Friday, 17 July 2020

अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर कथाकार सिद्धेश्वर द्वारा कहानियों का पाठ 12.7.2020 को सम्पन्न

आज के जीवन की समस्याओं को दर्शाती कहानियाँ 

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(सिद्धेश्वर बहुमूखी प्रतिभा के धनी हैं।   वे न सिर्फ रेखाचित्रों के राष्ट्रीय स्तर के कलाकार हैं बल्कि पूरे बिहार के जाने-माने कहानीकार, लघुकथाकार, कवि और सबसे बढ़्कर नई उभरती प्रतिभाओं के साथ-साथ स्थापित साहित्यिक प्रतिभाओं को एक मंच पर लाकर साहित्यिक गतिविधियों को तीव्र रखनेवले एक अनोखे संयोजक हैं। इनमें जो साहित्यिक ऊर्जा है वह सेवानिवृति के बाद कम लोगों में होती है।  यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नि:स्वार्थ भाव से सहित्य की विशुद्ध साधना में जुटा यह व्यक्ति अपने-आप में एक संस्था है जिससे पूरा साहित्यकार समुदाय लाभांवित ही नहीं होता वरन एक आश्वस्ति भी पाता है कि उसके लिए एक मंच तो कम से कम क्रियाशील है ही।  अभी हाल ही में उनके एकल कहानी-पाठ का आभासी कार्यक्रम हुआ जिसकी रपट प्रस्तुत हैं।  - हेमन्त दास 'हिम')

12/07/2020 "अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका" के फेसबुक पेज पर, भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में आयोजित एकल पाठ के तहत, आज चर्चित कवि-कथाकार सिद्धेश्वर ने अपनी दो कहानियो, "घरोंदा" और "दूल्हा बाजार"का लाइव पाठ किया। 

गोष्ठी के मुख्य अतिथि चर्चित कवि और अनुगूंज के संपादक लवलेश दत्त (बरेली) ने कहा कि - "सिद्धेश्वर की दोनों कहानियाँ सामयिक और अर्थपूर्ण है। पहली कहानी 'घरौंदा' में किराएदारों की स्थिति का बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है। वहीं दूसरी कहानी 'दूल्हा बाजार' में, एक अधिक आयु की लड़की की मनोदशा और उसके अतीत में उसके साथ हुए छल का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है। उनकी  अपनी दोनों कहानियों में  संवेदना और मनोविज्ञान को बखूबी अभिव्यक्ति प्रदान की गई है। सच पूछिए तो जीवन की तल्ख हकीकत को बयां करती है सिद्धेश्वर की कहानियां।"

गोष्ठी के मुख्य वक्ता युवा साहित्यकार विजयानंद विजय (मुजफ्फरपुर) ने विस्तार से कहा कि - " एकल कहानी पाठ में कथाकार सिदेश्वर द्वारा दो कहानियों - घरौंदा और" दुल्हा बाजार" का पाठ किया गया।कहानी " घरौंदा " किराए के मकान में रहने वाले एक परिवार द्वारा भोगी जा रही कठिनाईयों, परेशानियों, दुश्वारियों और मुश्किलों की यथार्थ बयानी है, जहाँ किराएदार आए दिन अपने मकान मालिक द्वारा की जा रही ज्यादतियों और बदतमीजियों का शिकार होता रहता है।. 

अंततः प्रताड़ित होकर, कष्ट से मुक्ति पाने के लिए वह मकान छोड़ देता है। यह कथा बताती है कि सच्चा सुख और आनंद अपने ही घर में है। वहीं जीवन का सच्चा सुकून है।

"दुल्हा बाजार " समाज में व्याप्त दहेज प्रथा की त्रासद स्थिति का मनोवैज्ञानिक निरूपण है, जहाँ दहेज लोभियों ने विवाह को एक व्यापार बना दिया है।यह विपरीत परिस्थितियों में नायिका किरण के जीवट, साहस, दृढ़ निश्चय और जिजीविषा की जीवंत कहानी भी है, जो समाज में विवाह नामक संस्था के विद्रूप चेहरे को दिखाती है। यह कथा इतनी रोचक है कि जहाँ यह समाप्त होती है, वहाँ से युवतियों के लिए एक नयी शुरूआत की संभावना और संकेत छोड़ जाती है।

इस आनलाइन कथा संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि कथाकार,फिल्म अभिनेत्री डाॅ सविता मिश्रा मागधी ने कहा कि - "सिद्धेश्वर की दोनों कहानी हमारे समाज का प्रतिबिंब है। पहली कहानी "घरौंदा" के माध्यम से उन्होंने किरदार के दर्द को उकेरा है। कहानी के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया है कि माँ-बाप के स्वभावानुसार उनके बच्चे प्रतिछाया बन जाते हैं। अच्छे माँ-बाप के बच्चे बचपन में ही धीर गंभीर और लड़ाकू प्रवृत्ति के अभिभावकों के बच्चे बचपन से ही लंपट।

वहीं दूसरी कहानी "दूल्हा बाजार " में दहेज के साथ बड़ी उम्र की अनब्याही लड़कियों का दर्द बड़ी शिद्दत से उकेरा है सिद्धेश्वर ने। । किरण के जीवन में तीन लड़के आते हैं जिनसे उसका विवाह बस तय होता है, पहला डॉक्टर जिसका परिवार चार साल बाद दहेज बढ़ा देता है। दूसरा ऑनलाइन वाला जो प्रत्यक्ष देख बड़ी उम्र होने के कारण शादी से इंकार करता  है। तीसरा निठल्ला जिसके कारण उसकी नौकरी और घर से हाथ धोने की नौबत आ जाती है। मेरे अनुसार किरण को शादी से इंकार कर अपने अस्तित्व को बचाना चाहिए।  कहानी एक नई सोच को जन्म देती है। "
....

प्रस्तुति : बीना गुप्ता
परिचय - सह-संयोजक,/भारतीय युवा साहित्यकार परिषद  (पटना) 
मो: 9234760365


Saturday, 11 July 2020

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ऑनलाइन 50वाँ कवि सम्मेलन मुंबई 5.7.2020 को संपन्न

कवि सम्मेलनों का अपना अर्धशतक पूरा होने पर "अग्निश्खा परिवार" शीर्षक पर आयोजित था यह.
सभी  कवियों ने आयोजक संस्था के प्रति भावोद्गार प्रकट किया.

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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच  का 50वां ऑनलाइन कवि सम्मेलन बड़े ही हर्षोउल्लास से आज सम्पन्न हुआ! इस काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन संस्था की अध्यक्षा डॉ. अलका पांडेय द्वारा किया गया। मंच का संचालन दो सत्रो में किया गया! पहले सत्र में संचालनकर्ता की भूमिका अदा की अग्निशिखा की नींवधार अलका पांडेय जी,शायर कवि लेखक चंदेल साहिब (विक्की चंदेल), औऱ मधुर आवाज की धनी प्रतिभा पराशर जी,

इस सफल कार्यक्रम का श्रेय उन सभी 95 प्रतिभागियों को जाता है जिन्होंने एक से बढ़कर एक रचनाएं विषय “अग्निशिखा परिवार” “पर प्रेषित कीं  औऱ अग्निशिखा परिवार की गरिमा में चार चांद लगा दिए। साथ ही सफलता में महत्वपूर्ण योगदान अतिथियों विनय शर्मा  औऱ आशा जाकड़  और सुनील दत्त शर्मा  को,

दूसरे शत्र को संभाला अलका, चन्देल साहिब, जनार्दन शर्मा, सुरेंद्र कुमार शर्मा, शोभा रानी तिवारी  ने, सह संयोजक की भूमिका कवि आनन्द जैन अकेला  ने निभाई!
निर्णायक का कार्यभार डॉ अरविंद जी ने निभाया, आभार ज्ञापन संजय मालवी जी ने किया औऱ  सरस्वती वंदना की चंदेल साहिब हिमाचल से व डॉ रामस्वरूप साहू जी ने।

अलका पांडेय लिखती हैं -
कि चार महीने रोज़ मिलना बातें करना
एक विशेष लगाव आपस में हो गया है!

चंदेल साहिब लिखते हैं:-
सुना है जन्नत सा ख़ूबसूरत, औऱ कुछ भी नहीं होता साहिब
अग़र ये बात सच है चंदेल, तो अग्निशिखा को जन्नत लिखता हूँ

कवि आनंद जैन "अकेला" कटनी मध्यप्रदेश -
चमके है धूमकेतु सा यह, अग्नि शिखा परिवार।
निर्भीक पटल से जुड़े, दुनिया के कलमकार।।

शेखर रामकृष्ण तिवारी -
अग्नि शिखा है ऐसा  परिवार
बिखरी हुई प्रतिभाओ को देता सम्मान
बराबर सब को मिलता यहाँ प्यार 
सिख,इसाई,हिंदू हो चाहे मुसलमान!

डा. महताब अहमद आजाद -
मैं, जिस परिवार का हिस्सा हूं,
अभी थोड़ा बच्चा हूं,दिखने में
मैं बड़ा हूं सही,पर दिल का
बहुत कच्चा हूं।

समुन्द्र सिंह औरंगाबाद -
अग्नी शिखा के मंच में
बहती है काव्य धारा।
बसते है कई यहां पे
हिन्दुस्तां हमारा।।

गोवर्धन लाल बघेल,  टेढी़नारा जिला महासमुं (छत्तीसगढ़)
भाता अग्निशिखा हमें, देता अनुपम नेह।
लॉकडाउन शुरू हुआ, सम्मेलन का मेह।।
सम्मेलन का मेह, काव्य रस धारा बहती।
अलका दी की सोच ,सदा उत्तम है रहती ।।
कर अर्चना प्रणाम ,वार रवि का है आता।
विषय सृजन बेजोड़, मधुर स्वर सबका भाता।।

अर्चना पाठक अम्बिकापुर -
आपकर,साहित्य भारत बन गया,

शोभारानी -
सभी रहते हैं सम भाव से,
मिलता सबको बराबर प्यार।

द्रोपती साहू "सरसिज"महासमुन्द, (छत्तीसगढ़ )
आओ नदी बन जाते हैं कविता की धार लिए 
और मिले अग्निशिखा के सागर में अनुपम प्यार लिए ....

राजेश कुमार बंजारे, भाटापारा मोहभट्ठा (छ.ग.) -
आज मैं अग्निशिखा मंच के सभी साथियों का,
दिल की गहराइयों से सम्मान करती हूँ।
प्रभावशाली प्रतिभा और व्यक्तित्व के धनी,
मैं आप सभी को कोटी-कोटी प्रणाम करती हूँ।।

सुनीता चौहान हिमाचल प्रदेश 
आगमन खुशियों की जीवन में मिल गई
अग्नि शिखा साहित्यिक कृति मे घुल गई
अब मंजिलों की कतारें कदमों मे उतरते
जीवनमे भी उम्मीद शिखर फुल खिल गई

अंकिता सिन्हा जमशेदपुर झारखंड
कवियित्री की पहचान दिलाई हृदय को किया सुनहरा अग्नि शिखा ने प्रज्ज्वलित किया कविताओं का दिया
चन्दा डांगी आदित्य सीमेंट चित्तौड़गढ़

जनार्दन शर्मा (आशुकवि इंदौर मध्यप्रदेश) -
हर कोई इस अचानक से हुये लाक डाउन से हैरान परेशान सा था।
क्या करे,कब करे,कैसे करे,हर घर का यहीं फसाना था।
पर अचानक एक दिन हम लेखको के घरो पर दस्तक हो ग,ई।
मानो सामने आके साक्षात अग्निशिखा खड़ी हो गई।
फिर क्या था उस अग्निशिखा ने सब को एक मार्ग दिखाया।
जोड़ के देश के साहित्यकारों को अपना एक परिवार बनाया।

शोभा किरण, जमशेदपुर /झारखंड -
भिन्न भिन्न भाषा और शैली,
पर कानों में मिश्री घोली,
कभी चुटीले हैं अंदाज,तो
कभी कर लेते हंसी ठिठोली
मंच से जुड कर मुझे भी ,
खुशियां मिली है अपरंपार ,
ये है अपना अग्निशिखा परिवार।

ज्ञानेश कुमार मिश्र, अजमेर -
जग में यूँ होता रहे, स्वप्न मेरा साकार,
सदा कारवाँ ही बढ़े अग्निशिखा परिवार,
अग्निशिखा परिवार, घर करे तरक्की,
सुंदर बने योजना, जैसे झील है नक्की,
सुन कुमार व्यवहार उचित हो, न होगी विपदा,
लिखते रहे अनवरत, रचना सुंदर सदा ।

इस कार्यक्रम के प्रतिभागी थे -
1) शकुंतला पावनी - चंडीगढ़
2) अंकिता सिन्हा जमशेदपुर
3) गुरिंदर गिल मलेशिया
4)रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, मुंबई
5) डॉ ज्योत्सना सिंह
6) मंजुला वर्मा, हिमाचल प्रदेश
7) डाॅ0 उषा पाण्डेय, कोलकाता
😎 ओमप्रकाश पांडेय नवी मुंबई
9)राजेश कुमार बंजारे भाटापारा
10)ऐश्वर्य जोशी कापरे
11) डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार
12 सीमा दूबे साँझ
13) रमेश चंद्र शर्मा देवास
14) कवि आनन्द जैन अकेला कटनी
15)छगनराज राव 'दीप'
16)दीपा परिहार'दीप्ति'
17)पदमा ओजेंद्र तिवारी दमोह मध्य प्रदेश
18) डा अँजुल कँसल"कनुप्रिया"इंदौर
19)इन्द्राणी साहू "साँची"- भाटापारा
20) सुनीता चौहान हिमाचल प्रदेश
21) शोभा रानी तिवारी
22)दिनेश शर्मा
23)ज्योति जलज
24)सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश
25)द्रोपती साहू सरसिज छत्तीसगढ़
26) रानी नारंग
27)मुन्नी गर्ग
28)डॉक्टर दविंदर कौर होरा
29) मधु तिवारी
30)गीता पांडेय "बेबी "जबलपुर
31)गोवर्धन लाल बघेल
टेढी़नारा छत्तीसगढ़
32) सुषमा शुक्ला इंदौर मध्य प्रदेश
33) उपेंद्र अजनबी गाजीपुर उत्तर प्रदेश
34) शेखर रामकृष्ण तिवारी
35) डॉ रश्मि शुक्ला प्रयागराज
36)डा. साधना तोमर (बागपत) यू.पी.
37)हीरा सिंह कौशल हिमाचल प्रदेश
38)डाॅ. शैलजा करोडे नवी मुंबई
39)भरत नायक "बाबूजी"
लोहरसिंह, रायगढ़
40)कवि शरद अजमेरा वकील भोपाल म प्र
41)चंद्रिका व्यास
42) मीरा भार्गव कटनी मध्यप्रदेश
43) पद्माक्षी शुक्ल पुणे
44)डाॅ0 उषा पाण्डेय, कोलकाता
45) कल्पना भदौरिया स्वप्निल
46)अश्मजा प्रियदर्शिनी पटना
47)नीलम पाण्डेय
गोरखपुर उत्तर प्रदेश
48)शुभा शुक्ला निशा
रायपुर छत्तीसगढ़
49)रविशंकर कोलते नागपुर
50) विनोद कश्यप चंडीगढ़
51) डॉ नेहा इल्लाहबादी
52) रजनी अग्रवाल जोधपुर
53)डॉ लीला दीवान जोधपुर
54)शोभा किरण जमशेदपुर
झारखंड
55) रागिनी मित्तल कटनी मध्यप्रदेश
56)अंजली तिवारी मिश्रा छ. ग.
57) डॉ संगीता पाल कच्छ गुजरात
58) कांता अग्रवाल
59) विजय बाली जोधपुर
60)वैष्णो खत्री वेदिका जबलपुर
61)डा.राम स्वरुप साहू' स्वरुप'
62) आशा जाकड़
63)ज्ञानेश कुमार मिश्रा
64)डॉ मीना कुमारी परिहार' बिहार
65)अनिता शरद झा
66)समुन्दर सिंह, हसपुरा,औरंगाबाद
67) डा. महताब आज़ाद
उत्तर प्रदेश
68)मधु वैष्णव मान्या जोधपुर
69) सावित्री तिवारी दमोह
70) संजय कुमार मालवी आदर्श
71)प्रतिभा द्विवेदी मुस्कान मध्यप्रदेश
72)डॉ लीला दीवान जोधपुर
73)बरनवाल मनोज अंजान
धनबाद, झारखंड
74) रजनी अग्रवाल जोधपुर
75)अर्चना पाठक अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़
76) ज्योति भाष्कर "ज्योतिर्गमय सहरसा
77)सुरेन्द्र हरडे कवि
78) मनीषा व्यास मंच संचालिका
79)डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
80) गणेश निकम महाराष्ट्र
81) ममता तिवारी
82)गरिमा लखनऊ
83) जनार्दन शर्मा आशूकवि
84) मदन मोहन शर्मा 'सजल' राजस्थान
85)स्मिता धिरासरिया . बरपेटा रोड
86)वन्दना श्रीवास्तव,
खारघर, नवी मुंबई
87)प्रिया उदयन, केरला
88)सुरेंद्र कुमार जोशी मध्यप्रदेश
89)मीना गोपाल त्रिपाठी
कोतमा, (मध्यप्रदेश)
90)सम्पूर्णा नन्द द्विवेदी लखनऊ
91) "अरविंद श्रीवास्तव"
92) "प्रतिभा कुमारी पराशर"
93) "डॉ अलका पांडेय मुंबई"
94) "चंदेल साहिब" बिलासपुर हि. प्र.

मंच की खासियत यह है कि यहाँ कोई भी बड़ा या छोटा नहीं सब एक बराबर है, सब एक दूसरे को सहयोग करते प्रेरित करते मार्गदर्शन करते एवं सब ने एक दूसरे को सुना व सराहा, निर्णायकों ने स्पष्ट  टिप्पणी दी सबको बहुत कुछ सीखने को भी मिला।

इस मंच का दावा है कि अभी तक 50 वें कवि सम्मेलन तक 4500 से ज्यादा कवियों ने कविता पाठ कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। पूरे भारत औऱ विदेश में रह रहे कविताप्रेमी भाई बहनों को एक पटल पर लाकर खड़ा किया। 

धैर्य की परीक्षा कर रही लॉक डाउन की इस लम्बी अवधि में अग्निशिखा मंच द्वारा लगातार आभासी कवि सम्मेलनों का अर्धशतक बना देना काबिले-तारीफ़ है।
.......

रपट की लेखिका - डॉ अलका पाण्डेय
लेखिका का ईमेल आईडी - alkapandey74@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Tuesday, 7 July 2020

रणीराम गढ़वाली के उपन्यास "सिसकते पहाड़" की कथावस्तु और शिल्प / जितेंद्र कुमार

पुस्तक-चर्चा 
चर्चित कथाकार  रणीराम गढ़वाली का उपन्यास "सिसकते पहाड़" पढ़ते हुए

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समकालीन हिंदी कथा-संसार में रणीराम गढ़वाली एक सुपरिचित नाम है।हिमालय की उपत्यका में बसे गाँवों में, हर बरसात में बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, नदियों का कटाव, लोकजीवन को झेलना पड़ता है।"सिसकते पहाड़" रणीराम गढ़वाली की औपन्यासिक कृति है जिसमें वे पहाड़ों के दुख को शिद्दत से चित्रित करते हैं और मानवीय संवेदना को झकझोरते हैं। ग्राम-पटेला, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे रणीराम गढ़वाली पहाड़ी जीवन के इस अटूट दुख को "सिसकते पहाड़" उपन्यास का विषय बनाते हैं।उपन्यास के लिए वे घटना, चरित्र, स्थिति, वातावरण का सार्थक संयोजन करते हैं। पहाड़ी लोकजीवन के कार्य-व्यापारों को चुनते हैं; उन्हें एक कथा सूत्र में पिरोते हैं।लोकजीवन के उन चरित्रों की पहचान करते हैं जो हर बरसात के बाद उठ खड़े होते हैं।ये चरित्र कुदरती तबाही के बाद लोकजीवन को अपने ढँग से पटरी पर लाने की कोशिश करते हैं।इन चरित्रों में स्वयं कुदरत एक चरित्र की तरह उभरती है; गाँव भी एक चरित्र के रूप में दिखता है और नौकरशाही भी।पहाड़ी लोकजीवन के वातावरण पर लेखक की पकड़ उतनी ही मजबूत है जितनी अच्छी पकड़ "मैला आँचल" के कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु को पूर्णियाँ अंचल के लोकजीवन पर थी। लेखक का तादात्म्य संबंध पौड़ी गढ़वाल के लोकजीवन के साथ काफी सांद्र और मधुर है। इसलिए वे डंडेले (बैठक) ,बुकट्या(बकरा), गाड-गदेरियाँ, गुसैणी, भुला, बो (भौजी) ,फाट (किनारा), चुड़पट की रूड़ ( भयंकर  गर्मी), अनेदर (अति), तुमड़ी(कद्दू), गधेरे, झैड़ (बारिश), फींडू (अपशकुन सियार),ढैपुर (कमरे के ऊपर सामान रखने के लिए बनाई गई जगह), भ्वींचोल(भूकंप), थाथपड़ी (बाज), आदि लोकजीवन के अनेक आँचलिक शब्दों का व्यवहार सहज ढंग से उपन्यास में करते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए कोष्ठक में उनके हिंदी शब्दार्थ उपलब्ध हैं।

यह उपन्यास केदारनाथ मंदिर के पहाड़ों के ऊपर बादल फटने के बाद आयी भयंकर बाढ़ और उससे मची भयानक तबाही के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है।उपन्यास की कथाभूमि के ग्रामीण केदारनाथ हादसे की खबर टीवी के पर्दे पर देखते हैं। उस हादसे में कथाभूमि के दो सहोदर भाई भी शिकार बन जाते हैं। छौली (माँ), और खीमा (पिता) का वंश ही उजड़ जाता है क्योंकि उनके वही दो बेटे थे जो हादसे में मारे जाते हैं। केदारनाथ की घटना ग्रामीणों की स्मृति को झंकृत कर देती है।उनके अपने घाव हरे हो जाते हैं।वे याद करते हैं कि पाँच साल पूर्व ऐसे ही हादसे से उनका गाँव गुजर चुका है जिसमें आधा गाँव टूट कर नदी में समा गया था।जिसमें गाँव के सम्पन्न किसान परमा की पत्नी झंपुली, बेटा पिरमा, पिरमा की पत्नी और एक साल का नाती, घर सबकुछ तबाह हो गया था। परमा अगले ही दिन नाती का जन्मदिन मनानेवाले थे। हादसे के बाद परमा की आवाज जाती रही थी।केदारनाथ हादसे की खबर एक ग्रामीण मित्र साधो के घर में देखते हुए करमा के मस्तिष्क पर गहरा झटका लगता है और पाँच साल बाद उनकी आवाज लौट आती है।इसी घटना को उपन्याकार उपन्यास का प्रस्थान बिंदु बनाते हैं। एक नाटकीय उद्घाटन।

केदारनाथ हादसे की खबर जब टीवी के पर्दे पर चल रही है उस वक्त कथाभूमि में भी तीन चार दिनों से लगातार बारिश हो रही है और ग्रामीण भयभीत हैं फिर किसी अनहोनी की संभावना से।उपन्यास का गाँव कथानक में स्वयं एक चरित्र के रूप में उभरता है। इसकी लोकसंस्कृति में बाढ़ से आयी तबाही के गीत हैं।ग्रामीणों की चेतना में गोबरधन दास का मार्मिक गीत गूँजता रहता है जिसे नजीमाबाद रेडियो स्टेशन भी बीच बीच में सुनवाता है। उपन्यास का एक उल्लेखनीय किरदार गजू कोली उस लोकगीत को गुनगुनाता है। वह शोकगीत पुरे गाँव का शोकगीत है।

रणीराम गढ़वाली उन सामाजिक-आर्थिक-भौगोलिक स्थितियों का कलात्मक चित्रण करते हैं जिसका सामना प्रतिदिन पहाड़ी गाँव के ग्रामीणों को करना पड़ता है। बाढ़-बरसात में उनका जीवन खतरनाक मोड में होता ही है, उसके बाद भी साँप, बिच्छू और जंगली जानवरों के आक्रमण का भय बना रहता है।वहाँ जीवन निरापद नहीं है।इस संकटापन्न जीवन को लेखक प्रतीकात्मक रूप से एक घटना द्वारा संकेतित करते हैं। एक दिन मुख्य किरदार गजू कोली के घर में शाम को लालटेन की क्षीण रोशनी में एक बड़ा काला बिच्छू रेंगते हुए दिखता है। अगर किसी को डंक मार दे तो उस रात में बचने का कोई उपाय नहीं, साधन नहीं। गजू की बेटी रूक्मा साक्षात मृत्यु के दर्शन कर चीख पड़ती है। गजू अपनी लाठी से बिच्छू को दबाकर मार देता है और टॉर्च की रोशनी में उसे घर के बाहर फेंकने जाता है।घर में घूस आए दुश्मन को गृह स्वामी मार डालता है, लेकिन घर के बाहर भी रात के अँधेरे में कोई दुश्मन घात लगाए हो सकता है। लेखक पहाड़ी जीवन की इस स्थितियों को दर्शाने के लिए सटीक कार्य व्यापारों को कथा सूत्र में सही जगह पिरोते हैं। गजू मृत बिच्छू को बाहर फेंकने के लिए जब जाता है तो बड़ा चौकन्ना है। वह टॉर्च की रोशनी को चारों ओर फेंकता है तो उसे आँगन के किनारे बिच्छू से भी भयानक दुश्मन बाघ दिखता है। पूरा परिवार शोर मचाता है। व्यष्टि गजू कोली समष्टि गजू तेली में बदल जाता है। वह अपने परिवार के साथ गाँव वालों को भी बचाना चाहता है बाघ के संभावित हमले से। वह चिल्ला चिल्ला कर गाँव वालों को बाघ के आने की सूचना देता है। तो पहाड़ों-जंगलों के संकटापन्न ग्रामीण जीवन की ओर लेखक संकेत करते हैं।

दूसरी स्थिति है कि इन दूर दराज के गाँवों-पहाड़ों में अभीतक सड़कें नहीं बनी हैं। आने-जाने का कोई साधन नहीं है। उनके साथ बरसात की अँधेरी रातों में बरसात क्या क़हर बरपाती है यह कोई नहीं जानता। न वहाँ प्रशासन पहुँच पाता है और न पत्रकार पहुँच पाते हैं। उनका रोना धोना कोई नहीं सुनता।वे खुद ही रोते हैं और अपना रोना खुद ही सुनते हैं (पृष्ठ 171)। इन विषम परिस्थितियों में बरसात बीतते ही पहाड़ी गाँवों की जिंदगी जैसे-तैसे पुनः पटरी पर लौटती है।उसे लौटना पड़ता है।पटरी पर लौटते ही जिंदगी वर्णीय-वर्गीय, अमीर-गरीब, मान-अपमान, शोषण-दोहन, जुआ-शराब, बलात्कार आदि की बहुमुखी लड़ाईयों में फँस जाती है।मनुष्य के हजार हजार दुश्मन हैं, लेकिन उनमें मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन मनुष्य ही दिखता है।कुत्ते आपस में एक दूसरे को देखकर गुर्राते हैं; मनुष्य दूसरे मनुष्य को देखकर कुत्तों से अधिक गुर्राता है। सामाजिक, आर्थिक, भौतिक खाईयाँ उसे आपस में लड़ने के लिए उर्वर जमीन उपलब्ध कराती हैं।कथाकार रणीराम गढ़वाली"सिसकते पहाड़" में उन तमाम अंतर्विरोधों की शिनाख्त करने की कोशिश करते हैं जिनके चलते पहाड़ी गाँवों की आपसी आत्मीयता, सहयोग की भावना और शांति तिरोहित हो चुकी है और शहर की संस्कृति हावी होती जा रही है।

भले सन् 1950 में भारतीय जनता ने समानता, भाईचारा और बंधुत्व के आधार पर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य को स्वीकार किया, लेकिन वर्णगत, जातिगत और वर्गगत असमनताओं को दूर करने का सार्थक प्रयास नहीं किया।पहाड़ी जीवन में मैदानी इलाकों की अपेक्षा गरीबी अधिक है, लेकिन वहाँ भी, वर्णगत, जातिगत, वर्गगत खाईयाँ हैं जो बदली परिस्थितियों में और मुखर हुई हैं।लेखक ने इन खाईयों का चित्रण वस्तुगत ढंग से किया है जिसके चलते इस उपन्यास का कथानक उल्लेखनीय और प्रासंगिक है।लेखक इन अंतर्विरोधों से परिचालित कथाभूमि के मुख्य कार्य-व्यापारों के संश्लेषण से उपन्यास की द्वंद्वात्मक कथावस्तु तैयार करते हैं।गाँव में घनानंद, पिरथी, बौन्या, शेरसिंह जैसे ऊच्च जाति के वर्चस्ववादी मानसिकता के लोग हैं जो गजू कोली और पानू जैसे निम्नवर्ग और वर्ण के ग्रामीणों को सामाजिक आर्थिक रूप से उत्पीड़ित करते हैं और उन्हें तरह तरह से अपमानित करते हैं।लेकिन इस मुद्दे पर सवर्ण समूह का एक ग्रुप अवर्णों के साथ है और उनके साथ छुआछूत का भेदभाव रखने से इंकार करता है।सवर्णों में करमा, पिरमा, साधो, अपशकुनी, गंथी आदि की संवेदना गजू कोली और पानू के साथ है।लेखक उस भौतिक खाई का चित्रण करते हैं जो गाँव में है।गाँव में सबसे बड़ा मकान घना का है जिसमें वह पटवारी के संरक्षण में शराब और जुआ का अड्डा चलाता है।वह शराब बनाता भी है, लेकिन पटवारी कभी उसके घर छापामारी नहीं करता।गाँव के शराबी जुआड़ी उसके चाटुकार हैं।दूसरे ग्रामीण समझ रहे हैं कि घना अपने स्वार्थ में गाँव की नई पीढ़ी को बिगाड़ रहा है।जब प्रशासन की मिली भगत से सब हो रहा है तब ग्रामीण क्या करें?

उपन्यास की कथा में नाटकीय गतिशीलता तब आती है जब गाँव का दबंग शराब माफिया घनानंद एक दिन गजू कोली को करमा के डंडेले(बैठक)से निकलते देखता है।मनुवादी मानसिकता का घना गाँव में हंगामा खड़ा करता है कि एक कोली(दलित)एक उच्च जाति के डंडेले में जाने और बैठने की हिम्मत कैसे कर लिया?यह तो गाँँव की परंपरा को तोड़ना हुआ। वह गाँव में पंचायत बुलाकर गजू कोली को दंडित करने की योजना बनाता है।गाँव में विमर्श छीड़ जाता है। दरअसल पर्दे के पीछे घना की मंशा दलित गजू कोली को तीन खेतों से वंचित करना है जिसे करमा के दादा ख्यातू ने गजू की माँ परुली को परमा के जन्म के उपलक्ष्य में बक्शीश किया था।लेखक यहाँ करमा और गजू कोली के मधुर संबंधों के कार्य-कारणों की बड़ी सटीक खोज करते हैं।एक सकारात्मक विश्वसनीय कथा रचते हैं।यह कहीं से मनगढ़ंत नहीं लगता।इसकी कथा युक्ति भी श्लाघनीय है। कथा के शिल्प में गजू कोली को फ्लैश बैक में ले जाकर करमा की जन्म कथा बताते हैं। गजू कोली याद करता है कि उसके पिता रेवा ने बताया था कि उसकी माँ परुल बहुत अच्छी दाई थी।सुरक्षित प्रसव कराने में वह प्रशिक्षित दाई से भी हुनरमंद थी।करमा की माँ को प्रसव पीड़ा थी।वे दर्द से छटपटा रही थी और बारिश हो रही थी।पहले तो ख्यातू ने दूसरी दाई को बुलाया था, लेकिन वो असफल रही।तब अछूत परुल को बुलाना पड़ा।करमा की माँ का जीवन संकट में था।सवर्ण ख्यातू को पतोहू और और जन्मनेवाले शिशु को बचाना था। उन्होंने परुल को घर में घूसने की इजाजत दे दी।जच्चा बच्चा बच गये।करमा का जन्म हुआ।उसके दादा ने परुल को बिना माँगे गाँव के ऊपर के तीन खेत दे दिये।परुल स्वयं गर्भवती थी। करमा के जन्म के कुछ दिनों बाद परुल ने गजू को जन्म दिया। इस तरह करमा और गजू समवयस्क हैं।परमा मानता है कि गजू की माँ ने ही उसकी माँ को बचाया और उसको इस धरती पर जीवित रहने का अवसर दिया।दोनों के मैत्री संबंधों के बीच कार्य-कारण का मजबूत आधार है।पहले भी गाँव की वर्णवादी मनुवादी मानसिकता ने ख्यातू की उदारता की आलोचना की थी।

करमा का बेटा पिरमा है। विवाह के बारह वर्ष पश्चात् पिरमा की पत्नी बेटे को जन्म देती है करमा के घर में बहुत खुशी है।एक साल बाद करमा नाती का जन्मदिवस धूमधाम से मनाना चाहता है।जन्मदिवस की पूर्व संध्या पर गजू कोली करमा के घर बधाई देने जाता है।करमा उसे डंडेले में बैठाकर साधो के साथ चाय पिलाता है।डंडेले से बाहर निकलते समय घना और पिरथू गजू को देख लेते हैं।बस सामाजिक झमेला खड़ा करते हैं कि एक कोली एक उच्च जाति के डंडेले में कैसे बैठ सकता है?दरअसल यह पुराने मूल्यों और नये मूल्यों के बीच संघर्ष है।गाँव में एक विमर्श छिड़ जाता है।लेखक गाँव के इस विमर्श का चित्रण बेजोड़ करते हैं।

घना पुराने मूल्यों का प्रतीक है।करमा से भी उसकी प्रतिद्वंदिता है।वह उसे भी अपमानित करना चाहता है।लेकिन करमा के खिलाफ पंचायत बुलाने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ती क्योंकि करमा से उसने पचास हजार रुपये का कर्ज लिया है।दूसरी ओर उसकी नजर गजू के तीन खेतों पर है।एक तथ्य और है कि गजू का बेटा पढ़ लिखकर पटवारी नियुक्त हो गया है।हालांकि उपन्याकार ने गजू के पटवारी बेटे का उपन्यास में समुचित चरित्र खड़ा नहीं किया है, लेकिन पाठकीय चेतना इस अधूरेपन को अपनी कल्पनाशीलता से भर सकता है।

घना उस दिन का इंतजार करता है जब करमा और उसका बेटा पिरमा किसी कार्यवश गाँव से बाहर जाते हैं।वह छल करके गजू के खिलाफ पंचायत बुला लेता है।अगर पंचायत में करमा होता तो घना पंच नहीं बन पाता क्योंकि परंपरा के अनुसार पंचायत बुलानेवाला स्वयं पंच बनने का अधिकारी नहीं होता।वह अपने दो चाटुकारों पिरथू और पियक्कड़ शेरू को अपने साथ पंच बना लेता है।लेखक आज के गाँवों की तथाकथित पंचायतों की धांधली,अन्याय और मनमानी को सफलतापूर्वक बेनकाब करते हैं।

गजू कोली मेहनत, भाईचारा, सामाजिक सरोकार, ईमानदारी, दाम्पत्य प्रेम और आधुनिक चेतना का प्रतीक है।घना द्वारा आहूत पंचायत में वह शामिल होता है, लेकिन घना को सार्वजनिक रूप से पंच के रूप में मान्यता देने से इंकार कर देता है।क्योंकि यह पंचायत करमा की उपस्थिति में बुलाई जानी चाहिए थी।वह करमा के कहने से उसके डंडेले में गया था।घना आरोप लगाता है कि गजू निम्नवर्ण का होकर उच्चवर्ण के करमा के डंडेले में जाने का अधिकार नहीं रखता।गजू कोली घना के प्रश्नों का सटीक उत्तर देते हुए आधुनिक चेतना का परिचय देता है,"मुझे तुम्हारी बराबरी करने का कोई शौक नहीं है।मैं अपनी जाति से बहुत प्यार करता हूँ।....रही बात अधिकार की तो वह मैं आपसे ज्यादा जानता हूँ ....।यह पंचायत आपको करमा दा के रहते बिठानी चाहिए थी"।गजू आगे चुनौती देता है,"आप मुझे कहीं से खरीद कर नहीं लाए हैं।गुलामी का जमाना चला गया।अँग्रेज चले गये हैं तो उनके साथ उनके नियम उनके कानून उनकी सत्ता सब चली गई है(पृष्ठ 55)"।

पंचायत में सजा सुनाए जाने पर गजू जरा भी विचलित नहीं होता; वह घोषणा करता है,"मैं गजू कोली भरी पंचायत में अपने कुल देवता नरसिंह देवता की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं आज की पंचायत को नकारता हूँ।इसका फैसला नहीं मानता और न ही इस पंचायत के पंचों को मानता हूँ"। इस तरह गजू कोली के रूप में लेखक एक अविस्मरणीय चरित्र का सृजन करते हैं।

पंचायत के फैसले के खिलाफ गजू करमा दा और साधो वगैरह की सहमति से महापंचायत बुलाने का विधिवत आवेदन देता है।लेकिन उसके भीतर एक डर भी है कि पता नहीं महापंचायत का फैसला कैसा हो!

लेखक रणीराम गढ़वाली गजू का चरित्र सृजित करने में पर्याप्त सावधानी बरतते हैं।गजू के चरित्र में लचीलापन और व्यवहारकुशलता भी है।पंचायत की मीटिंग में वह जैसी निर्भीकता और आधुनिक चेतना का परिचय देता है, वैसी निर्भीकता वह पटवारी केसरीलाल के समक्ष नहीं दिखा पाता।पटवारी केसरीलाल भ्रष्ट नौकरशाही का चेहरा है।पटवारी मैदानी इलाकों में राजस्व कर्मचारी होता है।वह जमीन का खाता खेसरा खतियान रखता है, मालगुजारी वसूल करता है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पटवारी को कोल्हू मशीन की छानबीन से लेकर बलात्कार का केस दर्ज करने, अपराधी को गिरफ्तार करने तक का हक है।गजू तेली कोल्हू मशीन में सरसों का तेल पेरता है।एक दिन पटवारी उसके घर आता है और बेवजह गजू को सरसों तेल में मिलावट का आरोप लगाता है।वह बेशर्मी के साथ गजू से माँग करता है,"कभी-कभी दो चार सेर सरसों तेल हमारी चौकी पर पहुँचा दिया करो गजू"।गजू थोड़ा चौंकता है तो नौकरशाही का भ्रष्ट चेहरा कहता है,"हम यहाँ के पटवारी हैं रे गजू।हमारा मान सम्मान करना आपका फर्ज है"।तभी गजू की बेटी घर से दुमुँहा त्रिशूल लेकर निकलती है।गरीब गजू के घर में जंगली जानवरों से बचाव के लिए वही एकमात्र हथियार है।पटवारी दुमुँहा त्रिशूल गजू से माँग लेता है।गजू की पत्नी पटवारी के व्यवहार से परिचित है, वह जल में रहकर मगर से झंझट नहीं लेना चाहती।गजू वहाँ लचीला और व्यवहारकुशल दिखता है।

पटवारी केसरीलाल का चरित्र आजादी के बाद के नौकरशाही के भ्रष्ट चरित्र का आईना है।सिसकते पहाड़ की कथा का इकहरापन टूटतापहाड़ी अंचल के गाँव सिर्फ बाढ़ और कटाव से त्रस्त नहीं हैं, बल्कि वे भ्रष्ट नौकरशाही और मनुवादी वर्णवादी मानसिकता से भी गाँव त्रस्त हैं।

पटवारी का चरित्र भी उल्लेखनीय है।लेखक उसी के चपरासी गंथी द्वारा उसका चरित्र चित्रण कराते हैं।"पता नहीं जिंदगी में कैसे पटोरी से पाला पड़ा है।साला कोबरा है कोबरा!...जब से यहाँ आया है लोगों का जीना हराम कर रखा है।इसका बस चले तो यह खेतों में गुड़ाई निराई करनेवाली औरतों और घसियारिनों को मुँगरी(भुट्टा)की तरह नंगा कर दे"।पानू को घना के साथ मिलकर पटवारी ने जेल भेजवा दिया और दोनों ने उसकी सुंदर पत्नी का लगातार यौन शोषण किया।इस तरह लेखक दिखाते हैं कि पहाड़ों में भी गरीब मजलूम स्त्रियों का यौन शोषण सत्ता के संरक्षण में गाँव के दबंग और अमीर करते हैं।

पहाड़ी गाँवों के यथार्थ चित्रण के लिए लेखक किरदारों को अतीत दीप्ति में भेजते हैं। मुख्य किरदार गजू बार बार स्मृतियों में जाकर पूरे गाँव की आर्थिकी पर प्रकाश डालता है।पहले के जमाने में इन पहाड़ों में आज की तरह सड़कें नहीं थीं।आने जाने के लिए पतली पतली पगडंडियाँ होती थीं।....लोग साथ मिलकर सामान लेने के लिए सौ दो सौ किलोमीटर दूर तक पहाड़ के उबड़ खाबड़ रास्तों पर.... जंगलों में रातें बिताते हुए, अपनी जरूरत का सामन लेने के लिए रामनगर जाते थे।तब गाँवों में भोटिया लोग अपनी भेड़ों पर सामान लाते थे।

महापंचायत वाली घटना से उपन्यास के कई चरित्रों--करमा, गजू, दिकुली, घना, गंथी, भीमा, अशगुनी, मनबर सिंह, बसन्तू, बैसखू, कलमू, शेरू, हरकू, बीरू, साधो, खिमुली, बिंदुली आदि पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।महापंचायत ने गाँव में अद्भुत बहस छेड़ दिया। पुराने मूल्यों और नये मूल्यों के बीच टकराहट तो होती है, भ्रष्टाचार और दबंगई के खिलाफ भी जनता जागरूक होती है।महापंचायत के पंचों में ईमानदारी, न्याय बोध और नैतिक बोध का प्रस्फुटन होता है और घना जैसी मनुवादी अन्यायवादी शक्तियाँ पराजित होती हैं। गजू कोली की जीत होती है और घना, पिरथू, शेरू को अपने गाँव के अलावा कहीं भी, किसी गाँव में पंच बननेका अधिकार छीन लिया जाता है।इस तरह जनमत और बहुमत के साथ नये मूल्यों की जीत होती है।"सिसकते पहाड़"की कथा वस्तु की यही सार्थकता है।
.......

इस आलेख के लेखक - जितेन्द्र कुमार
आलेख के लेखक का ईमेल आईडी - jitendrakumarara46@gmail.com
संदर्भ :सिसकते पहाड़(उपन्यास)
उपन्यास के लेखक:रणीराम गढ़वाली
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com





आलेख के लेखक - जितेंद्र कुमार


Monday, 6 July 2020

आईटीएम की 112 वीं गोष्ठी आभासी रूप में 5.7.2020 को संपन्न

बारिश के इन बूंदों के संग, काश कोरोना बह जाए

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बारिश के इन बूंदों के संग,  काश  कोरोना भी बह जाए,
संकट विकट जो खड़ा देश में, ताश के महल सा ढह जाए,
कोरोना  समूल  नष्ट हुआ,  कोई तो कानों में कह जाए,
शोक संताप सब दूर हटे,  दुनियाँ में हँसी खुशी रह जाए I
(-प्रकाश चन्द्र झा) 

कविवर प्रकाश चन्द्र झा जिन्होंने इस कवि गोष्ठी  की अध्यक्षता का भार संभाला उनकी इन पंक्तियों से कार्यक्रम प्रबंधक  (संचालक) अनिल पुरबा ने लगातार चौथी बार सब आभासी रूप में काव्य-गोष्ठी कार्यक्रम का आरम्भ किया। ध्यातव्य है कि पिछले नौ सालों से वरीय नागरिकों द्वारा आयोजित यह मासिक गोष्ठी बिना किसी रुकावट के चलती आ रही है जिसके मुख्य संयोजक विजय भटनागर हैं जिन्हें अनिल पुरबा, विश्वम्बर दयाल तिवारी, सेवा सदन प्रसाद, आदि का समर्थन मिलने के साथ-साथ प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान आईटीएम (जहां यह संचालित होता है) के पूर्व विभागाध्यक्ष चन्दन अधिकारी का भी भरपूर सहयोग मिलता रहा है.

पूरा कार्यक्रम व्हाट्स एप्प ग्रुप में संचालित हुआ. प्रबंधक जिसका नाम लिखते वे अपनी रचना पटल पर डालते. साथ ही अपना चित्र भी और दर्शक गण ताली या फूल के आइकन डालकर उनकी वाहवाही करते. रचना पढ़े जाने के बाद यहाँ की आभासी गोष्ठी में शब्द लिखकर प्रतिक्रिया देना मना होता है ताकि समय ज्यादा न लगे.

इस बार पुनः वंदना श्रीवास्तव के कोकिल कंठ से सरस्वती वंदना के बाद भारत भूषन शारदा के नेतृत्व में सभी ने अपने घर में खड़े होकर पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय गान गाया.  फिर शुरू हुआ कवि गोष्ठी का सिलसिला. हर रंग की कवितायेँ  पढ़ी गईं पर कोरोना संकट, चीन सीमा पर शहीद हुए हमारे जवान आदि मुद्दे प्रमुखता से छाये रहे. 

पढ़ी गई कविताओं की झलक प्रस्तुत है - 
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भारत भूषण शारदा -
जिसे भाल पर गया लगाया किया सभी ने वंदन है
चुटकी भरकर तिलक लगा लो धूल नहीं यह चंदन है!
नदियां जिसकी प्यास बुझाए धरा उगलती सोना है 
अपनी भारत मां का देखो कितना रूप सलोना है!

डा. रामस्वरुप साहू 'स्वरुप' -
हम कितने विश्वास जी गए,
दूर थे कितने पास जी गए।
स्वप्न अधूरे जीवन के हुए पूरे,
प्रकृति परक आभास जी गए।
उलझन जीवन की सुलझाते,
सागर तट पर मोती पा जाते।
निपट निरापद जीवन शैली,
सोम्य सुभग मधुमास जी गए।

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता (नवी मुंबई)-
मानव संवेदना क्या मर गयी,
हुये डाक्टर कई लहूलुहान।
जो कोरोना भगाने के वीर है,
कुछ सरफिरे ले उनकी जान।।
मानव.......................... 1

हेमंत दास 'हिम' (नवी मुंबई) -
वबा के इस ज़ोर में हम कैसे करें सलाम    (वबा = महामारी)
भूल गए हैं ख़ुद को और भूले उनका नाम
इक संक्रमण की मिरी जां है तुझसे दरख़्वास्त
तू मुस्कुरा वहीं से और मेरा काम तमाम
क्रोना भगाने में बता, कौन हे ज्यादा हेल्पफुल
बोलूं अल्लाह या मैं जापूं राम राम?

हुनर रसूलपुरी - 
वो उधर मसरूर हैं
तो हम इधर रंजूर हैं ।
अपनी-अपनी आदतों से
दोनों ही मजबूर हैं ।
अब हमारी समत भी कर दे
तू इक नज़र करम
तेरे दर से दूर रह कर
हम बहुत रंजूर हैं
(उर्दू से हिंदी अनुवाद -  विश्वम्भर दयाल तिवारी)

निरूपमा शर्मा (नवी मुंबई)
थके नैन पिंघला है कजरा,
बिंदिया चुप ना खनके कंगना,
रूप निहारूँ दर्पण में क्या,
दर्पण चुप प्रतिबिम्ब ना बोले,
ऐसे में मैं पिया मिलन की,
कैसे झूठी आस लिखूँ।
अब क्या शृंगार लिखूँ।
आया सावन, मेघों का गर्जन,
चमके बिजली ना  चमके मन,
गुम हुई सखियों कि फुगड़ी,
सूने हैं सावन के झूले,
ऐसे में सूखे मन की,
कैसे मैं बरसात लिखूँ ।
अब क्या शृंगार लिखूँ ।

ओमप्रकाश पांडेय -
आओ चलो आज यूं ही मोहब्बत करते हैं।               
 हर किसी के दिलों  में 
कोई न कोई आरज़ू
कोई अरमान हुआ करता है
कुछ स्वपन दिखता है
आंखों में हमेशा
कभी अपने आंखों में
कभी महबूबा  की आंखों में
पर बिना किसी आरज़ू, तमन्ना के
आओ चलो हम
आज यूं ही मोहब्बत करते हैं.......

विमल तिवारी -
जब द्बेष ये मन मे प्रविष्ट हुआ
समझो कि अब कुछ अनिष्ट हुआ,
जब पाखंड मे लिप्त हुए प्राणी,
तब नित्य अदृश्य कुकृत्य हुआ।
हम आदर्श की मूरत जिन्हे समझे,
वे पग पग पर जग से उलझे
आचार - विचार भुला बैठे तो
रोगों से जग ये ग्रसित हुआ।

शमर जुगाड़ देवबन्दी -
आपकी खिदमत में
मुनासिब हो तो मिलने के लिए
गर्दन हिला देना ।
अगर ये भी नहीं मुमकिन
इशारे से बता देना ।
तुम्हें पहचान पाऊँ
ऐसी कुछ तरकीब बतलाओ
नहीं तो बस जरा सा हँस के
बुरका ही उठा देना ।
(उर्दू से अनुवाद  -विश्वम्भर दयाल तिवारी)

डा० हरिदत्त गौतम "अमर" -
शेरों को छेड़ना मौत है दिखलाया गलवान ने।
 प्रलय मचा दी बदला लेने एक एक हिन्द जवान ने।
जर्रा जर्रा थर्राया जब पलटवार की वीरों ने।
वज्र कठोर मुष्टिका पेलीं रगड़  रगड़ रणधीरों ने।

शोभना ठक्कर -
बात सुघर सकति है बात जो हो जाये तो,
बात इतनी सी दोनों को समझ में आ जाये तो .
आप सीधे रस्ते से जा रहे है तो  ठीक हैं,
पर सामने से कोई टकरा जाये तो
.
विजयकान्त द्विवेदी -
संक्रमण फैलाया चीन ने
किया अतिक्रमण भी चीन।
तुरंत किया भारत से  जंग ।
बुद्ध दिया भारत ने जग में
चीन  ना पाक दिये यद्ध ।
द्वेष द्रोह दुषित मानस में
कैसे विचार उठें शुद्ध  ‌।
बर्रबर्रता कर रहा सीमा पर
क्रूर, कपटी लालची  चीन ।
महंगा पड़ेगा पंगा तुमको
अब  होगे  तुम गमगीन  ।

मधु श्रृंगी -
याद आती है चूल्हे की वो रोटियां,
माँ की अंगुली सें गूंथी हुई चोटियां ।
याद आती है झांकी मुझे गावं की ,
खट्टी मीठी सी लटकी हुई इमलियां ।।
दादी उबटन लगाकर नहलाती थी जब,
मैया पलकों में काजल लगाती थी तब ।
बापू खेतों की सैर कराते मुझे ,
हाथ छू आते गेहूं की वो बालियां ।।
याद आती----

सतीश शुक्ल -
चकित पुरुषार्थ साथ वह
चढ़ता जाता लिए सलीब
मनमें आस लिए विस्वास लिए ..
शिखरपर उसे मिलेगा सुखका  सूरज
नंदनवन की सुरभित  हवा
औरसुकून भरी सफलता  .

सत्य प्रकाश श्रीवास्तव -
1. यादों के आयने, मैं खुद धो रहा हूँ।
न जाने ये क्यों अब, सच नहीं बोलते हैं।।
2. आज की दुनियां में,
लोगों की फितरत अजीब है।
कहते हैं खुद से,
मैं तुमको शायद नहीं जानता हूँ।।

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
परिजनों से नहीं
अपनों से अधिक
परेशान होता है ।
बुढ़ापा एक दिन
पायदान होता है ।
अपने दर्द की दवा
ढूँढ़ता है घर-बाहर
सब पर अधिक रखे
पर खुद पर कम ध्यान
एहसास में अपनेपन
का मान होता है ।

चन्द्रिका व्यास, खारघर नवी मुंबई -
कौरव पाण्डव के चौसर जैसा
शतरंज का शौक नहीं रखती
ऐसी जीत करूं न हासिल
जो अपनों को खोकर मिलती !
चौसर में पासे फेंक गोटी है 
चलती शतरंज में चले प्यादे
हार जीत की इस जंग में
हारे तो है केवल नारी !

अशोक वशिष्ठ -
अस्सी दिन से भी अधिक ,  बैठे घर में बंद।
फीके-फीके-से लगें ,  जीवन के सब छंद ।।
जीवन के सब छंद  , न बाहर आना - जाना।
जिनसे मिलते गले , न उनसे हाथ मिलाना।।
कोरोना का काल , बीतता घंटे गिन - गिन ।
बाहर ख़तरा बहुत , रहें घर में कितने दिन ।।

पुरुषोत्तम 'उत्तम' -
कभी प्यार का यूँ ही इज़हार मत कर
किसी राह चलते का एतवार मत कर ।
देखो परख अब दिल लगाने से पहले
किसी गैर को जाँ का हकदार मत कर ।
चैन-ओ-अमन हो , जिंदगानी बशर हो
खौफ़ से जमाने को शर्मशार मत कर ।

दिलीप ठक्कर "दिलदार" -
फिर भी मैं ने
दस रुपये की नोट उसकी और की
वह बोल पडी
"बलून नहीं तो पैसे नहीं
और
मुस्कुरा कर चली गई "

वन्दना श्रीवास्तव -
हमने भी बंद कर दिए रस्ते, वो भी फिर लौट कर नहीं आया।
उनको उस दौर में भी मुश्किल थी, हमको ये दौर भी नहीं भाया।
देखकर आदमी की फितरत को, दिले हैवान आज घबराया।

अनिल पुरबा -
साजन के पधारने से आनंदित था मन,
वर्षा ऋतु का भी हो आया था आगमन,
अब उसके संसार में स्वच्छंद उमंग  थी,
एक नए युग के आरंभ की तरंग थी I
धरा भी उत्साह से प्रफुल्लित हो उठी,
वर्षा भी बरसने में पूर्णतया आतुर थी,
दोनों के अंतर्मन में उमड़ा प्रेम का सागर,
सारी कायनात ने कर लिया विशेष शृंगार I
.
अशोक 'यारनिर्विकार' -
पिंग पिंग करने वाले
सभी खिलौने फेंकेंगे
बच्चों को सिखला देंगे
खो खो कबड्डी खेलेंगे
खेलों के आरंभ अंत में
हुंकार करेंगे हम
वंदे मातरम वंदे मातरम
दिन छोटे हों या बड़े हों
या कठिनाई भरे पड़े हों
भारत मां के फौजी जैसे
सीना ताने रहेंगे हरदम
कभी नहीं भूलेंगे हम
वंदे मातरम वंदे मातरम

किशन तिवारी, भोपाल -
भीड़ भरा चौरस्ता हूँ मैं घर की एक डगर है माँ
और उम्र कटगई सफ़र में जब भी लौटा घर है माँ
आता नहीं समझ जब कुछ भी बेचैनी बढ़ जाती है
पीड़ाएँ पढ़ लेती मेरी रखती एक नज़र है माँ
रोज़ बदल लेता हूँ चेहरे अपना चेहरा भूल गया
आंचल में रखती सहेज कर आईना भीतर है माँ
आज छोड़ कर तुझे अकेला आया महानगर लेकिन
सागर में तूफ़ान उठा है कश्ती भी जर्जर है माँ

विजय भटनागर -
सब यह, कह सकें देश मे, इस वर्ष, अमन चैन की बारिश है,
ऐ वर्षा हर भारतीय की तुझसे यही गुजारिश है।
अब कोई रस्सी गले का फंदा ना बने हमारे देश में,
इस वर्ष देश में हो सही बारिश प्रभु से यही फरमाइश है ।
सदियों से मेहनतकस किसान ने जी तोड़ मेहनत की
बताओ क्यों घर कच्चा, बेटा नहीं पढ पाता इंग्लिश है।
किसान परेशान हो आ जाते शहर में मजदूर बनकर
फिर भी नसीब नहीं बदलता उनका ये कैसी साजिश है।
सदियों में ही कोई किसान बन पाया हो सरदार पटेल
बेमौत मरता किसान, गर समय से होती नहीं बारिश है।

नेहा वैद्या -
धृष्टता पर धृष्टता करता रहा दुश्मन कि हम,
चुप रहेंगे कुछ न बोलेंगे सहेंगे हर सितम
भावना प्रतिशोध की मन में न लाऊं किस तरह
आज दुश्मन को दिलानी याद ऐसे युद्ध की,
थी चटाई धूल जब धरती ने गौतम बुद्ध की
शौर्य के जयघोष मैं जो न लगाऊं किस तरह
शोक में है देश सारा गुनगुनाऊं किस तरह।

प्रकाश चंद्र झा (अध्यक्ष) -
कोरोना    अगर    करता   रहेगा,
लोगों  को  यूँ   ही  रोज  बीमार.
कितना जटिल यह जीवन होगा,
कैसे   चलेगा  अब  यह  संसार.
नहीं किसी के घर आना जाना,
ना ही मिलने जुलने का संयोग.
सुख – दुख  कैसे  मिल बाँटेंगे,
आपस में घर परिवार के लोग.

इस तरह से प्रेम और सद्भाव के माहौल में अध्यक्ष की अनुमति से कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा हुई और सभी सदस्यों एवं मुख्य संयोजक विजय भटनागर ने कार्यक्रम-प्रबंधक (संचालक) अनिल पुरबा को सफल संचालन हेतु बधाई दी क्योंकि आभासी (ऑनलाइन)  गोष्ठी में उनका दायित्व और बढ़ जाता है.
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रपट की प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
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Saturday, 4 July 2020

अजगैबीनाथ साहित्य मंच सुलतानगंज, भागलपुर द्वारा अंतरराष्ट्रीय आभासी कवि गोष्ठी 28.6.2020 को संपन्न

चीनी उत्पादों के मोह में फँसकर अपने ही सैनिकों के लिए कफन खरीद रहा हूँ

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(श्री भावानन्द सिंह प्रशांत सुल्तानगंज, भागलपुर में रहनेवाले एक अत्यंत सक्रिय साहित्यकार हैं जो लगातार अनेक साहित्यिक गतिविधियों में शामिल रहते हैं और दूसरों को भी प्रेरित करते रहते हैं. वो एक काव्य संस्था के अध्यक्ष भी हैं जिसके द्वारा हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी आयोजित की गई जिसकी रपट नीचे प्रस्तुत हैं. - समादक) 

दिनांक 28/6/2020 रविवार को अजगैबीनाथ साहित्य मंच सुलतानगंज ,भागलपुर के बैनर तले अंतरराष्ट्रीय आनलाईन कवि गोष्ठी का आयोजन मंच के संस्थापक सदस्य डा. श्यामसुंदर आर्य की अध्यक्षता में आयोजित की गई जिसमें विदेश के अंतर्गत अमेरिका के फ्लोरिडा, युरोप के बेल्जियम तथा भारत से राज्यों राजस्थान, उत्तरप्रदेश, नयी दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार के कवियों ने कविता पाठ किया जिसके अंतर्गत लखनऊ, जौनपुर, कोटा, जयपुर, शिवपुर, मुंगेर, भागलपुर, बांका, खड़गपुर, बरियारपुर, सुलतानगंज के कवियों ने काव्य धारा को वेब साहित्यिक आकाश में प्रवाहित किया ।

कार्यक्रम का संचालन मंच के अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत ने किया और संयोजन खड़गपुर के सिद्धहस्त शायर ब्रह्मदेव बंधु ने किया। बिहार से बाहर के सभी आमंत्रित कवियों को मंच की ओर से विशेष रूप से सम्मानित किया गया। 

सर्वप्रथम कविता पाठ जयपुर राजस्थान के कवि अरूण धर्मावत ने किया। उन्होंने कहा -
पलभर में निगाहों के मंजर बदल गये ,
हम अपने ही शहर में दरबदर हो गए।

शहीदों की याद में जौनपुर उत्तरप्रदेश के कवि रंगनाथ दूबे ने कहा - 
उफ ! उस लम्हे को उसने कैसे सहा था ? 
जब तिरंगे में लिपटे हुए ...अपने शौहर को उसकी बेवा ने लव यू कहा था ।

लखनऊ से क्रांतिकारी शायर कुमार अतुल ने देश के सैनिकों के सम्मान में कहा -
तिरंगे की हिफाजत में हम अपनी जान रखते हैं,
हम हर मजहब से पहले दिल में हिन्दुस्तान रखते हैं ।

बेल्जियम (युरोप) से शायर कपिल कुमार ने अपनी गजल में कहा - 
बात उसने कही नहीं होती, फिर कहा सुनी नहीं होती 
जला तो दें अपना घर , ऐसे तो रोशनी नहीं होती।
सभी के बाजू में झूठ होते  हैं, बात हरेक सही नहीं होती ।

वहीं फ्लोरिडा अमेरिका से कवियित्री आशा मुखारया ने अपनी कविता हवा व जीवन के माध्यम से कहा -
 मैने मन में , लोगों के प्यार को कैद करना चाहा ,
पर मन को ठेस लगी, और अपनापन चला गया ।

नयी दिल्ली से कवि रामकृष्ण शर्मा ने कहा -
प्यार दिल में अब भी मचलता रहता है, 
ख्याल दिल में हर वक्त चलता रहता है । 

शिवपुर मध्यप्रदेश से कवि अनिल अनमोल ने कहा - 
मेरी आँखों से बरसाती बून्दों का खुशियों का सावन कर दो , 
खुशबू घोल दे जुल्फों की ,फिजाओं मे ये मौसम मनभावन कर दे ।

वहीं मोहन गार्डेन दिल्ली से शायर रईस सागर ने अपनी गजल में अपने देश को प्राथमिकता दी और कहा -
 हर कली गुल चमन में मेरा हिन्द है ,
 जिस्म -रूह औ जेहन में मेरा हिन्द है ।

कोटा से कवि -गीतकार नवीन गौतम ने अध्यात्मिक गीत सुनकर मन मोह लिया -
ये दुनिया तो इक मेला है ,है ये सबको ध्यान ,
नहीं भूलना ईश्वर को भी, यही मोक्ष का ज्ञान।

खड़गपुर से शतदल साहित्यिक पत्रिका के संपादक कवि प्रदीप पाल ने अपनी कविताओं में समकालीन विषयों को रखते हुए कहा -
गौछी घर का शगुन ,आँचल में बाँधकर जार ही है 
धनरोपनियाँ ,कादो -कीचड़ में सजाएगी ,
बिचड़े से धन क्यारियाँ, और गाऐंगी कजरी -बारहमासा। 

मुंगेर के जाने माने शायर विकास ने अपनी गजल में कहा -
जब रातों की बांहों में खो जाता हूँ ,
कुछ -कुछ उसके ख्वाबों में खो जाता हूँ ,
आंगन, दर्पण दामन ये सब देखूं तो ,
अपने घर की यादों में खो जाता हूँ।

वहीं कार्यक्रम के संयोजक खड़गपुर के ख्यातिलब्ध शायर  ब्रह्मदेव बंधु ने गरीबों की मुफलिसी पर कहा -
जो रखी सीने में कैसी आग है बाबा,
लव पे कोयल और दिल में आग है बाबा, 
भूख से बेसुध पड़ी आँतों  से पुछो तो, 
क्या दिवाली क्या फाग है बाबा। 

मंच के अध्यक्ष. भावानंद सिंह प्रशांत ने देश की सीमाओं पर दुश्मन देश के वर्तमान हालात पर देश के नागरिकों को अगाह कर  कहा - 
 चीनी उत्पादों के मोह में फँसकर, 
अपने ही सैनिकों के लिए कफन खरीद रहा हूँ ।

वहीं लोहची बरियारपुर मुंगेर के गजलगो शायर ने कहा - 
पैमाने से छलकती मय, मयकशों की नादानी से, 
कश्मीर का टुकड़ा हुआ तो पुछेंगे हिन्दुस्तानी से ।

मंच के संस्थापक सदस्य डॉ. श्यामसुंदर आर्य ने कहा -
आप हमसे दूर क्यों होने लगे, कटे कटे से दूर क्यों रहने लगे ।

वहीं मनीष कुमार गूंज ने अंगिका में सेना के पुकार को सुनाया, कहा -
चुपचाप रहो हो भाय ,
लागै छै सीमा पर पुकारै छै ,हमरो भारत माय .।..

युवा कवि एम. सलमान बी. ने मजदूरों की व्यथा को अपनी कविता में रखकर कहा -
ऐ शहर ! कितनी उम्मीदें लेकर आया था तेरे पास ,
ऐ शहर ! आँखों में कितने सपने आया था तेरे पास ।

अंत मे मंच के  कवियों द्वारा  सीमा पर शहीद हुए जाँबाज सिपाहियों की शहादत पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर  कवि गोष्ठी की समाप्ति की घोषणा अध्यक्ष द्वारा की गई ।
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रपट की प्रस्तुति - भावानंद सिंह 'प्रशांत'
प्रस्तोता  का ईमेल आईडी - bhawanandsingh61162@gmail.com
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