half. Though after interval it's a singular tale of fight for justice of a bruised mother.

A child in the house is always lost with mobile phone.  He plays video games with his partner at some remote place over some point of the globe. Either it is morning, evening or late night he is always engaged with his mobile phone. The parents first ignore it out of their fondling gesture but when they learn that the apple of their eyes has failed in every subject in the annual exam, their panic button gets pressed. 

Suddenly  the parents stop allowing the boy to use the mobile phone. The boy loses his self-composure for want of  phone as of late  he has become an addict of it. He threatens to cut the veins of his wrist and commit suicide if phone is not given to him. His father somehow is able to handle the situation successfully and the child is taken to task for it.  After some time the child stands up on the wall of the balcony and threatens to jump down from the fourth storey if the mobile is  not given to him. Does the boy really falls down? This is to be seen in the show.

The real story starts after it. When the mother is so moved as to determine to get all the children of the country getting rid of this lethal addiction of mobile. She pledges to force the government to write salutatory warning over the  mobile phones that it is injurious for the user to use. Her grit, her painstaking efforts and her nerves to tackle the obstacles in her mission is the real story. The biggest challenge she faces is that her adversary is her own going-to-be son-in-law. Isn't it interesting? No doubt it's the justice that wins at the end of the day but what happens with the going-to-be son-in-law of Veenaben is to be seen in the show.

As the show is taking rounds more revelation on the story side will not be justified. Let us move to the assessment of the show.

The story by Deep Patel is out of the box and certainly not on the hackneyed track. He has the guts to take the most relevant and yet not talked about issue ahead with all of its ramification. This is certainly not a formula story but there are enough moves and turns that keep you hooked during the whole go of it. 

The director Parth Desai has succeeded in threading each bites of the scenes as a seamless flow. 

The actors were Disha Savla Upadhyay, Bharat Thakker, Parag Shah, Ajeenkya Sampat, Hardik Chouhan, Simran Arora, and Child Artist Ved Shah/Darsh Patel. The child artist has given outstanding performance by any yardstick. His facial expression, body language and accent of dialogue delivery were worth getting this vital role. Vinaben has done full justice to her role which is admittedly the main character. She is only matriculate but is a lioness when does come the matter of justice. She with her forceful and nonchalant dialogue delivery won the hearts of the people. 

The grandfather and father of the boy have acted superbly but the incredible performance was from the the advocate of Vinaben. He not only entertained the viewers with his mimicry of Amitabh Bachchan but was also able to show the genuine concern about the duty of a responsible lawyer. The daughter and would-be son-in-law acted well still the son-in-law can give more impressive performance in the next shows. After all,  he is opposite to Vinaben in the court and his effect of dialogue delivery must match with her. The other lawyers and Judge did justice with their respective roles.

The external music inputs was prompt and added the required effect. Lights and sound system were flawless but the set design was really well thought-off. This is because the the same property was used for making internal and external side of the wall of the High Court and so brilliantly. To show the child really falling from the balcony must have been a challenge that was successfully met.

Producer Sakaar, Pranav Tripathi and Kaustubh Triivedi who presented the showw must be appreciated wholeheartedly and especially the writer as they have considered much  beyond their petty commercial interest and tried to address the biggest menace of the mankind in modern era that is still to be comprehended by the people at large.
....

Review by - Hemant Das 'Him'
Photograph - Sakaar
Email for response - editorbejodindia@yahoo.com





विनय कुमार की पुस्तक 'यक्षिणी' पर पाठ एवं संवाद, सहार (मुम्बई) में 9.6.2019 को सम्पन्न

सौंदर्य को न्याय दिलाने हेतु प्रतिबद्ध कवि




कवि सिर्फ योद्धा ही नहीं होता वह बहुरूपिया भी होता है. वह जब शब्दों को हथियार बनाना नहीं चाहता तो सौंदर्य का चरम उपासक हो जाता है परंतु उपासना करते करते ही वह तमाम बातें कह ही देता है. वह अतिक्षीण कटि और उद्दम उरोजों वाली, अप्रतिम आभा से दीप्त यक्षिणी के सौंदर्यवाण से मूर्छित तो है लेकिन साथ ही इस बात को लेकर बेचैन भी है कि ऐसी विलक्षण मूर्ति के निर्माता शिल्पी को अपमानित और निर्वासित क्यों किया गया?  वह यक्षी को समाज में पूरे-पूरे सम्मान के साथ अपना पूरा-पूरा जीवन जीती हुई देखना चाहता है एक चँवर डुलानेवाली अनुचरी और अपने गुणों को पददलित होते देखनेवाली के रूप में नहीं.

कवि की कृति 'यक्षिणी' को प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के इतिहास के कालरेख पर एक स्वच्छंद यात्रा के तौर पर देखा जा सकता है. कवि तुरंत मौर्यकाल के गह्वर में निकलकर विभिन्न कालखण्डों से गुजरते हुए आधुनिक युग में और इस युग से पुन: वैसे ही मार्यकाल में अपने मनमुताबिक आता जाता दिखता है.

मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे के पास सहार में स्थित जे डब्लू मैरिअट होटल में दिनांक 9.6.2019 को डॉ. विनय कुमार रचित और राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह 'यक्षिणी' के पाठ एवं उस पर संवाद का कार्यक्रम घंटों तक गहन साहित्यिक विमर्श के साथ किन्तु एक अनौपचारिक माहौल में चला. पेशे से मनोचिकित्सक किन्तु अपनी कविताकर्म के लिए उतने ही प्रसिद्ध डॉ. विनय कुमार की पुस्तक पर विमर्श करने हेतु मुम्बई की कुछ जानी-मानी हस्तियों के अलावे अनेक सुधी साहित्यकारगण उपस्थित थे. "अनारकली ऑफ आरा" फिल्म के निर्देशक अविनाश दास, विविध भारती के रेडियो जॉकी मो. युनूस खान,  लेखक बोधिसत्व के साथ-साथ शेष नाथ पांडेय, शिवेंद्र सिंह, बिनोद सिंह, पंकज कौरब, आभा बोधिसत्व, राम कुमार सिंह, हेमन्त दास 'हिम', मीनू मंजरी, अनुराधा, कंचन, अस्मिता आदि ने भी इस अवसर पर सक्रिय सहभागित दर्शायी.

विनय कुमार ने 'यक्षिणी' की कुछ चुनिंदा कविताओं का पाठ भी किया. पाठ किये गए कुछ काव्यांश नीचे प्रस्तुत हैं- 

1
वह नहीं चाहता 
कि सरोवर का जल सूख जाए 
और मिट्टी और धूल का पहरुआ रहे

यह भी नहीं 
कि सरोवर में जल भरा रहे और 
उल्टे -सीधे सवाल पूछकर लोगों को प्यासा मार दे

और एसा भी नहीं कि 
उसे अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं पता 

लेकिन 
पानी को पहचनना
और पानी माँगना भी तो आना चाहिए न भले लोगों.

2
देश और काल और लोक के पार
ले जानेवाले पंख झड़ रहे हैं
क्षितिज के स्वरों को शब्द देती भाषा छीज रही है
और रक्त को भाषा तक लाती हुई उष्मा मन्द पड़ रही है

सिहरन बढ़ती जा रही है 
घना होता जा रहा है मौन
फुहियाँ जम-सी गयी हैं
चेतना के अनन्त में हीले-हौले होता हुआ हिमपात
तुझे ओझल करता जा रहा है
तुम कहाँ हो यक्षिणी ? 

3
मैं एक साधारण मनुष्य हूँ
श्रमिक, कुशल श्रमिक भी कह सकते हैं
मेरी कोई कथा नहीं
कुछ घटनाएँ हैं जो मेरे स्वेद से भींगी हैं
और एक शूल जो मेरे रक्त से 
एक स्पर्श जो मेरे अंतस का वैभव है
एक स्मृति जो मेरी साँस
और एक अनुपस्थिति जो उच्छवास 
मेरी कथा सगुण मिट्टी
और निर्गुण वायु के बीच की है.

कविता पाठ और संवाद दोनो साथ-साथ चल रहे थे. एक कविता के पाठ के खत्म होते ही उसपर संवाद होने लगते थे ताकि सहज प्रतिक्रिया कि उष्मा बची रहे. विशेष रूप से बोधिसत्व, मीनू मंजरी आदि अपने विचार रखते दिखे किंतु चर्चा में लगभग सभी शामिल हुए. 

जो चर्चा हुई उसकी एक झलक भी नीचे प्रस्तुत है-

यक्षणियों पर इतिहास में बहुत अत्याचार हुए हैं ऐसा कवि ने कहा. एक महिला श्रोता ने पूछे कि क्या अत्याचार हुए हैं स्पष्ट कीजिए? इस पर बोधिसत्व ने अपने उत्तर को सुंदर शब्दचित्र में निरूपित करते हुए कहा कि यूँ समझ लीजिए कि कला के चरम विंदु पर अधिष्ठित यक्षिणी के हाथ से त्रिशूल हँटाकर 'चंवर' थमा दिया गया है. चंवर डुलाना यानी पंखा झेलना अर्थात उसका महत्व जो देवी पार्वती के समाम पूज्या का हो सकता था  वह बस पंखा झेलनेवाली दासी के रूप में सिमट कर रह गई. कवि विनय कुमार ने कहा कि  सदियों से यक्षिणी को मात्र कामुकता जाग्रत करनेवाली भोग्या का प्रतीक माना गया जबकि वह कला और आत्मिक सौंदर्य की पराकाष्ठा है.

सभी श्रोताओं ने कवि विनय कुमार के कवितापाठ की शैली को अत्यंत प्रभावकारी बताया.

बताया गया कि दीदारगंज (पटना) से प्राप्त यक्षिणी की यह पाषाण मूर्ति पहले पटना संग्रहालय की मुख्य चीजों में से थीं जिसे 2017 ई. में नवनिर्मित बिहार संग्रहालय में स्थानांतरित किया गया. मानसिक स्तर पर गहरे सम्बंध बना चुकी इस अद्भुत कलाकृति को वहाँ से स्थानांतरित होते देखना एक बहुत ही भावुक क्षण था. यद्यपि वह पहले मात्र द्वारपाल की तरह खड़ी रहती थी जिसे अब नये बिहार संग्रहालय में पूरे सम्मान और राजसी ठाठ के साथ रखा गया है. लेकिन यही एक तरह से उसका समाज के यथार्थ से कट जाना भी है. जनसामान्य के लिए उपलब्ध होने की अवस्था से एक अभिजात्यता में प्रवेश भी है जो अत्यंत दुखद है.

यक्ष जाति को वस्तुत: भय और कामना की संतान बताया गया है जबकि मौर्य काल में इसकी पूजा भी होती थी. 

और भी बहुत सारी बातें उठीं. कवि ने कबूल किया कि वे इस यक्षिणी के सौंदर्य से बुरी तरह से मोहित रहे हैं और मुड़ मुड़ कर देखने को आतुर रहे हैं. इस यक्षी को देखना अपने आप में एक उत्सव है.

अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम के समापन की घोषणा हुई.
......

प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com