Thursday, 17 October 2019

"अप-डाउन में फँसी ज़िंदगी" के कवि दिलीप कुमार के पटना में 12.10.2019 को हुए एकल काव्य पाठ की साहित्यिक रपट

इस्पाती चौखट पर संवेदनाओं की दस्तक

(हर 12 घंटों के बाद जरूर देख लीजिए- FB+ Today Bejod India)




अधिकारी को कवि होना पसंद है या फिर कवि को अधिकारी होना?"- यह सवाल तब खड़ा हो उठता है जब रेलअधिकारी कवि दिलीप कुमार अपनी नई काव्य पुस्तक" अप-डाउन में फंसी जिंदगी" में बतौर कवि लिखते हैं कि - 
इस्पाती चौखट और कविता के बीच के इस द्वन्द्व में 
अधिकारी इस्पाती चौखट 
और कवि
कविता के पक्ष में खड़ा है।
अब अधिकारी और कवि में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है, इसका फैसला आप पर छोड़ता हूं।"

सच भी यही है कि कविता अपने नैतिक मूल्यों के तहत ही समय-सापेक्ष होती है। कवि कुछ देर के लिए दिग्भ्रमित भी हो सकता है किंतु कविता फिर भी तटस्थ होती है।

कवि की कविताएं उनके भीतर की संवेदनाओं को  अभिव्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम दिख रही थी। उनकी कविताओं से रू-बरू होने का पटना के अनेक साहित्यकारों का पहला अवसर था। मौका था पटना जंक्शन के सभागार में पूर्व मध्य रेल, राजभाषा विभाग की ओर से आयोजित रेलवे अधिकारी व कवि  श्री दिलीप कुमार के एकल काव्य पाठ का।

अत्यंत आत्मीय महौल में संगोष्ठी का आरंभ स्टेशन निदेशक डां निवेश कुमार के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने दिलीप कुमार के व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए  कहा  कि - "एक रेलवे अधिकारी के साथ एक कवि भी होना बड़ी बात है। उनकी कविताओं में रेलकर्मियों की जीती-जागती तस्वीर देखी जा सकती है।"

संगोष्ठी का संचालन करते हुए रेल राजभाषा विभाग से ही जुड़े हुए चर्चित कवि राजकिशोर राजन ने कहा कि-"जीवन की उन पटरियों पर चलती हैं दिलीप जी की कविताएँ, जो हमारे इस्पाती चौखट पर दस्तक दे रही होती हैं। सच यह भी है कि कवि धूमिल के अनुसार "शब्दों में आदमी होने की तमीज और कटघरे में खड़े किसी निर्दोष आदमी का हलफनामा है कविता।" 

कवि दिलीप कुमार ने अपने काव्य संग्रह "अप-डाउन में फंसी जिंदगी" से जुड़ी हुई चालीस से अधिक कविताओं का पाठ बड़ी ही तन्मयता के साथ किया ।

 कविताओं में विविध रंग देखने को मिले। रेलकर्मियों की त्रासदी भरे जीवन से लेकर सामाजिक विसंगतियों तक का सजीव चित्रण। बल्कि यूँ कह सकते हैं कि उससे भी अधिक संदर्भों को उकेरने का प्रयास किया 

अपनी एक कविता के माध्यम से जब वे पटना में हुए जल जमाव पर तीखा टिप्पणी करते हुए कहते हैं -
"आंखों में पानी भरा कैसे? 
शहर में पानी भरा कैसे? नाले को पाट दिया 
यह किसका बयान है? 
चौराहे पर कब्जा 
किसने खोली दुकान है ?
कागज पर करे उगाही 
वह किसी बाबू का स्साला है!! 
इधर मंत्री जी परेशान 
भैय्या यह कैसा घोटाला है? 

पूरी कविता श्रोताओं की भरपूर तालियां बटोरती रही। रचना समय के संदर्भ से जुड़ी होने के कारण प्रासंगिक बन गई जब दिलीप कुमार ने पटना के जल- जमाव को  देखते हुए एक साथ कई कविताओं का पाठ किया।-
"कभी आंखों में था भरा पानी! 
तभी आज शहर में है भरा पानी! 
यह सच है 
शहर है, पानी -पानी!,"

कवि दिलीप कुमार ने इस्पाती चौखट की कविताओं से भी मनमुग्ध कर दिया, जब उन्होंने रेल ड्राइवर पर कहा-"हमने देखा, जब भी देखा, लोहा देखा, 
लोहा जैसे जलते देखा, गलते देखा 
समय की रेस लगाते देखा 
दूसरे को मंजिल तक पहुंचाते देखा। 
अपनी मंजिल की खैर नहीं 
सबको मंजिल पर पहुंचाते देखा !"

रेल के गैंगमैन पर, पढीं गई उनकी कविता का पैनापन देखिए -
"भरी दुपहरी में/ दहकता हुआ सूरज समा गया है रेल की पटरियों में! 
 पैरों में पड़ गए हैं छाले/ चौंधिया गई हैं आंखें/  फिर भी - 
पटरियों की देखरेख का क्रम जारी है  
उसका समर्पण / सूरज की तपिश पर भारी है !"

उन्होंने, श्रोताओं की मांग पर, अपनी कुछ प्रेम कविताओं का भी पाठ किया -
"जरूरी नहीं कि /जिससे हम प्यार करें 
लगातार उसका इजहार करें /  संवेदनाओं के तार झंकृत कर 
हम सुन सकते हैं, जीवन संगीत! "

कवि दिलीप कुमार ने बिहार के लोक जीवन को भी अपनी कविताओं में समेटने का, सफल प्रयास किया -
"दीपावली के दिन /अपने घर- आंगन में दीप जलाया/ धरती से आसमान तक 
अंधेरे को मार भगाया / फिर अपने मन में एक दीप क्यों नहीं जलाते? 
/ मन के अंधेरे को / दूर क्यों नहीं भगाते?"

रावण के बहाने, अमानुषिक प्रवृत्ति वाले लोगों पर व्यंग्य तीर चलाते हुए कवि दिलीप कुमार ने कविता सुनाई-
 धू - धू कर /जल गया रावण का पुतला 
शहर के बीच मैदान में /लोगों ने देखा तमाशा /बजाई तालियां 
और लौट गए अपने-अपने घर को! 
मन की बुराई, मन में ही समेटे! "

 उन्होंने राजनीति के तमाशा को भी अपनी कविता का विषय बनाया -
"अम्मा बताती है /यह सड़क, दिल्ली को जाती है 
दिल्ली जाने वाली सड़क पर हम कहां हैं? 
हमारा गांव कहां है.? 
दिल्ली जाने वाली सड़क पर पड़ी 
किस बोरी के /किस फाइल में 
वे दबे पड़े हैं ? /बता नहीं पाती हैं 
अम्मा खामोश रह जाती हैं !"      

कवि दिलीप कुमार ने नारी की भावनाओं को भी अपनी कविताओं से अछूता नहीं रखा। इसलिए ऐसी कविताओं को महिला श्रोताओं ने खूब पसंद किया - 
"औरत / जो दिन भर खाना पकाती है  
 और रात में, सबसे अंत में खाती है! / वही औरत जो /अधूरेपन में जीती है 
लेकिन पूर्णता में देती है / सभी औरतों की
एक जैसी थाती है /नाम दीप का होता है  
 पर जलती तो बाती है.!"

इस एकल काव्य पाठ में कवि दिलीप कुमार द्वारा पढ़ी गई कविताओं पर अपना विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ कवयित्री भावना शेखर ने कहा कि -"दिलीप जी की कविताएँ दिल तक उतर जाने में कामयाब है। साहित्य चातुर्य नहीं होता। उनकी कविताओं में सादगी और सच्चाई है। जंजीरों में जकड़े हुए समाजिक व्यवस्था पर चोट करती है  दिलीप जी की कविताएँ।"

कवि मुकेश प्रत्यक्ष ने विस्तार से उनकी कविताओं पर व्याख्या करते हुए कहा कि - "कविता सुनना और उस पर त्वरित समीक्षा करना आसान काम नहीं है। फिर भी इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि इस्पाती चौखट में रहने के बावजूद उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना है।"

जबकि वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार ध्रुव कुमार ने कहा कि - "दिलीप जी  की कविताओं में विविधता है जो हमें बोर नहीं होने देती। लेकिन, आयोजकों से इतना जरूर कहूंगा कि पटना जंक्शन के इस सभागार में सिर्फ अधिकारी ही नहीं रेलकर्मी साहित्यकारों को भी जगह मिलनी चाहिए।"

वरिष्ठ शायर कासिम खुर्शीद ने कहा कि- "रुढियों का विरोध करने और नए सामाजिक रीतियों का समर्थन करने वाली दिलीप जी की कविताएँ स्वागत योग्य है।

इनके अतिरिक्त समीर परिमल, वीरेंद्र यादव, प्रणय प्रियंवद, कुमार रजत, मधुरेश नारायण आदि साहित्यकारों की भी दमदार उपस्थिति रही। बड़ी संख्या में रेलकर्मियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की।

संगोष्ठी  के अंत में सभी अतिथियों, साहित्यकारों और श्रोताओं को धन्यवाद देने के क्रम में सिद्धेश्वर कवि दिलीप कुमार की कविताओं पर टिप्पणी देते हुए कहा कि - "मुक्तछंद कविता लिखना छंद में लिखी  जा रही कविताओं से आसान काम नहीं है। कविता को आसान लेखन समझने वाले कवियों ने ही कविता को पाठकों से दूर कर रखा है। कविता के नाम पर गद्यांश परोसने  वाले रचनाकारों ने समकालीन कविता का बहुत अहित किया है। कविता में छंद भले हो न हो, कम से कम उसमें काव्य बिंब तो होना ही चाहिए। काव्यात्मकता का अहसास होना ही जीवंत कविता होने की पहचान है। 

इस रपट का लेखक अचंभित है कि दिलीप कुमार ने अपने पहली काव्य पुस्तक में ही ढेर सारी सार्थक कविताओं का समावेश किया है। अपनी कविताओं की प्रखर अभिव्यक्ति ने दिलीप कुमार को एक नंई पहचान दी है। कविता के खतरे से वे वाकिफ दिखता है इनका कवि। उनकी कविताओं में जीवंतता भी है।

यह कार्यक्रम पूर्व मध्य रेल के राजभाषा विभाग द्वारा पटना जंक्शन परिसर में स्थित रेल सभागार में 12.10.2019 को आयोजित हुआ
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रपट प्रस्तुति -  सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
प्रस्तोता का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com

















Monday, 14 October 2019

शरद पूर्णिमा पर और अन्य कविता / कवि - हेमन्त दास 'हिम'

कविता -1
(शरद पूर्णिमा 13.10.2019)

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नभ में थिरकते चांद को मैंने देखा
टूट रहे एक बांध को मैंने देखा

जिसको अब दिखने लगे हैं जज्बात
‘हिम’ ऐसे जन्मांध को मैंने देखा

उस की फटकार का प्यारा तिलिस्म
हिदायतों की बांध को मैंने देखा

बड़ों की बस्ती में खोजता बच्चा
दिल की कूद फांद को मैंने देखा

मुस्को-हया की उसकी गर्मी में
ख्वाहिशों की रांध को मैंने देखा

जहाँ जन्मा है एक नया शावक
प्यार वाली मांद को मैंने देखा

पहले हमने देखा फूलों का शहर 
और फिर चिरांद को मैंने देखा
.......
(1.रांध = पकाने का भाव, feeling of cooking / 2. चिरांद = एक प्रसिद्ध नवपाषाणकालीनपुरातात्विक स्थल)


कविता -2 

ज़मीर के खिलाफ होनेवाली जो हस्ती नहीं
राह उसकी दश्त है बस दश्त है, बस्ती नहीं

मनाने की तुमको हमने उम्रभर की कोशिशें
फिर भी न माने अगर तो अब जबरदस्ती नहीं

चैन-ओ-अमन के साथ मुल्क ये खुशहाल हो
इतनी भली सी बात पर आपको जंचती नहीं

 तूफां और भंवर ही 'हिम' शायद पार लगाएंगे
तैरना जाने न जनता और है कश्ती नहीं

वे भी कुछ बुरे नहीं और कुछ भले हैं आप भी
दूर की कुछ सोचिए बस फिरकापरस्ती नहीं।
....
कवि - हेमन्त दास 'हिम'
कवि का ईमेल - hemantdas_2001@yahoo.com
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कवि द्वारा शरद नवी मुम्बई में शरद पूर्णिमा की रात को चाँद का लिया गया चित्र / 13.10.2019



"बेंगलुरु में वाजा (राइटर्स एंड जनर्लिस्ट एशोसियेशन) द्वारा पुस्तक "यादों का कारवाँ" का लोकार्पण 13.10.2019 को सम्पन्न

वाजा (राइटर्स एंड जनर्लिस्ट एशोसियेशन) के बैनर तले बैंगलुरू में हुआ कार्यक्रम
मलयाली भाषी लेखिका ने सृजित की तीसरी हिन्दी कृति

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आज वाजा बैंगलुरू इकाई की ओर से "यादों का कारवाँ" नामक पुस्तक का विमोचन व परिचर्चा का कार्यक्रम करूणाय हाल जीवन बीमा नगर बैंगलुरू में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में दक्षिण भारत के विभिन्न भाषाओं के सैकड़ों लेखक - पत्रकार मौजूद रहे।

प्रातः 11 बजे से शुरू हुये इस कार्यक्रम का संचालन करते हुये वाजा बैंगलुरू के संगठन सचिव अजय यादव ने पुस्तक परिचर्चा के समीक्षकों का मंच पर आहवाह्न किया, विशेष बात यह रही कि बैंगलुरू में यह प्रथम अवसर था जब किसी पुस्तक समीक्षा व परिचर्चा हेतु मंच पर एक साथ बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे । 

समीक्षा की विशेषता थी कि चार समीक्षक को 15-15 रचनाओं की और पाँचवें समीक्षक को सात रचनाओं की समीक्षा करनी थी... यह सार्थक सराहनीय अनुकरणीय प्रयोग था.. समीक्षकों में मधुकर लारोकर, उपाध्यक्ष वाजा बैंगलुरू डा.सुनील तरूण जैन वरिष्ठ मंचीय कवि, डा.शशि मंगल वरिष्ठ साहित्यकार जयपुर, विभा रानी श्रीवास्तव पटना श्री गजे सिंह सहित कई लोग मौजूद थे। 

इस अवसर पर उक्त पुस्तक की रचयिता केरल की मूल निवासी व मलयालम भाषा की प्रतिष्ठित लेखिका रेखा पी मेनन को वाजा संगठन की ओर से बैंगलुरू महासचिव प्रोफेसर लता चौहान ने अंग वस्त्र , माल्यार्पण व स्मृति चिन्ह प्रदान कर स्वागत किया। मंच पर उपस्थित अतिथियों का स्वागत वाजा बैंगलुरू की कोषाध्यक्ष श्री लता ने किया तथा संचालन सहयोग वाजा बैंगलुरू की सचिव चिलुका पुष्पलता द्वारा किया गया।

इस कविता संग्रह यादों का कारवाँ में कुल सरसठ (67) कवितायें हैं। इस पुस्तक के लेखिका की मातृभाषा मलयालम है फिर भी उन्होने हिन्दी भाषा में यह तीसरी कृति सृजित की है।

कार्यक्रम के आखिरी चरण में एक काव्य गोष्ठी भी आयोजित की गई जिसमें राश दादा राश, राजेन्द्र राही, सुशील शांति कोकिला, प्रियंका श्रीवास्तव पटना, अनीता तोमर, डॉ.सुनील तरूण इत्यादि ने कविता पाठ कर श्रोताओं की तालियाँ बटोरी।
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आलेख - लता चौहान 
छायाचित्र सौजन्य -बिभा रानी 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com






Friday, 11 October 2019

22 वर्षीय नायाब शायर अमन 'चाँदपुरी' की डेंगु से मृत्यु पर साहित्यकारगण चरम शोक में

ये दुनिया दर्द की मारी बहुत है / यहाँ रहने में दुश्वारी बहुत है
अमन चाँदपुरी (जन्म 25 नवम्बर 1997 – निधन10 अक्टूबर 2019)

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ये दुनिया दर्द की मारी बहुत है
यहाँ रहने में दुश्वारी बहुत है

बिछड़ते जा रहे हैं दोस्त सारे
सफ़र अब ज़ीस्त का भारी बहुत है

इन पंक्तियों को कहनेवाला विलक्षण प्रकार का ग़ज़लकार विशाल पाठकसमूह और साहित्यकारों की विशाल मंडली को अवर्णनीय शोक में तिरोहित करता हुआ प्रस्थान कर गया इस मायावी भूलोक को छोड़कर. आश्चर्य तो यह है कि उनकी मौत डेंगू से हुई जिसके सफल इलाज के किस्सों के आजकल ज्यादा उदाहरण दिखाई पड़ते हैं.

लेख्य मंजूषा की अध्यक्ष और हाइकुकार लघुकथाकार विभा रानी श्रीवास्तव और उत्तर प्रदेश, बिहार समेत विभिन्न प्रान्तों के वृहद् साहित्य मंडलियों के संपर्क में वे हमेशा रहा करते थे. श्रीमती विभा रानी की 'अमन' से हाइकु विधा के सम्बंध में साहित्यिक  बहस होती रहती थी. हालाँकि बहस मित्रतापूर्ण माहौल में ही होती थीं किन्तु विभा जी को उसका भी अफसोस है. वे कहती हैं - 
"हाइकु के लिए बहसें हो जाती थी..
बहस नहीं विमर्श करें
 लेकिन रिश्तों पर असर ना हो
*समय कब धोखा दे पता नहीं चलता"

'चांदपुरी'  की कुछ हाइकु नीचे  प्रस्तुत हैं-
न तुम, न मैं
कौन भूल पाया है
बीता समय।

02
बरसे नैन
तुम्हारे बिन चैन
अब न आए।
03

सोये अंकुर
मुँह उठा के बोले-
लो ! जागे हम ।

04
न कोई रात
जहाँ न पहुँचा हो
चाँद का हाथ।
©अमन चाँदपुरी

चांदपुरी  उम्र के जितने कच्चे थे रचनाओं से उतने ही परिपक्व. उनमें वह साहित्यिक प्रौढ़ता थी जो एक सामान्य साहित्यकार को 55-60 का हो जाने पर आती है.

उनके दोहे विशेष रूप से प्रशंसित रहे हैं. दोहों में वो देश, दुनिया और सम्पूर्ण मानव समुदाय से संवाद करते नजर आते हैं वह भी बिल्कुल सामयिक अंदाज़ में -

घर में रखने को अमनवन-वन भटके राम।
हम मंदिर को लड़ रहेलेकर उनका नाम।।

ओ! मछुआरे डाल मतइस पोखर में जाल।
मछली को मालूम हैतेरी हर इक चाल।।

ऐसे सबके दुलारे 'चांदपुरी' जी के असमय प्रस्थान पर भला कौन नहीं रो पड़ेगा-
दुनिया छोड़ के जिस दुनिया में आया हूँ
उस दुनिया से बाहर आऊँ, नामुमकिन
~®अमन चाँदपुरी

कोई भी रचनाकार जो जीता है, वही लिखता है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जो नहीं जीता है, उसे भी लिख   जाता है। लेकिन ये अटल सत्य है कि उसे आगे चलकर वो जीना ही पड़ता है।  ~©अमन चाँदपुरी

डॉ. सतीश पुष्करणा, मो. नसीम अख्तर, ज्योति स्पर्श, मधुरेश नारायण, प्रियंका श्रीवास्तव,  रवि श्रीवास्तव, पूनम कतरियार, संजय कुमार संज, प्रेमलता, राजकांता, शाइस्ता अंजुम, श्रीमती गोविल, कमला अग्रवाल, शशी, राजेंद्र पुरोहित, आदर्श सिंह, मीरा, श्रुति, संजय कुमार सिंह, पूनम देवा, अभिलाषा सिंह, पम्मी सिंह, एकता कुमारी, प्रभास सिंह, रंजना सिंह, विष्णु बनारस, नीरजा कृष्णा, नन्दनी प्रणय और अनेक अन्य साहित्यकारों ने अत्यंत अल्प आयुवाले इस विलक्षण नवयुवक ग़ज़लकार दोहाकार अमन 'चाँदपुरी' के असमय निधन पर अपनी अश्रुपूर्ण संवेदना व्यक्त की. बेजोड़ इंडिया ब्लॉग भी ऐसे अति प्रतिभाशाली साहित्यकार के निधन पर स्तब्ध है और गहरा शोक व्यक्त करता है.
......

प्रस्तुति - विभा रानी श्रीवास्तव / हेमन्त दास 'हिम'
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com




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हैदराबाद से दो शोधार्थी सत्येंद्र प्रजापति और शोभनिम कुमारी ने पटना की बाढ़ में सहायता की जिसे लेख्य मंजूषा ने सम्मान पत्र दिये. 






Monday, 7 October 2019

आईटीएम काव्योत्सव द्वारा गोष्ठी का आयोजन 6.10.2019 को खारघर (नवी मुम्बई) में सम्पन्न

मुझ पे एहसान कर दोस्ती छोड़ दे / या तो दिल साफ कर दुश्मनी छोड़ दे

(Small News (Cultural) - Puja in Bengaluru  / हर 12 घंटों के बाद जरूर देख लीजिए- FB+ Today Bejod India)



कविता तो यूँ ही साहित्य का कोमलतम रूप है और उसमें भी यदि छंद और लय जुड़ जाए तो क्या कहने. हिंदी की उत्तम अभिरूचि वाले कविगण और ऊर्दू की नज़ाकत का जल्वा बिखेरनेवाले उम्दा शायर जहाँ पिछले आठ से भी अधिक वर्षों से इकट्ठे होते आ रहे हैं उसका नाम है आईटीएम काव्योत्सव. विजय भटनागर के संयोजन में चलनेवाली इस मासिक गोष्ठी में नवी मुम्बई और मुम्बई के विभिन्न क्षेत्रों के कविगण जमा होते हैं और बड़ी संख्या में होने के बावजूद भी पूर्णत: व्यवस्थित तरीके से कवि गोष्ठी का संचालन होता है.

खारघर (नवी मुम्बई) स्थित प्रसिद्ध प्रबंधन संस्थान आईटीएम में दिनांक 6.10.2019 को आईटीएम काव्योत्सव का पुन: आयोजन हुआ. इस बार अध्यक्ष प्रसिद्ध ग़ज़लगो डॉ. किशन तिवारी थे और कुशल संचालन किया डॉ.  हरिदत्त गौतम ने. 

पढ़ी गई रचनाओं की झलकी नीचे प्रस्तुत है.

अनिल पुरबा  ने खुशियों की दस्तक से शुभारम्भ किया -
खुशियों की दस्तक हो तो कैसी हो / सूरजमुखी के फूलों जैसी हो
सूरज की उगती किरणों जैसी / इंद्रधनुष के रंगों जैसी हो

विजय भटनागर को दशहरे में पुराने दिन याद आये -
सब के सब ग़म बाँट लेते थे, आपस में लोग
गली मुहल्ले घर घर में, खुशियाँ ही खुशियाँ थीं

हेमन्त दास 'हिम' ने वृद्धों की संतान द्वारा उपेक्षा का चित्र खींचा -
सिनेमाहॉल में उसकी इस बेहूदी सी नींद पर मैं चिढ़ रही थी, ऐ बच्ची!
पर मेरी चिढ़ में भी एक सुकून था
कि वह कम-से-कम तीन घंटे तो सो पाया था

प्रकाश चंद्र झा ने अपने व्यंग्यवाण से सब को बेध डाला -
स्कूल कॉलेज में नहीं पढ़ाते / कोचिंग में ज्ञान बरसाते हैं
सरकारी डॉक्टर निजी क्लीनिक से / पैसा खूब कमाते हैं

सेवा सदन प्रसाद ने व्यंग्य करने हेतु भाषासास्त्री का वेश धरा -
कंज्यूमर वह जिसका आर्थिक बोझा तले / जिसका निकल जाये कचूमर
और कष्ट से जो मर जाये / वही होता है कस्टमर

दिलीप ठक्कर 'दिलदार' सब की साँसों में बस गए और जुदा होने को तैयार नहीं थे -
अपनी साँसों में मुझको बसा लीजिए / मैं हूँ खुशबू मुझे ना जुदा कीजिए
इश्क में सब गवारा है 'दिलदार' को / चाहे गम हो खुशी हो, अता कीजिए

डॉ. चंदन अधिकारी ने माँ की उंगलियों को अपने सर पर फिरने सा अनुभव किया -
सिर पे सरकती माँ की उंगलियाँ
करती हैं उनके मन की चुगलियाँ

दीपाली सक्सेना ने 150 संदेश पाकर खुद को आइने में क्यों देखा? जानिये-
नाग पंचमी पर 150 संदेश मिले / तो मैंने आइने में जाकर देखा
कि कहीं लोग नाग की जगह / मुझे तो नहीं बधाई दे रहे हैं

भारत भूषण शारदा सब की मुस्कान बने -
हँसता रहूँ सदा फूलों सम
हो जाऊँ सब की मुस्कान

रजनी साहू प्रेम का क्रंदन करती दिखीं -
प्राणों का शिथिल स्पंदन
तुम आ जाओ सुन मेरा क्रंदन

दिलशाद शिद्दीकी का चिराग जलते ही तेज हवाएँ चलने लगती हैं -
रुक रुक के इक जमाने से चलती हैं हवाएँ
जलना भी इन चरागों का आसान तो न था

विश्वम्भर दयाल तिवारी मुग्ध थे देश की सुंदर छवि पर -
कलम तू लिखती जा अविराम
मेरे भारत की छवि अभिराम

विमल तिवारी का प्रीतिपग थमने का नाम नहीं लेता -
कौन कहाता है धरा पर प्रीतिपग थमने लगे
शांत शीतल मन रखें सुविचार पलने लगे

समर ख्वाहिश 'जुगाड' लोगों के साथ होने पर परेशान दिखे -
आम की पेटी चुरा कर मैं जो भागा एक बार
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

नजर हयात का दोस्तों से दोस्ती छोड़ देने का क्यों विनम्र निवेदन था -
मुझपे एहसान कर दोस्ती छोड़ दे / या तो दिल साफ कर दुश्मनी छोड़ दे
खुद अंधेरों में रहता है वो जानेमन / मुझसे कहता है तू रौशनी छोड़ दे

हुनर रसूलपुरी ने पैसे की लाठी से को बहुत ताकतवर बताया -
कोई मुफलिस किस तरह से न्याय पाएगा
जहाँ पैसे की लाठी से अदालत टूट जाती है

त्रिलोचन सिंह अरोड़ा ने एक उधार मांगा, देंगे? -
चले आते हैं गम गमों को आना ही है / एक एक गम को खुशी का उपहार दो
कश्ती को आज सागर में उतार दो / थोड़ा सा प्यार मुझे भी उधार दो

कुलदीप सिंह 'दीप' ने आज के आदमी की फितरत बताई -
क्या हो गया है आज आदमी को?
छल के बिना वो रहता नहीं.

वंदना श्रीवास्तव ने फूलों को माली पर ही शक करते पाया -
सपनों से नयना डरते हैं / माली पर शक है फूलों को
बरगद की उम्र मिली कैसे / नागफनी और बबूलों को

जे. पी. सुल्तानपुरी किसी की अदाओं पर मुग्ध दिखे -
हमें तो हर अदा उनकी अच्छी लगती है
क्या बात हमारी भी कभी भाए कोई

हनीफ मोहम्मद ने दौलत और शोहरत की बात की -
ये दौलत ये शोहरत 'हनीफ' आदमी को
है मिलती मगर पास रहती नहीं है

इरफान हुनर ने दी कुछ नेक सलाहें-
क्या भला कीजिए क्या बुरा कीजिए / बस मुहब्बत से सबसे मिला कीजिए
चाहे जितनी मुसीबत का हो सामना / राहे-हक पर हमेशा चला कीजिए

विक्रम सिंह अपनी माशूका को कभी छोड़नेवाले नहीं थे-
तेरे चेहरे की बनावट बदलने लगी तो
तेरे चेहरे की झुर्रियों में भी तुझे देखा करेंगे

भट्टर ने देश की गौरव गाथा सुनाई -
भारत देश महान
हमको अपने सपनोंं वाला / प्यारा हिन्दुस्तान चाहिए

सिराज गौरी बुरे वकत स गुजरने की बात की-
कौन आएगा बुरे वक्त की तस्वीर हूँ मैं / फिर भी मैं तहज़ीबे-एहसान हुआ जाता हूँ

अभिलाज ढूँढ रहे थे एक जमानतदार को -
हो गई है खत्म मेरी कैद की मुहलतें
छोड़ दो जान मुझे अब जमानत कर दो

ओम प्रकाश पाण्डेय अपने बिखरे पलों को समेटने में लगे थे  -
आओ एक बार फिर से मुहब्बत करते हैं
आओ फिर से वो बिखरे हुए तिनके समेटते हैं

डॉ. हरिदत्त गौतम ने मधुमास का सौंदर्य दिखाया-
प्यास ऐसी है मधुमास में लगाई
गेहूँ सरसों  गले मिलते रहे / रेत में चांदनी खिलखिलाने लगी

अंत में गोष्ठी के अध्यक्ष डॉ. किशन तिवारी ने समसामयिक ग़ज़ल सुनाई -
जंग में हो गया वही शामिल / कल तक था बचाव में भैया
बेच डाले उसूल हमने भी / आज मंडी के भाव में भैया.

अंत में विजय भटनागर द्वारा धन्यवाद ज्ञापन हुआ. कार्यक्रम के मध्य में मुम्ब्रा और अन्य क्षेत्रों से आये कुछ शायरों ने काव्योत्सव के सदस्यों को स्मृतिपत्र प्रदान कर अपनी बधाइयाँ दी.
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प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com
नोट - जिनकी पंक्तियाँ अधूरी हैं वो पूरी पंक्ति।दे सकते है।