Friday, 17 May 2019

लेख्य मंजूषा की अतिरिक्त कवि गोष्ठी 13.5.2019 को पटना में सम्पन्न

जो लोग अंधेरों से नहीं लौट के आये / मैं उनके मुकद्दर का पता ढूँढ रहा हूँ

(मातृदिवस के अवसर पर लेख्य मंजूषा की कवि गोष्ठी की रपट - यहाँ क्लिक कीजिए)




जहाँ चार यार मिल जाएँ वहाँ.... भले ही कुछ और होता हो लेकिन जहाँ चार साहित्यकार मिल जाते हैं वहाँ एक धमाकेदार गोष्ठी का होना तय है. 

अभी कल ही लेख्य मंजूषा की एक कवि गोष्ठी हुई थी मातृ दिवस (12 मई) पर लेकिन अचानक पता चला कि देश के प्रसिद्ध शायर अनिरुद्ध सिन्हा आये हुए हैं. सामान्य जन को साहित्य से जोड़ने हेतु प्रतिबद्ध संस्था "लेख्य मंजूषा" के समर्पित और अति सक्रिय सदस्यों ने यह भी पाया कि संयोगवश बेजोड़ इंडिया के एक सम्पादक हेमन्त दास 'हिम' भी उस बीच नवी मुम्बई से पटना आये हुए हैं जो पहले लेख्य मंजूषा के अनेक कार्यक्रमों को भली-भांति कवर कर चुके थे.  आनन-फानन में अगले ही दिन यानी 13.5.2019 को एक कवि गोष्ठी पुन: आयोजित की गई ताकि सभी साहित्यकार एक-दूसरे से मिल सकें. सदस्यों के आग्रह को अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव, उपाध्यक्ष सुनील कुमार नहीं टाल पाये. साथ ही बिहार के जाने माने कवि घनश्याम, सिद्धेश्वर, मधुरेश नारायण, प्रभात कुमार धवन और अनेक गम्भीर महिला साहित्यकरों ने भी अपनी हामी भर दी. इस तरह महज दो घंटे के अंतराल में तय किया गया यह कार्यक्रम पूरे आवेग के साथ सफलतापूर्वक चला जिसमें गम्भीर शेरो-शायरी का दौर चला और साथ में कुछ मुक्तछंद रचनाएँ भी पढ़ी गईं. 

कवि गोष्ठी की अध्यक्षता की अनिरुद्ध सिन्हा ने और कुशल संचालन किया सुनील कुमार ने. धन्यवाद ज्ञापन की जिम्मेवारी निभाई मधुरेश नारायण ने.

रवि श्रीवास्तव ने चल रहे आम चुनाव के मद्दे-नजर लोगों को फिर से आगाह किया-
बाहुबली, घोटलेबाज अगर, जीत सत्ता में आएंगे
आमजन को पूछेगा कौन, बस जेबें भरते जाएंगे
जागो ऐ मतदाता अब, गर्व से मतदान करो
देश की उन्नति में तुम, अपना भी योगदान करो

सिद्धेश्वर का व्यंग्य बड़ा तीखा था उस प्यार के प्रति जो सिर्फ बिकता ही नहीं, बल्कि किस्तों में बिकता है -
नकद नहीं तो उधार ही ले लो
आजकल किस्तों में बिकता है प्यार
मंदिर, मस्जिद भी बन गया है व्यापार
और क्या क्या चीज बेचोगे यार

किंतु सुनील कुमार शिकायत में समय नहीं गँवाते, बस मुहब्बत करते चले जाते हैं उसके दर्द का आनंद लेते हुए -
आज तक मैंने कब शिक़ायत की
जब कभी की फ़क़त मुहब्बत की
दर्द की लज़्ज़तों से आसूदा
दिल ने ऐसी कभी न हसरत की
उनसे मिलिए भला तो क्या मिलिए
बात होती है बस जरूरत की
वो कहाँ मेरी बात समझेगा
जिसने रिश्तों की बस तिज़ारत की

विभा रानी श्रीवास्तव ने जिंदगी से मिलना चाहा तो सुबहो- शिकवा के जाल में उलझती चली गईं-
ज़िंदगी से जब भी मुलाकात हुई
शिकवे, सुबह, दर्द में डूबी रात हुई
हदों से ज्यादा अपना जिन्हें कहते निकले
शक की बेड़ियों से खुद को जकड़ते निकले

अमृता सिन्हा किस्मतवाली निकलीं जिन्होंने चांद से  चंद बातें कीं, मुलाकातें कीं-
आज सोचा कि चांद से चंद बातें करें
नाम उसके अपनी चंद रातें करें
चांद ओढ़े हुए चांदनी की चुनर
महबूबा हो जैसे,  मुलाकातें करें

हेमन्त दास 'हिम' नेताओं द्वारा दिखाये जा रहे सुंदर घर से संतुष्ट नहीं है बल्कि हवा की भी माँग कर रहे हैं-
बड़ा सुंदर है यह घर, यह कहना सटीक था
हाँ, थोड़ी हवा भी जो आती तो जरा ठीक था
खड़े थे दो रहनुमा, अलग अलग से चोगे में
जिधर भी तुम हाथ बढ़ाओ, ठग का ही फरीक था
महान कहलाना है तो जो होता है होने दो
'हिम' लेकर बैठे रहो एक अनोखी परीकथा

प्रभात कुमार धवन पूरी तरह आलोडित दिखे प्रकृति प्रेम में जो अब एक अद्भुत बात हो गई है-
सुखी था उनका जीवन
क्योंकि मनुष्य के साथ ही
प्रकृति से था उन्हें प्रेम.

मधुरेश नारायण ने प्रतीकात्मक रूप से प्रवेशद्वार से व्यक्ति के ऊंचे बढ़ जाने की बात कर सोचने को मजबूर कर दिया -
पर कुछ ऐसे भी हैं
जिनके लिए ये दरवाजे छोटे पड़ गए हैं
शायद 
उनका कद बढ़ गया
और दरवाजा ज्यों का त्यों रह गया

हरे जख्मों वाले घनश्याम को बैसाखियों से ज्यादा जरूरत है दोस्तों की दुआ की,प्रेम की -
मुद्दतों बाद जब उसे देखा
जख़्म फिर से हुआ हरा बिल्कुल
साजिशों को हवा मिली इतनी
दोस्ती हो गई फ़ना बिल्कुल
वो सियासत वतन को क्या देगी
हो गई है जो बेहया बिल्कुल
मुझको बैसाखियां नहीं चहिए
चाहिए आपकी दुआ बिल्कुल

अ‍णिमा श्रीवास्तव 'सुशील' ने एक दिन बाद ही मातृवंदना करके अपनी भावनाओं को रखा-
खुदा ने भी जिसे दुआओं में माँगा तू वो मन्नत है
यूँ ही नहीं कहते तेरे पैरों तले जन्नत है
सृष्टि के कण-कण में तेरी ही शक्ति स्पंदित है
सिद्ध, बुद्ध हो या कोई अवतार, तू सब से वंदित है

अभिलाषा कुमारी नारी प्रतिरोध के स्वर को बुलंद करती दिखीं- 
पुरुषों की इस दुनिया में / प्रतिबंधित रहकर जीना है
सहनशीलता की मूर्ति बन / जहर जीवन का पीना है
पर अंतर में जो औरत है / वह तो विद्रोही मूरत है
तेरे स्वतंत्र मुस्कानों में / दिखती अपनी ही सूरत है

अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अनिरुद्ध सिन्हा ने अपनी बेबाक ग़ज़लों से अनोखा समाँ बांध दिया जिसे सभी स्तब्ध होकर सुनते चले गए- 
मेरे जज़्बात,  मेरे नाम बिके / उनके ईमान सरेआम बिके
एक मंडी है सियासत ऐसी / जिसमें अल्लाह बिके, राम बिके

ऐसा तो नहीं है कि घटा ढूँढ रहा हूँ
सहरा में समन्दर का पता ढूँढ रहा हूँ
जो लोग अंधेरों से नहीं लौट के आये
मैं उनके मुकद्दर का पता ढूँढ रहा हूँ

हवाओं को बताया जा रहा है
कोई दीपक जलाया जा रहा है
गरीबी, भूख, आँसू दर्द क्या है?
मेरा चेहरा दिखाया जा रहा है

इन ग़ज़लों को सुनाने के बाद श्री सिन्हा ने पूर्व में पढनेवाले कवियों पर अपने संक्षिप्त विचार रखे. फिर धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात अध्यक्ष की अनुमति से कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा हुई.

एक से बढ़कर एक ग़ज़लों के साथ कुछ सामयिक गम्भीर रचनाओं के पाठ के कारण इस कवि गोष्ठी को लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
.......

आलेख - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com






























Monday, 6 May 2019

आईटीएम का काव्योत्सव, खारघर (नवी मुम्बई) में 5.5.2019 को सम्पन्न

यह लोकतंत्र का पर्व है या तमाशा / इल्जाम सब पे लगा रहे बेतहाशा




चुनाव के दौर में शायरों की महफिल! दोनो अपने आप में तूफानी और मिल जायें गर तो कयामत ही समझिये.
एक शायर यूँ तो खोया-खोया सा दिखता है मानो उसे दीन-दुनिया से कोई वास्ता ही न हो. लेकिन दरअसल वह समाज, देश और दुनिया की फिक्र में ही लगा रहता है दिन-रात.  इश्क तो एक बहाना है प्रेम के पैगाम को एक-एक आदमी में तक पहुँचाने का ताकि बातें रूमानी लगें उपदेश नहीं.

आईटीएम काव्योत्सव नवी मुम्बई की अत्यंत सक्रिय  साहित्यिक संस्था है जो हर माह पहले रविवार को कवि गोष्ठी आयोजित करती है. दिनांक 5.5.2019  को खारघर में स्थित देश के प्रतिष्ठित प्रबंधन शिक्षा संस्थान आईटीएम में आयोजित गोष्ठी में अनेक नामचीन शायरों के साथ-साथ अनेक ऊर्जावान कवि-कवयित्रियों ने भारी संख्या में अपनी प्रतिभागिता दिखाई. अध्यक्षता की चेतन फ्रेमवाला ने और संचालन किया भारत भूषण शारदा ने.

कार्यक्रम का आरम्भ वंदना श्रीवास्तव के अत्यंत सुरीले स्वर में सरस्वती वंदना से हुआ और फिर सभी ने पूरे सम्मान के साथ सामूहिक राष्ट्रगान किया.  फिर एक-एक कर सभी कवियों को काव्य पाठ हेतु आमंत्रित किया गया. खास बात रही भारत भूषण जी का कुशल मंच संचालन जिसके कारण इतनी बड़ी संख्या में रचनाकारों के होने के बावजूद तीन घंटे के अंदर इस कार्यक्रम का समापन हो पाया.

नीचे प्रस्तुत है कवि-कवयित्रियों द्वारा पढ़ी गई रचनाओं की झलकी -

सेवा सदन प्रसाद -
यह लोकतंत्र का पर्व है या तमाशा
इल्जाम सब पे लगा रहे बेतहाशा
सबको अपनी औकात दिखा देगा
एक अदद मतदाता, एक अदद मतदाता

अनिल पुरबा-
लेकिन फिर मुझे याद
मैं अब मतले का नहीं
मकते का शेर हो चला हूँ

विमल तिवारी -
अवशेष नहीं हम तो हैं विशेष यहाँ
खेत, खलिहान, नगर-गाँव, देश जहाँ
नियम, कानून बनते हैं सबके लिए
पर विडम्बना! ये कुछ ही पर थोपे गए

हनीफ मो. हनीफ -
सामने इसके तो हर राज आशीकारा है
इब्ने-आदम तू क्यूँ छुपकर गुनाह करता है
चंद सिक्कों के ऐबत थे सबात दुनिया में
आकबत तू क्यू कर तबाह करता है

नजर हयातपुरी -
पोंछकर आँसू किसी का दश्ते- शफकत रख के देख
जीस्त की लज्जत से तू भी आशना हो जाएगा
तोड़ देगा उम्र भर का सिलसिला सोचा न था
वो जरा सी बात पर मुझसे वो खफा हो जाएगा

हुनर रसूलपुरी -
हर खुशी साथ मेरा छोड़ गई / इक तेरा गम शरीके-हाल रहा
खुद से गाफिल रहा हुनर तेरा / इसको जब तक तेरा ख्याल रहा
..
क्यूँ जुदा करते हो, रहने दो जमानेवालों / खार शामिल तो गुलाबों में नजर आते हैं
देखनेवालों जरा बदलो नजरें अपनी / अच्छे अच्छे तो खराबों में नजर आते हैं

राम प्रकाश विश्वकर्मा -
आदमी को काटने से डरते हैं विषधर भी अब
कि वह उनसे कहीं ज्यादा विषैला हो गया है
क्रूरता, पशुता सिहर उट्ठी है 'विश्व' सुनकर यह
इंसान का ताजा लहू एक मय का प्याला हो ग्या है

अशवनी 'उम्मीद'-
अधूरी हसरतों के बाद शेर बनता है
खुशी की नेमतों के बाद शेर बनता है
कभी तो एक ही दिन में बहुत ये बनते हैं
कभी फिर मुद्दतों के बाद शेर बनता है

डॉ.सतीश शुक्ल-
इसलिए इंसाफ का तकाजा है
जब तक चुनाव है
तब तक बिजली गुल रहेगी
हम दोनों ही पसीना बहाएंगे
हम सड़क पर तुम घर पर

चंद्रिका व्यास -
फिर दिल ने कहा
ज़िंदगी में नेकियाँ
गिनाई या बताई नहीं जाती
महसूस की जाती है

विजय भटनागर -
वो जमाने लद गए जब होते था जौहर, रिवाज कुर्बानी का
अब औरतें सीखती हैं कराटे, अब कोई अबला नहीं
'विजय' चाहता है घर ऐसा सब का इस्तकबाल हो
चाहे उसका घर छोटा हो, चाहिए उसे बंगला नहीं

सत्य प्रकाश श्रीवास्तव -
माना  / कई मुद्दों पर विरोध है उनका
उस विरोध का सवागत है
पर राष्ट्र का गौरव जिसने दिलवाया
"भारत रत्न" के लिए वो लायक है

अशोक वशिष्ठ -
तोते सारे खा गए, कुतर कुतर कर आम
दिल्ली तक पहुँचा नहीं , होरी का पैगाम
होरी का पैगाम, मर गई भूखी धनिया
गिरवी रखा मकान,  हड़प कर बैठा बनिया

कुलदीप सिंह -
बन जाते सब यार, बिगड़ते काम बनाता
कैसे कैसे काम यहाँ, पैसा करवाता
यहाँ कोई बलवान नहीं है पैसे जैसा
सभी नवाते शीष, पास में हो यदि पैसा

भारत भूषण शारदा -
आँख में भर आया पानी रे रसिया / बोझ बना जिंदगानी रे रसिया
बाप गरीब, गँवारन मैया / बाल मजूरी करता भैया
अनपढ़ रही इसी से प्रीतम / मेरी खता क्या ज्ञानी रे रसिया

शोभना ठक्कर -
तुम गम से बेजान हुए हो
तो मुझ में भी जान कहाँ है
चूमा था कभी प्यार से तुमने
हर गुल पे वो अब भी निशाँ  है

दिलीप ठक्कर 'दिलदार' -
नैन में सपने सजाना सीख लो
रेत पे भी घर बनाना सीख लो
दुश्मनों से भी रहो 'दिलदार' तुम
दोस्तों से हार जाना सीख लो

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
व्यापारी नाराज हुए तो, सब दयाल बौराये हैं
गाँव से सीधे किसान जब, साग बेचने आये हैं
थोड़े सदचिंतन अनुभव से, नेताओं की नीयत परखें
चुनना होगा कोई बेहतर, आओ अपनी सीरत परखें

त्रिलोचन सिंह अरोड़ा -
विवशता / माँ गरीबी की बेटी है
इसलिए / भूख के बिस्तर पर लेटी है
उसपर लेटा है / धन का साया यानी धनीराम

वंदना श्रीवास्तव -
फायदा देख के ये रंग बदल लेते हैं
अपने किरदार से गिरगिट को लजानेवाले
तुम बढ़ाओगे तो काट के ये ले जाएंगे
सब नहीं होते यहाँ हाथ मिलानेवाले

हेमन्त दास 'हिम' -
मिली / एक छोटी टूटी हुई सी पेंसिल
बस / उड़ेल डाला अपने आप को समूचा
और इस तरह से तैयार की मैंने एक मुकम्मल कविता
ठीक उसी तरह / जैसे मैं जीवन जीता आया हूँ अब तक

कार्यक्रम में जे.पी. सहारनपुरी ने भी अपनी ग़ज़लें सुनाकर श्रोताओं की वाहवाही लूटी.

कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षता कर रहे चेतन फ्रेमवाला ने पूर्व में पढ़ी गई रचनाओं पर अपना मंतव्य प्रस्तुत किया और फिर अपनी कुछ सुंदर ग़ज़लें पेश की-

चेतन प्रेमवाला -
हर तरफ प्यास से था झुलसता जहाँ
और मैं एक घूँट में इक नदी पी  गया
रोज लड़ता रहा पेट की आग में
रोज चोट समझ आखरी पी गया
शक्लो सूरत नहीं, दिल खड़ा चाहिए
एक नजर झुक गई सादगी पी गया.

अंत में अध्यक्ष की अनुमति से काय्रक्रम की समाप्ति की घोषणा हुई.
.....

आलेख - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया
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