Tuesday 25 February 2020

नवभारती सेवा न्यास सीतामढ़ी द्वारा पटना में 23.2.2020 को पाटलीपुत्रा काव्य महोत्सव सम्पन्न

कविता तो मनुष्यता की मातृभाषा है

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पटना के संस्कारशील पुस्तकालय में पाटलिपुत्रा काव्य महोत्सव का आयोजन, नवभारती सेवा न्यास सीतामढ़ी के तत्वावधान और  कुंदन आनंद के संयोजन तथा प्रीति सुमन के आयोजन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

कुछ कमियों के बावजूद यह समारोह कई मायनों में भव्य और यादगार कहा जा सकता है क्योंकि इस कवि सम्मेलन में सीतामढ़ी, दरभंगा, समस्तीपुर, बक्सर, आरा, गया, हाजीपुर तथा विभिन्न छोटे-बड़े अंचलों से लगभग  चालीस  कवि और कवयित्रियों को आमंत्रित किया गया था।

इस समारोह के मुख्य अतिथि ध्रुव गुप्त के निर्देशानुसार सभी कवियों को अपनी मात्र एक कविता पढ़नी थी। अच्छी बात यह रही कि इसका सख्ती से पालन हुआ और इस अनुशासन के कारण दो-तीन घंटे के अंदर लगभग चालीस कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इनमें से कुछ कविताओं को छोड़कर ढेर सारी ऐसी कविताएं सुनने को मिली जो नए और युवा प्रतिभाओं द्वारा बानगी के तौर पर प्रस्तुत की गई थी और उन्होंने बेहतर ढंग से पाठ भी  किया।

वरिष्ठ एवं युवा कवि- कवयित्रियों में लगभग सभी ने अपनी विविध विषयों पर आधारित गीत, ग़ज़ल एवं कविताएं प्रस्तुत कर कविता की जीवंतता के प्रति आशान्वित किया.

"कविता कल और आज" विषय पर संबोधन में वरिष्ठ गज़लकार-साहित्यकार ध्रुव गुप्त, अन्य मुख्य वक्ता वरिष्ठ गीतकार-साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी  तथा वरिष्ठ पत्रकार और कवि नीलांशु रंजन और घनश्याम की सहभागिता रही.
           
काव्य पाठ करने वाले प्रमुख कवि-कवयित्रियों में ध्रुव गुप्त,  भगवती प्रसाद द्विवेदी, कवि घनश्याम, नीलांशु रंजन, आराधना प्रसाद, नीलम श्रीवास्तव, सिद्धेश्वर, नील कुमार, कुंदन आनन्द, प्रीति सुमन, चन्दन द्विवेदी, नवनीत कृष्णा, उत्कर्ष आनन्द भारत, कुमारी स्मृति, अनुराग कश्यप ठाकुर, मुकेश ओझा, स्वराक्षी स्वरा, रणजीत दुधू के साथ  ने  भाग लिया.

कवि सम्मेलन के आरंभ में "कविता कल और आज" विषय पर गंभीरता से अपना विचार व्यक्त करते हुए कवि ध्रुव गुप्त ने कहा कि कविता को कई तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया गया है । कविता हमारे सुख -दुख का साथी है! कविता से हमारा रिश्ता छठे दशक से जारी है। उसके बाद पता नहीं क्या हुआ कि सबकुछ तहस-नहस हो गया। 

कविता के  आंदोलन में भूखी कविता, शमशानी कविता  लिखी जाने लगी। इन लोगों ने कविता को सत्यानाश किया । इसके बाद जनवाद, प्रगतिवाद कह कर तो किसी ने कविता को दोहा बनाकर बनाकर इसे बर्बाद कर दिया। पिछले कई वर्षों से कविता से लोगों का संबंध कट रहा है ।कविता को लोगों ने सपाटबयानी बना दिया है।पिछले 15 वर्षों में कविता में इतनी बौद्धिकता आ गई कि कविता आम पाठकों के लिए दुरूह समझी जानी लगी।कविता किसी के लिए जरूरत महसूस नहीं होती रही ।

कवि कविता लिख रहा है। कवि ही उसे समझ रहा है। कविता को कवि ही पढ़ रहा है। कवि ही उसकी  समीक्षा भी कर रहा है।यह स्थिति हो गई है कविता की। ज्यादातर कविगण एक दूसरे की पीठ खुजालाने का प्रयास कर रहे हैं। कवि  एक दूसरे की कविता को पढ़ा रहे हैं । पाठकों से कविता की दूरी बढ़ती जा रही है । कविता के लिए पुरस्कार भी प्रायोजित हो रहे हैं। कोई  नहीं सोच रहा है कि कविता कहां जा रही है?

सोशल मीडिया में फेसबुक के द्वारा कुछ कविताएं जरूर पढ़ी जा रही है। लेकिन कविता को पुस्तकों में पढ़ने के लिए कोई तत्पर या बेचैन नहीं है। अब कोशिश कवियों को करनी है कि वह ऐसी कविताएं लिखे जो पाठकों से सीधे जुड़ सकें । वह सपाटबयानी ना हो। मुक्त छंद में भी छंद हो।

कवि नीलांशु रंजन ने संदर्भित विषय पर कहा कि- " हम तो अकेले ही चले थे सफर में ,लोग आते गए कारवां बनता गया। संस्कारशाला का कारवां भी इसी प्रकार बढ़ रहा है । कविता के स्वरूप में परिवर्तन कुदरत का नियम है। अगर तब्दीलियां ना आए परिवर्तन ना आए ,तो यह जो हमारा समाज है हमारा विचार है, वह कुंठित हो जाएगा ।  दो पीढ़ियों के बीच की सोच का जो फांसला होता है, वह परिवर्तन लाता है। अब सवाल है कि कविता में किस तरह के परिवर्तन आए हैं।

आज कवि का जीवन बहुत दूर हो गया है। व्यवसायीकरण है, वैश्वीकरण के तौर पर भी हम प्राचीनतम समय से गुजर रहे हैं। जब जीवन सहज और सरल होगा तभी कविता भी सहज सरल होगी। आज की कविता में यदि हम लयात्मकता खोज रहे हैं, यह हमारी भूल है ।

जो परिवर्तन और तब्दीलियां आई है उस कारण कविता लयात्मकता से अलग होकर वैचारिक हो गई है। और उनमें संवेदनाएं लबालब है। अब बच्चन की  मधुशाला लिखने वाला समय नहीं है। आज मुक्तिबोध, निराला , वाली कविता सपाटबयानी है, यह आरोप लगाना गलत है।   
  
संवेदनाएं तो आज भी है। कविता को बचाने का संवेदनाओं को बचाने का आज भी प्रयास किया जा रहा है।
"जो सोचता नहीं / वह मर जाता है/
और जो मर जाता है / वह सोचता नहीं!"
यदि कोई कभी-कभी ऐसी कविताएं लिखता है तो क्या इसमें संवेदना नहीं है ?

मुक्तिबोध भी कहते थे कि जब संवेदना बची रहेगी तभी कविता  भी  बेचेगी । आज संवेदना बची हुई है इसलिए आज कविता जिंदा है।

इन दोनों विचारों के मद्देनजर भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि - "मनुष्यता जब तक बची रहेगी तभी तक कविता जिंदा रहेगी। कविता में बहुत कुछ सकारात्मक हो रहा है। कविता को किसी ने मनुष्यता की  मातृभाषा कहा है। किसी ने कहा कि यह भाषा में आदमी होने की तमीज है । दरअसल कविता हमेशा मनुष्यता के साथ जुड़ी रही है।

हमारी संवेदना को जो  जोड़े वही कविता है। कई आंदोलन हुए कविता में लेकिन कविता का जो छायावाद युग  था वह अब तक का  स्वर्ण युग था। रामधारी दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली, जानकी वल्लभ शास्त्री, नागार्जुन जैसे कई रचनाकार अपनी गहरी  संवेदना के लिए पहचाने गए। और सभी ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जाग्रत किया।

समकालीन कविता के महारथियों ने क्यों सपाटबयानी कविता को ही कविता माना? गीत ग़ज़ल को समकालीन माना ही नहीं ! जब भी समकालीन  कविता विशेषांक निकला, तो उसमें गीत गजल को बाहर कर दिया गया ।यह गलत है ।

समकालीन कविता में,  आज की समस्याओं को, आज के समय  को रेखांकित किया गया ।जब से कविता को आमजन से जुड़ने की बात हुई तब से कविता को लोगों ने मंच पर उसका विकृत रूप दिया। हास्य के नाम पर हास्यास्पद कविताएं लिखी और  पढ़ी जाने लगी। जिसमें कविताएं तो होती  ही नहीं ।सिर्फ चुटकुले को केंद्र में रखकर मंच पर कविताएं पर ही जाने लगी।

इस तरह जो विकृति का दौर शुरू हुआ, आम जनता ने समझा कि यही कविता है। जबकि सच्चाई कुछ और है ।

 आज जरूरत इस बात की है कि मंच के जो कवि हैं ,उनसे जो दूरी बनी है, उसे पाटा जाए । मंच के कवि जिसका कोई स्थान नहीं है और वे ही तथाकथित बड़े कवि समझे जा रहे हैं। उन लोगों ने आम जनता में भ्रम पैदा कर दिया जो वे रच रहे हैं वहीं आज की समकालीन कविता है।

इस तरह ऐसी कविताओं से आम पाठक कटने लगा। अब जरुरत इस बात की है कि मंच और पत्रिकाएं दोनों एक दूसरे से जुड़े। सामने आए । तभी कविता बची रहेगी।

कविताओं की विश्वसनीयता इसलिए घट रही है कि इस लेखन और सृजन में अंतर आ गया है। समय रहते संभलिए। भीतर से कुछ और और लेखन में कुछ और। जब लेखन की तरह है सृजन हो आचरण हो तभी सृजन को बल मिलेगा और कविता जिंदा रहेगी।
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आलेख और छायाचित्र - सिद्धेश्वर / घनश्याम
प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
पट के लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com











































Monday 24 February 2020

मैथिल समूह मुम्बई साहित्यिक बैसाड़ की पहली गोष्ठी.23.2.2020 को मुम्बई में सम्पन्न

"एहि फगुआमे आश पुरबियौ "(इस फागुन में आस पुरी कीजिए)

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यह हिंदी अनुवाद है.  मूल रपट मैथिली में पढ़िएयहाँ क्लिक कीजिए


दिनांक 23.2.2020 को चर्चगेट (मुम्बई) में ओवल मैदान के निकट अवस्थित क्रौस मैदान में मैथिल साहित्यिक बैसाड़ की गोष्ठी आयोजित हुई  जिस में नाना प्रकार के रचनापाठ एवं कलाविद्या का प्रदर्शन हुआ  साथ ही मैथिली की असली  गाँव-घर वाले लहजे का प्रयोग करते हुए वार्तालाप हुए.. इस अवसर पर मुम्बई के कोने कोने से मैथिल जुड़े जैसे कि - विरार,भिवंडी, नवी मुम्बई, अणुशक्तिनगर, महालक्ष्मी, मलाड आदि. पूर्णत: अनौपचारिक किंतु अनुशासित माहौल में ढाई घंटा चले इस कार्यक्रम का रूचिपूर्ण संचालन किया कृष्ण कुमार झा एवं अध्यक्षता की विनोद कुमार झा ने. विशेष उपस्थिति रही मैथिली हेतु 2018 केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ विभूषित सदरे आलम गौहर की जो हाल ही में निदा फाज़ली के कविता संग्रह केँ मैथिली अनुवाद "हरायल जकाँ किछु" कर अत्यंत चर्चित हुए हैं.

मैथिली अकादमीक पूर्व सदस्य और पटना विश्वविद्यालय की पूर्व मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. वीणा कर्ण का निधन कुछ दिन पूर्व हो गया था जिसके कारण सभी मैथिल शोकग्रस्त थे  किंतु सच्ची श्रद्धांजलि दिवंगत के कार्य को आगे बढ़ाने से होती है और वह कार्य है मैथिली का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार.

यह मुम्बई मे पहली गोष्ठी थी, यह देखते हुए इसे अत्यधिक सफल आ उत्साहदायी माना जा सकता है.. सोलह जन मैथिली केँ समर्पित रचनाकार  और कलाकार का मिथिला सँ दूर मायानगरी मुम्बई में अपनी संस्कृति को पुनर्जीवन देने के लिए एक बुलावे पर तुरंत उपस्थित हो जाना यह कम बात नहीं थी.. काव्यपाठ करनेवालों में  वरिष्ठ आ नव का सुंदर समायोजन देखा गया..  सदरे आलम 'गौहर', पंकज झा, प्रो. कृष्णकुमार झा 'अन्वेषक', राजेश राय,  कुणाल ठाकुर,  विनोद सरकार, लक्ष्मण झा एवं कथाकार राजकुमार मिश्र, धर्मेंद्र कुमार झा के साथ ही बेजोड़ इंडिया ब्लॉग, मुम्बई डेस्क केँ दोनों मानद सम्पादक यानी हेमन्त दास 'हिम' एवं भास्कर झा भी सक्रिय रूप से उपस्थित थे. विकास मिश्रा, गौरव झा, अरविंद मिडा आ शांतनु झा भी इसमें सम्मिलित होकर इसकी शोभा बढ़ाई.

मैथिली, अंग्रेजी आ हिंदी पर समान अधिकार रखनेवाले विद्वान भास्कर झा को सर्वसम्मति सँ मुम्बई साहित्यिक बैसाड़ का संयोजक बनाया गया जिससे मैथिली के प्रचार प्रसार तीव्र गति से हो पाए.

मुम्बईमे फिल्म अभिनेता-सह-सहायक निर्देशक गौरव झा ने शहनाई की ध्वनि में  एक मधुर धुन सुनाई अपने नाक से  बजा क और सबको मंत्रमुग्ध कर दिया. फिल्म लाइन के प्रतिनिधित्व कुणाल ठाकुर एवं अन्य द्वारा भी हुआ जो अभिनय आ निर्देशनक कार्य करते हुए फिल्म लाइन से जुड़े हैं.

पढल गेल रचना में वैसे तो श्रृंगार की बहुलता दिखी तथापि प्रेम आ सद्भावना पर आधारित गम्भीर रचनाओं को भी पढ़ा गया.. झलक देखी जाय-
  
फगुआ के निकट आते ही पूरा वातावरण श्रृंगार सँ सराबोर हो जाता है. प्रो. कृष्ण कु. झा 'अन्वेषक' एक नवयौवना परिणीता की  प्रेम की पिपासा पर एक नजर डाल रहे हैं -
 जग दुर्लभ नारिक आकर्षण
अधर-सुधा रस पान कराएब।
लाजक बात कहू की साजन!
आएब अंग सँ अंग लगाएब।
काजर धोरल नोरक स्याही
कंत एहेन निर्दय नञ बनियौ।
अन्वेषक आएब फागुनमे
एहि फगुआमे आश पुरबियौ।
     
चाहे फगुआ आए या कोई और त्योहार / आजकल सबको चढ़ा एक ही खुमार" और वह है फेसबुक-ट्वीटर-इंस्टाग्राम.. कवि कुणाल ठाकुर नेे इस स्थिति का बड़ा सुंदर वर्णन किया है -
*फेसबुक के फूस्टिक मे जिनगी भेल जियान 
  स्कूल कालेज गेल निखत्तर, ह्वाट्सएप परसै ज्ञान ।
 *रंग बिरंगक स्माइलीसँ जिनगी भेल बदरंग 
  ओनलाइन केर दुनियामे तैयौ मानव किए मतंग ।
*नवपीढ़ी केर नितदिन बदलय फेसबुक पर फेस 
  सभकिछु देखू फेसबुकियाअल रहल किछो नहि शेष ।
*एतबे नहि, कचर बचर करय ट्विटर इन्स्टाग्राम
  चाय पीबय के समय बचल नहि आराम भेल हराम ।
*चिट्ठी पतरीक कोनो काज नहि, सभ किछु भेल ईमेल ।
  घरक मेल बसथि भनसाघर, इंटरनेट पर फिमेल ।
*बदलि गेल गाम घर आ बदलल नगर आ देस।
  कहय कुणाल सुनू जनतागण चहुँ दिसि ठेसे ठेस ।

कवि राजेश राय ने सुनाया एक श्रृंगारमे सराबोर वियोग गीत -
सुनियो यौ सजना हमर कनि बात
बीतय अछि राति हम कोना कही
बुझियों यौ प्रीतम हमर जज्बात
बीतय ई राति हम कोना कही।

हेमन्त दास 'हिम' ने भी सब को मिलजुलकर रहने का आह्वाहन किया. 
बीज बंटैकेर कहियो भलमानुष रोपै नै छै
अलग चाहे हम भा जाई, धरा त होबै नै छै
किएक नहि जीवनक दिवस केँ
प्रेम सँ मिल कय बितायब
मुक्त मन ई मेघसम अछि
जेम्हर मन हम तेम्हर जायब.

जब बहने लगता है पवन तो पंकज झा को याद आ जाता है कुछ और-
सन सन बसात बहय
धक धक करेजा में 
लागई पिरितिया के बाण 
हाय राम
मोन पड़ल आई हमरा गाम.....

इस तरह भविष्य में भी समय समय पर मुम्बई के अलग अलग सार्वजनिक स्थल पर यह गोष्ठी आयोजित करने का निर्णय लिया.. एक व्हाट्सएप्प ग्रुप भी बनाया गया है इस समूह के लिए.

अंत मे धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात अध्यक्ष की अनुमति से सभा समाप्त हुई.

रपट निर्माण एवं प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम' / भास्कर झा
छायाचित्र - बेजोड़ इंडिया ब्लॉग
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
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