Thursday, 15 October 2020

"रचनाकारों की वाह वाही कितनी और कहां तक?" विषय पर भा. युवा साहित्यकार परिषद द्वारा 11.10.2020 को परिचर्चा सम्पन्न

 रचना पर वाहवाही के समय निष्पक्षता आवश्यक
कर्नाटक, उ.प्र.,म.प्र.,प. बंगाल, झारखंड, बिहार, दिल्ली और बिहार के रचनाकारों ने भाग लिया

FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए )




पटना :" रचना पर प्राप्त प्रतिक्रिया और मूल्यांकन पर टिप्पणी से संबंधित रचनाकार की रचनाशीलता, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है lलेखक का उत्साहवर्धन तो आवश्यक है, लेकिन आंख मूंदकर की गई वाह वाही घातक सिद्ध हो सकती है lइंटरनेट या प्रिंट मीडिया में बेसिर पैर की कोरी अतिरंजीत वाहवाही की निरर्थकता असंदिग्ध है  जहां पर किसी भी रचनाकार को सीधे प्रेमचंद, रेणु, निराला जैसे महान साहित्यकारों के सिहासन पर बैठा देते हैं !" भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में फेसबुक के "अवसर साहित्यधर्मी  पत्रिका" के पेज पर रचनाओं पर "रचनाकारों की वाह वाही कितनी और कहां तक?" विषय परिचर्चा पर अपना विचार प्रस्तुत करते हुए,  इस ऑनलाइन संगोष्ठी के मुख्य अतिथि भगवती प्रसाद द्विवेदी  ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया l

ऑनलाइन कार्यक्रम  के संयोजक और संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने कहा कि- "किसी भी रचना पर रचनाकार की वाहवाही करने में आत्मसंयम नहीं खोना चाहिए और  न ही दोस्ती या खेमेबाजी के प्रभाव में आना चाहिए l वाहवाही पुरस्कार का ही दूसरा रूप हैl किसी की  रचना के मूल्यांकन के समय पाठक को एक निष्पक्ष और निर्भीक निर्णायक की भूमिका अदा करनी चाहिए! "

अध्यक्षता कर रही बेंगलुरु से डॉक्टर सविता मिश्रा मागधी ने  पठित विचारों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि - "ज्यादातर मामले में देखने को मिलता है कि जिनके पास पद, प्रतिष्ठा, पैसा और ऊपरी पहुंच है,  वे अपनी किसी भी प्रकार की रचना पर, वाह-वाही बटोरने में सफल हो जाते हैंl ढेर सारे ऐसे पाठक भी है,  जो फेसबुक व्हाट्सएप ग्रुप या कवि सम्मेलनों में बिना पढ़े सुने लाइक और वाह वाही करने में सबसे आगे रहते हैं l वाहवाही और नित्य दिन छद्म पुरस्कार बटोरने के फेर में कई रचनाकार तो रचनाओं की चोरी भी  करने लगे हैं l 

कुंदन आनंद  जो कि "एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक भी हैं,ने  कहा कि - " प्रशंसा करने वाले लोगों से पूछना चाहिए कि उन्हें रचना क्यों पसंद है? रचना में उन्हें कौन सा गुण दिखाई दिया? जिसकी वे प्रशंसा कर रहे हैं।" 

दिनेश चंद,  जो हावड़ा से थे, उन्होंने कहा कि ताली मिलती है तो उत्साह बढ़ता है। और, जब उत्साह बढ़ता है तो रचना अपने आप निखर जाती है।

झारखंड से युवा कथाकार अजय के अनुसार रचना का सही आकलन होना चाहिए रचना पर आलोचना होनी चाहिए तथा रचनाकार को ख़बर होनी चाहिए कि आपकी रचना में कौन सा गुण व दोष है। 

विजययानंद विजय के विचारानुसार - "ना पढ़े तारीफ करना लेखक के साथ अन्याय है। अगर सही लेखन है तो वह दिल तक अपनेआप पहुंच जाती है

गीतकार "डॉ शांति जैन ने कहा कि गुरु और वैद्य को कठोर होना चाहिए। सही बात है। अगर गुरु कठोर नहीं होगा तो, उसका शिष्य कभी सफल नहीं होगा। चाणक्य अगर कठोर नहीं होते तो चंद्रगुप्त कभी मगध का शासक नहीं बनता। उसी तरह वैद्य अगर कठोर नहीं होगा तो रोगी कभी ठीक नहीं होगा। शायद उनकी नजर में श्रोता या पाठक को गुरु या वैद्य की भूमिका निभानी चाहिए प्रतिक्रिया देते समय

प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र  ने अपने विचार कुछ हटकर रखे। उनके अनुसार- "किसी की भी रचना छोटी या बड़ी नहीं होती। छोटी और बड़ी उसकी गुणवत्ता से होती है। गुणवत्ता की ही प्रशंसा चाहिए।"

राजप्रिय रानी  ने बताया कि आजकल फेसबुक व्हाट्सएप पर भेड़ चाल की चलन बढ़ गया है। सही बात है जिसके मन में जो आता है वह डाल देता है और यह गलत है उसमें हम लोग देखते की बहुत सी चोरी की रचना भी होती है।"

छत्तीसगढ़ से रमाकांत श्रीवास्तव  का कहना है कि - "बहुत परिश्रम से कोई भी रचना निकलती है। बस ध्यान देना होगा कि रचना अपाहिज ना हो। अपाहिज है तो उसकी प्रशंसा नहीं कर सकते हैं कितना भी कोई सुंदर बच्चा हो उसकी अगर आंखें फूटी हुई है तो मुंह से निकल ही जाता कि बहुत सुंदर बच्चा है, काश! इसकी आंखें भी अच्छी होतीं।"

माधवी भट्ट ने सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त किए। 

डॉ. संगीता तोमर ने वरिष्ठ रचनाकारों पर दोषारोपण किया। उनका कहना था कि-"वरिष्ठ रचनाकार नवोदित रचनाकारों के मनोबल को तोड़ते हैं। "

सिद्धेश्वर का कहना था कि, "किसी भी रचना का निर्णायक पाठक होता है। असली रचना वही है  जो पाठक के दिल को छू जाए। वाह वाही को मूर्त रूप देने के लिए ही पुरस्कारों का प्रचलन किया गया। पुरस्कार एक तरह से टॉनिक है जो हमें बल प्रदान करता है।

अध्यक्ष उद्बोधन के बाद, मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ शांति जैन ने कहा कि - "मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बिना पढ़े-सुने, वाह वाही करने वाले लोगों की कमी नहीं है l मंचों पर तो स्वयं रचनाकार और संचालक एक-दूसरे से गप्पे करते रहते हैं,  और रचना  सुने बिना वाह-वाह करते रहते हैं ! "

कथाकार जयंत  ने मौलिकता पर ध्यान दिलाया । उन्होंने कहा कि रचना पर व्यक्त प्रतिक्रिया ही वाहवाही है l किंतु यह वाह वाही रचनाकारों के लिए तब घातक होती है, जब वह पुरस्कार और प्रशंसा को विज्ञापित रूप से ग्रहण करता हैl अच्छी रचनाओं की प्रशंसा वाह वाही जरूर होनी चाहिए,  इससे सृजनात्मक सक्रियता बढ़ती है, लेकिन एक मर्यादित सीमा में l आलोचना भी हो तो सकारात्मक हो,  उसमें हतोतसाह के तत्व नहीं छुपे हो l "

आधारशिला (नैनीताल) के संपादक डॉ दिवाकर भट्ट ने कहा कि - "डिजिटल मीडिया के दौर में,  लेखक अपनी रचनाओं को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं ! इस आभासी दुनिया में वाह वाही बटोरने के पीछे,, अपनी सृजनात्मक जीवंतता जीवंतता को दरकिनार कर रहे हैं ! "

दो घंटे तक लाइव चली इस ऑनलाइन परिचर्चा में, देशभर के एक दर्जन से अधिक रचनाकारों ने, अपने- अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए, जिनमें प्रमुख हैं - " संगीता तोमर( इंदौर ) ,कुंदन आनंद , ऋचा वर्मा, अपूर्व  कुमार (हाजीपुर), नीतू सुदीप्ति नित्या (भोजपुर), विजयानंद विजय (मुजफ्फरपुर), दिनेश चंद्र (हावड़ा), अजय ( झारखंड), अंजली श्रीवास्तव( मुंबई), रमाकांत श्रीवास्तव(छत्तीसगढ़), राज प्रिया रानी, प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र आदि l
......

रपट की प्रस्तुति - ऋचा वर्मा
प्रस्तोता का परिचय - सचिव, 'भारतीय युवा साहित्यकार परिषद
यह रपट श्री सिद्धेश्वर के माध्यम से प्राप्त हुई.
माध्यम का ईमेल आईडी - sisheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी- editorbejodindia@gmail.com


Monday, 12 October 2020

अजगैवीनाथ साहित्य मंच, सुलतानगंज भागलपुर द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाईन गजल गोष्ठी 11.10.2020 को संपन्न

बुग्ज नफरत को मिटाओ तो कोई बात बने

FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए )



दिनांक 11.10.2020 को अजगैवीनाथ साहित्य मंच, सुलतानगंज भागलपुर के बैनर तले अंतर्राष्ट्रीय आनलाईन गजल गोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता, मंच के संस्थापक सदस्य डा. श्यामसुंदर आर्य और संचालन मंच के अध्यक्ष भावानन्द सिंह प्रशांत ने किया। कार्यक्रम का संयोजन खड़गपुर के मशहूर शायर ब्रह्मदेव बंधु ने किया । कार्यक्रम में काठमांडू, भोपाल सोनीपत, कटनी, लुधियाना, कानपुर, बाराबंकी, पटना, मुंगेर, भागलपुर, कोलकाता ,से दर्जनों कवियों ने अपनी साहित्यिक सहभागिता निभाई। सर्वप्रथम सभी आमंत्रित कवियों को मंच की ओर से सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया।

सबसे पहले गजल की शुरुआत सागर, मध्य प्रदेश से गजलकार अशोक मिजाज बद्र ने देश के धरतीपुत्र किसानों की बेबसी पर प्रकाश डालते हुए कहा -
बला की धूप में क्या -क्या किसान देखते हैं ,
कभी जमीं कभी आसमान देखते हैं ,
जवानों तुमको हमारी उम्र लग जाए,
तुम्हारे दम से ही हिन्दुस्तान जिन्दा है ।

ततपश्चात बाराबंकी यूपी से मशहूर शायर आचार्य मो. मूसा खान अशांत ने मानवीय संवेदनाओं को मुहब्बत की लफ्जों में यूँ पिरोया -
प्यार की श्मआ जलाओ तो कोई बात बने ,
बुग्ज नफरत को मिटाओ तो कोई बात बने।

पटना से गजलकारा अराधना प्रसाद ने अपनी गजल में कहा- 
काम क्या बुत तराश करते हैं
देवता हम तलाश करते हैं 
खेल शतरंज का ही तय है जनाब ,
आप क्यों  ताश- ताश  करते हैं ।

सोनीपत से राधिका राधा ने प्रेम की प्रज्ञा को कुछ यूँ रखा -
 खुदा मेरे ये पागल दिल ,धड़कने को बना है क्यूँ ,
धड़कने को बना है तो ,तड़पने को बना है क्यूँ ।

कटनी मध्यप्रदेश से राजेश प्रखर ने जिन्दगी को अपनी गजलों से परिभाषित किया -
कौन कहता है फरेबी बे-मजा है जिन्दगी 
पूछिये हमसे हमारी दिलरुबा है जिन्दगी ।

वहीं लुधियाना से शायर अशोक कीर्ति ने कहा - 
अपने अन्दर समंदर सा गहरा सन्नाटा लिए हुए,
एहसास की खामोशी को आवाज लगाने लगते हैं ।

नेपाल काठमांडू से अंजू डोकानिया ने गजल को कुछ यूँ उछाला - 
कुछ इस तरह से हसरत निकाल दी ,
तेरे नाम की गजल हवा में उछाल दी ।

मुंगेर से राष्ट्रीय स्तर के गजलकार अनिरुद्ध सिन्हा ने जिन्दगी के फलसफों को अपनी गजल मे पिरोकर कहा - जिन्दगी के मंच पर मेयार देखा जाएगा 
लोग परखे जाएंगे किरदार देखा जाएगा ,
मुल्क की सरहद में जब घुस जाएगा दुश्मन
 तो फिर ,कौन है इस मुल्क का गद्दार देखा जाएगा ।

भोपाल से ख्यातिप्राप्त शायर हरि बल्लभ शर्मा हरि ने कहा -
 उम्र भर जियारती रहा देखने को नूर आपका ,
कौन से फलक पे हो बसे क्यों मकाम दूर आपका ।

मुजफ्फरपुर से डा. आरती कुमारी ने अपनी खतों में मुहब्बत का कुछ इस तरह इजहार किया - 
तुम्हें दुनिया की नजर से बचाकर साथ रखना है ,
मेरी चाहत का खत हो तुम छुपाकर साथ रखना है ।

कानपुर से नीरू श्रीवास्तव निराली ने प्रेम का पैगाम कुछ यूँ भिजवाया - 
तुम मेरी पलकों की तन्हाई पर चेहरा रख दो ,
या मेरी आँखों में इक नींद का फाहा रख दो ,
मुझको मालूम है मजबूरी है खत का लिखना , 
तुम मेरे हाथों में खाली ही लिफाफा रख दो ।

पटना से नामचीन गजलकार घनश्याम ने कहा - 
अपाहिज आस्थाएँ दौड़ती तकदीर के पीछे ,
मगर तकदीर चलती है सदा तदबीर के पीछे ।
 पराजित सदा होते रहे विक्षिप्त उन्माद ,
विजय चलती सुमन-माला लिए रणधीर के पीछे ।

अध्यक्षता कर रहे मंच के संस्थापक सदस्य डा. श्यामसुंदर आर्य ने कहा -
किस्ती को छोड़ दी है भंवर में ,
अब तो वो डगमगाने लगी है ।  

मनीष कुमार गुंजने कहा - 
यादें तेरे प्यार की डसती है बहुत , 
मिलने को आँखें तरसती है बहुत ।।

 कार्यक्रम की समाप्ति पर मुहब्बत के प्रतिनिधि गजलकार कुणाल कनौजिया ने अपनी गजल से हुश्न और इश्क के अप्रतिम मिलन को रेखांकित किया -  
दर्दे दिल बख्शा है जो वही चारागर   हो ,
हमें इश्क है उनसे कुछ तो समरवर हो ।

वहीं मुंगेर के युवा गजलकार विकास ने प्यार में खाए धोके पर कहा - 
ये जो उलझी हुई कहानी है 
,प्यार की आखिरी निशानी है 
उसकी महफिल में कौन जाएगा,   
उम्रभर किसको चोट खानी है ।

कोलकाता से गजलगो कृष्ण कुमार दूबे ने कहा -
 इस जमाने में कोई ऐसा हमारा होता ,
जिन्दगी भर के लिए अपना सहारा होता ,
उसकी उल्फत में सराबोर रहा हम करते ,
जान भी उस पे लुटा देना गंवारा होता ।

 लखीसराय सूर्यगड़ा से गजल कार राजेंद्र राज ने अपनी गजल में कहा -
 ये नदी सैलाब में आकाश से पानी माँगे ,
अपने होठों को जलाया हुआ आया है कोई ।

वहीं बरियारपुर से दिलीप कुमार सिंह दीपक ने कहा -
फूलों का मुरझाना कहाँ अच्छा लगता है ,
हयात नूर का जाना किसको अच्छा लगता है।

कार्यक्रम का संयोजन कर रहे मशहूर शायर ब्रह्मदेव बंधु ने जिन्दगी की आहट को इक आशा भरी   साँस देने की बात करते हैं -
जो बुझा दे दीप वो ना आँधियाँ रख छोड़िये ,
हवा के वास्ते कुछ खिड़कियां रख छोड़िये ।

मंच के अध्यक्ष व कार्यक्रम का  संचालन कर रहे कवि भावानन्द सिंह प्रशांत ने कहा
इक बार मिलो गैरों की तरह ,
हम नजर आएंगे अपनों की तरह। 
फूल की बानगी खुद में ढ़ूढा करो ,
पेश आएंगे हम भौरों की तरह।
इक बार मिलो गैरों की तरह 
हम नजर आएंगे अपनों की तरह।
 फूल की बानगी खुद में ढ़ूढा करो ,
पेश आएंगे हम भौरों की तरह।

अध्यक्षता कर रहे मंच के संस्थापक सदस्य डा. श्यामसुंदर आर्य ने कहा -
किस्ती को छोड़ दी है भंवर में ,
अब तो वो डगमगाने लगी है ।  

मनीष कुमार गुंजने कहा - 
यादें तेरे प्यार की डसती है बहुत ,
 मिलने को आँखें तरसती है बहुत ।। 

कार्यक्रम की समाप्ति पर मुहब्बत के प्रतिनिधि गजलकार कुणाल कनौजिया ने अपनी गजल से हुश्न और इश्क के अप्रतिम मिलन को रेखांकित किया - 
 दर्दे दिल बख्शा है जो वही चारागर   हो ,
इश्क है उनसे कुछ तो समरवर हो ।
....
रपट का आलेख -  भावानंद सिंह प्रशांत 
रपट के लेखक का ईमेल आईडी -
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Saturday, 10 October 2020

बज़्मे-हफ़ीज़ बनारसी पटना के द्वारा "नज़र और कुछ दे रही है गवाही" पर 2.10.2020 को ऑनलाइन तरही मुशायरा सम्पन्न

न गुलशन में बाकी है ताज़ा हवा ही

FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए 



बज़्मे-हफ़ीज़ बनारसी पटना के तत्वावधान में आयोजित तरही मुशायरा में पटना के अलावा बिहार से  भागलपुर, जमुई, रोहतास, झारखण्ड से रांची - हज़ारीबाग और विभिन्न महानगरों यथा मुम्बई, कोलकाता ,दिल्ली, तथा लुधियाना, भटिंडा (पंजाब), राउरकेला (ओड़ीसा), भिलाई (छतीसगढ़) के 25 से ज़ियादा महिला(9) और पुरुष ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लें पेश कीं| ऑनलाइन मुशायरा आकर्षक और शानदार रहा | मुशायरे की एक झलक के तौर पर पेश है नुमाइंदा शाइरों के नुमाइंदा अशआर :

मुशायरा का आगाज़ शाम 7 बजे आराधना प्रसाद ने सरस्वती वंदना से किया | उन्होंने अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए युद्ध जैसे हालत में चीन और पाकिस्तान की सरह्दों पर लड़ते हुए जवानों की हौसला अफ़जाई की बात कही :
दुआ उसके हक़ में तो बनती है लोगों
जो सरहद पे लड़ता है अदना सिपाही
 
अनिल कुमार सिंह, डीआईजी (सेवा निवृत) ने कहा :
 न तर्क ए सुखन हो कभी भी हमारा
भले बंद कर दो मियाँ आवाजाही

कोलकाता से जुड़े शाइर असग़र शमीम ने फरमाया :
 ये चेहरे बयां और कुछ कर रहे हैं
'नज़र और कुछ दे रही है गवाही'
 
एकराम हुसैन शाद ,भागलपुर ने
 बिहार की शराबबंदी की कामयाबी के पीछे के राज़ का बयान करते हुए एक रोमांटिक शे’र पढ़ा :
 निग़ाहों से पीने का अपना मज़ा है
नहीं चाहिए जाम-ओ-मीना सुराही
 लेकिन वे चोर-गुंडों की उत्पात पर भी चुप नहीं बैठे :
 अजब हौसला भी हुकूमत ने बख़्शी
डरे चोर गुंडों से ख़ुद अब सिपाही
 
इक़बाल दानिश, तेलारी, रोहतास को फ़िक्र है कि वे कैसे ख़ुद को बेगुनाह साबित करें :
मेरी बात मुंसिफ भी सुनता नहीं अब
भला कैसे साबित करूँ बेगुनाही
 
भटिंडा ,पंजाब से करन कटारिया  प्रशासन पर तंज कसते हुए कहते हैं :
न  पोछे गए, मुफ़लिसों  के जो आँसू,        
तो  किस  काम  आई  तेरी बादशाही।
 
दिल्ली से फौज़ के एक जवान कलियुगी घनश्याम जवानों के हौसलों की बात करते हैं:
वतन  के  हसीं  राह   के  हम   सिपाही।
ये   वर्दी   हमारी    वफ़ा   की    गवाही।
 चले  हम   जिधर  से  उधर  साफ  मैदाँ,
जिधर   देखिए   दुश्मनों   की    तबाही।
 
पत्रकारिता से जुड़े पटना के कुमार पंकजेश ने यह शे’र पढ़ा :
 ख़मोशी उजालों की कहने लगी है
बग़ावत पे उतरी है अब ये सियाही
 
डॉ कृष्ण कुमार प्रजापति, राउरकेला (ओड़ीसा) में होटल व्यवसाय में क़िस्मत आजमा रहे हस्सास शाइर आज के समाज की सच्चाई उजागर करते हुए अपनी व्यथा अभिव्यक्त करते हैं :
ग़लत लोगों का साफ़ रहता है दामन
शरीफ़ों पे ही फेंकते हैं सियाही
 बहुत रो रहे हैं जो करते हैं मेहनत
बहुत ख़ुश हैं जो कर रहे हैं उगाही
 
रांची के तेजस्वी पत्रकार देवेन्द्र गौतम  निराश दिखाई देते हैं :
न फूलों की ख़ुशबू बची है सलामत
न गुलशन में बाकी है ताज़ा हवा ही.
 
नसर आलम नसर ,पटना को मुहब्बत में सिर्फ तबाही का ही एहसास होता है :
 मोहब्बत  से  दिल  कांपता  है हमारा
सुना  है  मोहब्बत  में  है  बस तबाही

डॉ नूतन सिंह, जमुई को लोकतंत्र में आम अवाम के लिए कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता :
सिवा तर्ज़ के और कुछ भी न बदला,
अभी भी है क़ायम यहाँ बादशाही।
 
मुंबई में सेवारत भोजपुर के शाइर प्रेम रंजन अनिमेष रोमांस से लबरेज़ दीखते हैं :          
    यूँ  ही  रख  दिये  होंठ होंठों पर उसके
              न  मैंने  कहा  कुछ   न उसने  सुना ही
 
पूनम सिन्हा श्रेयसी, पटना  प्रेम में बर्बादी की कहानी बयान करती है :
 मुहब्बत मिरी दे रही है गवाही।
हुई है अभी तक गज़ब की तबाही।।
 
डॉ फ़रहत हुसैन ‘ख़ुशदिल’, हजारीबाग, झारखंड कहते है :
 'नज़र और कुछ दे रही है गवाही'
मेरे दिल के अंदर से आवाज़ आई

फ़रीदा अंजुम ,पटना सिटी ने बहुत सुन्दर गिरह लगाईं है:
 ज़बां तर्जुमानी करे कुछ भी लेकिन
'नज़र और कुछ दे रही है गवाही'
 
ग़ाज़ियाबाद के 80 वर्षीय नौजवान शाइर डॉ ब्रम्ह्जीत गौतम कोरोना के प्रति काफ़ी चिंतित हैं:
नहीं  जा  रही  ये  वबा  या  इलाही
मचायी है  हर  ओर  जिसने  तबाही
 उन्हें समाज में झूठ के परस्तारों  की निर्लज्जता पर ऐतराज़ और अफ़सोस है:
 अदालत में सच 'जीत'  पायेगा कैसे
सभी झूठ की  दे  रहे  हैं  गवाही
 
बज़्मे-हफ़ीज़ बनारसी के चेयरपर्सन और पटना में कई साल तक एडीएम लॉ एंड आर्डर रहे रमेश कँवल ड्रग में फंसे लोगों, किसानों की आड़ में राजनीति करनेवालों और बड़े लोगों के बड़प्पन की बहुत सुन्दर चर्चा करते है :
 गुनाहों की मस्ती में हलचल मची है
ये ड्रग क्या पता लाए कितनी  तबाही
 बड़े लोग झुकते हैं मिलने की ख़ातिर
भरे है गिलासों को जैसे  सुराही
 ‘कँवल’ इन दिनों फ़िक्रे दहकाँ में गुम हैं 
दलालों में  है खौफे-ज़िल्ले इलाही
 
राजकांता राज,  पटना  ने मुहब्बत में नज़र का कमाल बताया :
मुहब्बत में जब दी नज़र ने गवाही
वफ़ा की डगर पर चला दिल का राही
 
राजेश कुमारी राज, मुंबई ने गवाहों की बेबसी का ज़िक्र करते हुए कहा :
 तुम्हारी अदालत, तुम्हारा है मुंसिफ़,
कहाँ अब चलेगी ये हर्फ़-ए-गवाही।

शुचि 'भवि'   भिलाई, छत्तीसगढ़ से मास्क की अहमियत बताती हैं :
 करोना बड़ा आज क़ातिल बना है   
बिना मास्क मत चल कड़ी है मनाही

सागर सियालकोटी, साहिर लुधियानवी के शहर लुधियाना पंजाब से अदालत की असलियत और शरीफों की मज़बूरी का बयाँ कुछ इस तरह करते हैं :
अदालत सबूतों पे मबनी है 'सागर'  (मबनी -आश्रित)
वो साबित नहीं कर सका बेगुनाही
 
प्रो. (डॉ) सुधा सिन्हा' सावी',पटना  अपना सपर्पण बयाँ करती हैं
 सजन मैं हमेशा रहूंगी तुम्हारी
जमाना करे चाहे कितनी मनाही
 
फतुहा के उच्च विद्यालय में अध्यापनरत कुमारी स्मृति कुमकुम सुशांत कुमार राजपूत को यादों के आकाश में निहारती हैं :
 फरेबी जहाँ ,मतलबी यार सारे,
कि फंदे से लटकी गले की सुराही।

पटना सिटी के घनश्याम जी   दीर्घ काल तक अदालतों में इन्साफ के लिए चक्कर लग़ाते रहने से जनमानस में शासन-प्रशासन का धूमिल और भयावह चेहरा दिखाते हैं :
 अदालत  में  इंसाफ   होने  से   पहले
निपट लेते  हैं खुद दरोग़ा  -   सिपाही
वे कोरोना से बचाव के लिए बिना मास्क घर से बाहर निकलने की मनाही को बुलंदी से आवाज़ देते हैं :
बिना मास्क पहने हुए मत निकलना
सभी शख्स पर  है  ये  लागू  मनाही
वे भोजपुरी भाषा से अपना प्यार छुपा नहीं पाते हैं 
यहां   भोजपुर  की   जुबां   गूंजती है
हो आरा या बक्सर या बिहिया-बनाही

डॉ मेहता नगेन्द्र, विख्यात पर्यावरणविद अपने प्रकृति प्रेम के लिए देश में मशहूर है | उनके  एक एक शे’र ने यथोचित प्रशंसा के फूल समेटे :
  नहीं कर सकेगा प्रदूषण तबाही
    शज़र हैं  हमारे हितैषी सिपाही
  शज़र की बदौलत नगर है सुरक्षित
        शज़र हैं तो  है  मौज में बादशाही 
  प्रदूषित  हवा का असर भी बुरा है

       भरी ज़हर से है  सेहत की सुराही
    खड़ा हर तरफ़ ज़हर का है हिमालय
    उसे  ढाहने  में ही है वाहवाही  

प्रणय कुमार सिन्हा ने सुन्दर गिरह लगाते हुए कहा :
नज़र और कुछ दे रही है गवाही
मगर दिल के अंदर मची है तबाही

शरद रंजन शरद ने कहा : 
उजाले  हुए  क़ैद   उनके  घरों  में 
हमारे  क़फ़स में  हमेशा  सियाही

चैतन्य चन्दन ने  दिल्ली से कहा -
सियासी सड़ांधों से घुटने लगा दम
भला कौन इसकी करेगा उड़ाही
यहां मुंसिफों की नज़र है सियासी
करूं कैसे साबित मैं अब बेगुनाही
गई नौकरी तो भी ग़म क्या है "चंदन"
उठा लूंगा करछी, भगोना, कड़ाही

शुभ चन्द्र सिन्हा ने 
नशे में  भुलायी न  जाये  कभी  भी 
ख़याले - बदन , रात  की   बादशाही
शे’र सुना कर खूब वाह वाही लुटी.

बज़्मे-हफ़ीज़ बनारसी, पटना का ऑनलाइन तरही मुशायरा में 8-10 राज्यों के महिला और पुरुष ग़ज़लकारों ने शिरकत की | मुशायरा शानदार रहा | 

‘नज़र और कुछ दे रही है गवाही’ शीर्षक से एक ग़ज़ल का संकलन प्रकाशित करने पर सहमती बनी | रमेश कँवल चेयर पर्सन ने ऑनलाइन तरही मुशायरा में शिरकत करने वाले सभी ग़ज़लकारों का शुक्रिया अदा किया | और मुशायरा संपन्न हुआ |
.....

प्रस्तुति : रमेश ‘कँवल’
परिचय : चेयर पर्सन, बज़्मे-हफ़ीज़ बनारसी,पटना 
प्रस्तोता का ईमेल आईडी - rameshkanwal78@gmail.com
प्रतैक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com       























        

Friday, 9 October 2020

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच द्वारा ऑनलाइन कवि सम्मेलन 4.10.2020 को सम्पन्न

 आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिन्दुस्तान

FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए 



अग्निशिखा मंच के कवि सम्मेलन में 111 कवियों ने किया काव्य पाठ
मुंबई: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के उपलक्ष में अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच द्वारा ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया । इस कवि सम्मेलन में 111 कवि-कवयित्रियों ने भाग लिया। समारोह की अध्यक्षता डॉ अंजना बाजपेई ने की। मुख्य अतिथि के रूप में  पुरुषोत्तम दुबे उपस्थित रहे। विशेष अतिथि के रुप में संपादक अखंड प्रताप सिंह गहमरी, नाटककार विजय पंडित, डॉ कुंवर वीर सिंह,  आशा जाखड़ तथा शायर इरफान नोमानी ऑनलाइन उपस्थित रहे। निर्णायक के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार  हेमलता मानवीय तथा डॉ अरविंद कुमार श्रीवास्तव उपस्थित रहे। संजय कुमार मालवीय ने आभार व्यक्त किया।
मंच संचालन /दो सत्रों में हुआ ।

 पहले चरण में संचालन किया डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई/ चंदेल साहेब हिमाचल प्र./ डॉ प्रतिभा कुमारी परासर  एवं ‘दूसरे सत्र का संचालन बिजैन्द्र मेव, राजस्थान, शोभा रानी तिवारी,इॉदौर और सुरेन्द्र हरडे,नागपुर ने किया।

सरस्वती वंदना करने के बाद शोभारानी तिवारी ने स्वागत भाषण डॉ अलका पाण्डेय सभ अतियों ने माँ शारदे को नमन कर कार्यक्रम शुरु किया । 

मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम दुबे ने अपने व्यक्तव्य में मंच व कवियों को बधाई दी , विजय पंडित ने "ऐसे कार्यक्रम होते चाहिए" कहा। आशा ने कहा मंच के निमंत्रण से प्यार की महक आती है जो हम सब खींचें चले आते है कुंवर वीर सिंह ने कहाँ मैं आज की रचनाओं की ई बुक बना कर दूँगा ! डॉ अंजनी बाचपेई ने सब को शुभकामनाएँ दी अंखड प्रताप सिंह गहमरी ने १९ / २० दिसम्बर को गहमर में होने वाले साहित्य सम्मेलन में आने का निमंत्रण दिया । 

अग्निशिखा मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अलका पांडे ने उपरोक्त जानकारी दी।

काव्य पाठ की कुछ कवियों की झलक नीचे प्रस्तुत है -

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई -
आओ आज याद करे
बापू के बलिदानों को
सत्य अंहिसा की लाठी से
खादी वाली धोती से
अंग्रेज़ों को ललकारा था
देश प्रेम जगाया था
देश का बच्चा बच्चा जाग उठा था

चंदेल साहिब -
सौ झूठ पर एक सच की मिसाद।
"मैं गाँधी हूँ"
हिंसा पर अहिंसा की विजय।
"मैं गाँधी हूँ"
देश-प्रेम का जीता जागता उदाहरण।
"मैं गाँधी हूँ"

कवि आनंद जैन अकेला कटनी मध्यप्रदेश-
देश हमारा सबसे प्यारा, अखंड राष्ट्र का सपना है।
होने न देंगे टुकड़े इसके, ऐसा संकल्प ये अपना है।।
प्राची से होता उदित सूर्य, धरती को सुनहरा कर देता।
मुक्ता, माणिक, हीरे, पन्ना  से, *अकेला* इसको भर देता ।।

चन्दा डांगी आदित्य सीमेंट चित्तौड़गढ़ राजस्थान -
अखण्ड भारत
काश भारत अखण्ड रहता
न खेली जाती खून की होली
तब शायद राष्ट्र पिता का मन
सुखी और सन्तुष्ट होता

सुनीता चौहान हिमाचल प्रदेश -
अपनी हर बात को सुनाने का,
वे हट कर ही मार्ग अपनाते थे।
दंगे फसाद से कोसों दूर रहकर भी,
शांति पूर्वक अपनी बात मनवाते थे।।

शेखर रामकृष्ण तिवारी -
उठे जज़्बात की आंधी तो दुनियां चौंक जाएगी,
लहू के रंग से लिखेंगे, जो दृष्टि उठ के आएगी।

ज्ञानेश कुमार मिश्र, आबूधाबी/ मुंबई -
धर्म, कर्म सब है समष्टिगत, छोड़ो या तुम धारो,
करने को है प्यार जगत से, जग से घृणा बिसारो,
सब मेरा है, मैं सबका हूँ, व्यष्टि रही सामान्य,
खास नहीं कुछ, सबको समरस, जड़ से चेतन यारो।

प्रो.शरद नारायण खरे, मंडला, मप्र -
मुझे गांधी ने सिखलाया,जिऊँ मैं कैसे यह जीवन
बनाऊँ कैसे मैं इस देह और मन को प्रखर,पावन
मुझे नैतिकता-पथ दिखलाके, रोशन आत्मा कर दी
पूज्य बापू के कारण ही, महकता है मिरा मधुवन।
             
शोभारानी  तिवारी -
खादी पहनकर दी आजादी
स्वदेशी मंत्र लाया
पहले बापू,फिर महात्मा
राष्ट्रपिता कहलाया।

 सुरेन्द्र हरडे कवि,  नागपुर (महाराष्ट्र) -
सादा जीवन उच्च विचार
  सात्विक तन-मन, शुध्दाचार
 सत्य अहिंसा और प्रेम का
  दिया तुमने पैगाम!
      
पदमा तिवारी दमोह मध्य प्रदेश -
2 अक्टूबर का दिन इतना गौरवबान है 
भूलेंगे ना भूलने देंगे यह कितना महान है।

ओजेंद्र तिवारी दमोह मध्य प्रदेश -
लघु लेख महात्मा गांधी पर

जनार्दन शर्मा -
अखण्ड भारत
काश भारत अखण्ड रहता
न खेली जाती खून की होली
तब शायद राष्ट्र पिता का मन सुखी और सन्तुष्ट होता

चन्दा डांगी आदित्य सीमेंट चित्तौड़गढ़ राजस्थान -
आज हैं दो अक्टूबर का दिन हैं, आज का दिन है बडा महान,
आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिन्दुस्तान
एक नारा सत्य अहिंसा, एक का नारा जय जवान,जय किसान,.

अनिता शरद झा,  रायपुर छत्तीसगढ़ -
आज से बेहतर कल बनाओ
सत्कर्म सिद्धान्तों मुक्त विचार रख
कलियों फूलो की सुगंध फल से
प्रकृति जीवन को मधुर बनाओ
कमियों को नज़र अन्दाज़ कर
पारदर्शी जीवन दर्पण दिखा
सज्ञान लेकर देकर जीवन सवारों

पद्माक्षी शुक्ल
लाल बहादूर शास्त्री जी, शत शत नमन, 
,
शुभा शुक्ला निशा रायपुर छत्तीसगढ -
साल के होते बारह महीने
सावन के लोग दिलाने होते
सावन में होता प्रकृति का
निश्छल अद्भुत हरित श्रंगार
हरियाली की चादर ओढ़े
प्रकृति लुटाती अप्रतिम प्यार

विजेन्द्र मेव "भाईजी" राजस्थान -
हर एक लफ्ज़ की गर्माई में शीतलता का आभास करें,
जंग कोई भी लड़े जीवन में तलवार से मजबूत है 
कलम इसकी ताकत का विश्वास करें।

प्रेरणा सेन्द्रे - 
एक धर्म ,एक कर्म
सादा जीवन ,उच्च विचार
ऐसे थे  हमारे बापू महान

स्मिता धिरासरिया, बरपेटा रोड -
अग्नि सिखा मंच पर आज चली काव्य की  आंधी
सभी ने याद किया शास्त्री महान गाँधी।
देश भक्ति की लहर भरपूर रही
कवियों की सराहना बेमिसाल रही।
        
मधु वैष्णव "मान्या" -
निर्मल निश्छल प्रेम का,
हो अतुलनीय भाव तुम।

इन्द्राणी साहू"साँची -
दो अक्टूबर का दिन पावन ।
फूल खिला था अति मनभावन ।।
गाँधी मन मोहन बन आए ।
भारत भू का मान बढ़ाए ।।

डा.महताब अहमद आज़ाद -
मुश्किल सहन की  सफर रखा जारी!
बापू जी थे अहिंसा के पुजारी!!

संजय कुमार मालवी (आदर्श) इंदौर -बापू फिर एक बार आ जाओ
क्या बापू ये क्या कर दिया,
सत्य अहिंसा का संदेश दे दिया,
कैसे लोगो के हाथ देश को सौप दिया,
सत्य अहिंसा के संदेश को तार तार कर दिया,
बापू फिर एक बार आ जाओ
देश दुनिया को सत्य अहिंसा का संदेश दे जाओ
बापू फिर एक बार आ जाओ ।

डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया" ,इंदौर मध्यप्रदेश -
भारत छोडो़ आंदोलन में
सक्रिय भागीदारी निभाई।
गांधी जी समाज सुधारक
आजा़दी के सशक्त पुरोधक
शास्त्री का सादा जीवन उच्च विचार
नारा दिया जय जवान जय किसान।
....

रपट की लेखिका - डॉ अलका पाण्डेय 
पता - मुम्बई
परिचय - अध्यक्ष, अ. भा. अग्निशिखा मंच
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com




Monday, 5 October 2020

आईटीएम काव्योत्सव नवी मुम्बई की 115 वीं गोष्ठी 4.10.2020 को सम्पन्न

 कैसी आज़ादी पाई  है, नैतिकता काफूर हुई 

FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए 




जैसा कि आप सभी जानते हैं विजय भटनागर के संयोजन से अनिल पुरबा, विश्वम्भर दयाल तिवारी, चन्दन अधिकारी,  सेवा सदन प्रसाद, वंदना श्रीवास्तव आदि मुख्य स्तंभों की सहायता से चल रही नवी मुंबई की साहित्यिक संस्था आईटीएम काव्योत्सव अपने ही कीर्तिमानों को ध्वस्त करती हुई आगे बढनेवाली संस्था है जो पिछले नौ वर्षों तक लगतातर मासिक कवि गोष्ठी आयोजित करने के बाद अपने दसवें वर्ष में भी उसी ऊर्जा और तेजस्विता के साथ चल रही है. जाहिर है कि अप्रील  2020 से यह अपने व्हाट्सएप्प  ग्रुप पर ही चल रही है पर उसी आश्चर्यजनक समयबद्धता और अनुशासन के साथ. 

इस बार भी आईटीएम काव्योत्सव की गोष्ठी व्हाट्सएप्प के आभासी पटल पर ही सम्पन्न हुई. इस बार की गोष्ठी की अध्यक्षा थींं मधु श्रृंगी और संचालन किया विश्वम्भर दयाल तिवारी ने. एक पूर्व-निर्धारित सूची सबके सामने रख दी गई और उसमें दिए गए क्रम के अनुसार ही कविगण स्वत: पटल पर अपनी रचनाएँ रखते गए. ऐसा करने से व्यवस्था बनी रही और समय से कार्यक्रम सम्पन्न हो गय.  सरस्वती वंदना अपने मधुर कंठ से प्रस्तुत की वंदना श्रीवास्तव ने और राष्ट्रगाण किया भारत भूषण शारदा ने.

आइये इस अवसर पर डाली गई कविताओं की झलक देखें- 

कविता  प्रस्तुत करने का पूर्व  निर्धारित क्रम यह था - 
1) श्री किशन तिवारी भोपाल*
2) श्री विजय कुमार भटनागर 
3) श्रीमती मधु श्रृंगी
4) श्रीमती कुमकुम वेदसेन 
5) श्री विजय कान्त द्विवेदी  
6) श्री चन्दन सिंह अधिकारी
7) श्री सेवा सदन प्रसाद 
8) श्री अशोक प्रीतमानी 
9) श्री भारत भूषण शारदा 
10) डाॅ सतीश शुक्ल
11) श्रीमती चन्द्रिका व्यास 
12) श्री राम प्रकाश विश्वकर्मा
13) जनाब दिलशाद सिद्दीकी 
14) श्री प्रकाश चन्द्र झा 
15) श्री रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
16) श्री राम स्वरूप साहू
17) श्री पुरुषोत्तम चौधरी  
18) श्री अनिल पुरबा 
19) श्रीमती शोभना ठक्कर
20) श्री दिलीप ठक्कर*
21) श्रीमती वन्दना श्रीवास्तव*
22) जनाब हनीफ मोहम्मद 
23) श्रीमती विजया वर्मा 
24) श्री सत्य प्रकाश श्रीवास्तव 
25) डाॅ हरिदत्त गौतम 'अमर'
26) डाॅ श्रीमती अलका पाण्डेय 
27) श्रीमती नेहा वैद्य 
28) श्री हेमंत दास 'हिम'
29) श्री विश्वम्भर दयाल तिवारी

किशन तिवारी भोपाल 
हमारी ज़िंदगी की दास्ताँ उलझी हुई सी है 
कहीं टूटी हुई सी है कहीं बिखरी हुई सी है 
ये सच है बात हमको बात करना ही नहीं आता 
तेरी हर बात मख़मल सी मगर चुभती हुई सी है 
नदी के साथ चलकर मैं तुम्हारे द्वार तक आया 
आना तेरी समन्दर  की  तरह  मचली हुई सी है 
हमें बर्दाश्त करने का तजुर्बा है बहुत लेकिन 
मैं टूटा हूँ बहुत और तू अभी रूठी हुई सी है 
चला मैं धूपभर अब शाम की परछाइयाँ लम्बी 
अंधेरा  बढ़ रहा  है ये शम्अ  बुझती  हुई  सी है 

विजय भटनागर -
जमाने में कितने भी मशहूर हो जाये
फरिश्ते न सही इन्सान जरूर हो जाये।
आमद रफ्त उतनी ही बढाईये आप
दोस्त करीब आकर  न दूर हो जाये।
बस खुदही ना गिर जाये अपनी नजर से
आदमी इस कदर ना मजबूर हो जाये।
कोई किसी मिलेऔर मुंह फेरले
ऐसे ना जहां में  दस्तूर हो जाये।
खुदी भी जरूरी है जिंदगी के लिए 
नहो इतने खुद्दार कि मगरूर हो जाये।
विजय मांग रहा है दुआ खुदा से 
उसके सब काम जहां में सुर्ख रूह हो जाय ।

सत्यप्रकाश श्रीवास्तव -
गाँधी तेरे जन्म दिवस की, 
शत-शत तुम्हें बधाई।
150 वां जन्म दिवस है,
 जन जन कहे बधाई।1।
2 अक्टूबर को जन्मे,
2-2 अलंकार हैं पाये तुमने,
एक महात्मा की पदवी है।
जिसका कोई न सानी,
तेरा नाम हर दिल पे लिखा है,
है बाकी सब बेमानी।2।
राष्ट्रपिता भी तुम कहलाये,
इसका गौरव है हमको।
कर स्वीकार पुष्पाजंली हमारी,
करो क्रतार्थ हम सबको।3।
2.10, 150 वां जन्मदिन था,
है यह अद्भुत पर्व हमारा।
हर भारतीय का हो सर ऊँचा,
कोई आंख उठा न पाये।4।
हमें शक्ति दो सत्य, अहिंसा, न्याय, धर्म हों,
अस्त्र शस्त्र सब हमारे।
 लोहा भारत का माने दुनियां,
हो सोने की चिड़िया फिर भारत।5।

कुमकुम वेद सेन -
‌* गलतफहमी*
अनबन का जन्मदाता
गलतफहमी कहलाता
चाहे हो परिस्थिति
या अपने पराए की जुबानी
दिल दिमाग के असंतुलन से
पैदा करती है गलतफहमी
रिश्तो में पैदा करती है दीवार
अपने को अपनों से दूर करती है गलतफहमी
**कभी न दो इसे हवा
इसका काम है तोड़ना
तोड़कर बिखरा देना
कोशिश करो हमेशा
सुलझी बातों का दवा
लगा दूर करै गलतफहमी
यह तो एक संक्रमण है
व्यक्ति से व्यक्ति में फैले
करो नजर अंदाज अफवाहों 
विवेक और सहारा लो 
क्षमा याचना और विस्मृत का
जीवन में लौटेगीं खुशियों
मिटेगी हर दीवार
जब होगी दूर गलतफहमी
के पनपते फैलते मिथ्याएं


विजयकान्त द्विवेदी -
*महात्मा गांधी*
सहज समीर रोज बहती है
बहती नहीं हर रोज आंधी ।
हुए भारत मां के धन्य लाल
उनमें एक श्रेष्ट हुए  गांधी ।।१!!
गौरव करे मनुजता जिस पर
था मानव मे देवत्व सृजन ।
सद्गुण के भाव सभी मिलकर
धरे हुये थे जो मानव तन ।।२!!
सत्य अहिंसा करुणा जिसमे
थे भरे हुए अतिशय अनमोल ‌।
व्रत अस्तेय अभय अपरिग्रहादि
जनहित कार्य थे जीवन मोल।।३!।
युगपुरुष अवतरित हुए जब जब
करने जगत मे अद्भुत काम ।
निश्चित उनमे  महत श्रेष्ट थे
मोहनदास था जिनका नाम।।४!!
मनुजता के चरम विकास थे
अति उन्नत गिरिवर सा महान ।
स्वार्थ  द्वेष द्वन्द भाव किंचित
पा सके नही मन में स्थान ।।५!।
किंकर्तव्यविमूढ़ बना था जब
गुलामी से शदियों भारत ।
बर्र्बर्ता वर्षो बाद ब्रितानी
सबल हुकूमत से हुए आरत ।।६!

सेवा सदन प्रसाद -
*आक्रोश*
न मैं अखबार पढती 
न ही टी,वी देखती ,
भीङ से अलग 
सियासत से दूर
चुपचाप मै रहती। 
लोग सोचते हैं 
 मैं डर गई
 हादसे से घबर गई, 
 पीङा, कसक
 और वेदना 
  पूरे तन में पसर गई।
    पता नहीं क्यों 
    अहंकारी पुरूष
    अब भी हमें अबला ही कहता, 
     राम के भेष में 
     रावण बन
       अपहरण है करता  ।
      अस्मते लुटा कर 
       अखबार की सुर्खियां
         नहीं बनना चाहती, 
        मिडिया की चिल - पौं
          से है नफरत
          इश्तहार नहीं बनना चाहती। 
         अब वक्त आ गया 
          खड्ग लेकर 
          रणचंडी बनने का, 
           न सांत्वना की जरूरत 
           न ही दिलासा की
            अब और नहीं डरने का। 

वंदना श्रीवास्तव -
*बहुत अंधेरा है*
नये चिराग जलाओ, बहुत अंधेरा है।
चमन को फिर से सजाओ बहुत अंधेरा है।।
**झूठ बेशर्म हुआ, बिक रही शराफत है,
भूख और गरीबी पे, हो रही सियासत है।
मशाल सच की जलाओ, बहुत अंधेरा है।
चमन को फिर से सजाओ, बहुत अंधेरा है।
**नफरतें हुईं हैं बहुत, रंजिशें हुईं हैं बहुत,
राम और रहीम कह के, साजिशें हुईं हैं बहुत।
अब तो कुछ होश में आओ, बहुत अंधेरा है।
चमन को फिर से सजाओ, बहुत अंधेरा है।
**मैं भी तेरे सपनों को सच कर दिखाऊंगी,
अज़ीज़ रिश्तों से घर तेरा सजाऊंगी।
मुझे न ऐसे मिटाओ, बहुत अंधेरा है।
चमन को फिर से सजाओ, बहुत अंधेरा है।
**क्या मैं इंसान नहीं? मुझमें क्या जान नहीं?
मेरा कुछ वजूद नहीं? कोई पहचान नहीं?
मेरे सवाल न टालो, बहुत अंधेरा है।
चमन को फिर से सजाओ,बहुत अंधेरा है।।
     
भारत भूषन शारदा -
*सियासत*
बेशर्मी को मात दे रही जहां सियासत आज,
इज्जत तो आनी जानी है केवल पद है सरताज!
कुर्सी जिनका दीन धर्म है सत्ता है जिनका ईमान, 
बने हुए हैं मेरे देश की किस्मत के वही भगवान!
दोनों हाथों से लूट देश को अपनी झोली भरते,
नहीं जरा संकोच है मन में नहीं किसी से डरते!
खुद को सच्चा सेवक कहते हैं और दूजे को झूठा,
मेरे देश के कर्णधारों ने लोकतंत्र को ऐसे लूटा!
घोटालों की होती जाती निशिदिन लंबी माला,
निकल रहा है हाय देश से नैतिकता का दिवाला!
लोकतंत्र का पावन मंदिर जिसको सब संसद कहते है,
हिस्ट्रीशीटर पद लोलुप नेता इसके अंदर अब रहते हैं!
हल्ला गुल्ला शोर शराबा गाली गलौज है यार, 
संसद विधानसभा बना दिए सब्जी का बाजार!
जिन पर किया विश्वास जिनको जी भर मान दिया था,
लोकसभा और विधानसभा में ऊंचा स्थान दिया था!
नई दिशा देंगे हम सबको जिनसे थी आस लगाई, 
आपस में वही लड़ते हैं करते हैं खुद हाथापाई!
टीवी पर अक्सर ही इनको आपस में लड़ते देखा 
बेशर्मी से पार कर रहे मर्यादा की सब रेखा!
राष्ट्रपिता बापू के नाम की देते हैं दिन रात दुहाई,
सच कहता हूं मेरे देश में आग इन्हीं लोगों ने लगाई!
भाईचारा लहराने लगता गिले-शिकवे सारे मिट जाते,
एक ही स्वर में आनन फानन अपना वेतन भत्ता बढ़वाते!
अविरल गति से महंगाई का चक्कर चलता जाता,
निर्धन कैसे जिए यहां पर नहीं समझ कुछ आता!
कैसा रोग लगा आंखों को नहीं समझ में पाया
बिना दाग का कोई दामन मुझे नजर नहीं आया! 
देश प्रेम की विमल भावना कब और न जाने कहां खो गई!
अब और परीक्षा लो ना भगवान कुछ तरस देश पर खाओ, 
देश प्रेम का नन्हा सा दीपक नेताओं के मन में जलाओ!
लोकतंत्र की गरिमा समझें नेता मर्यादित हो जाएं
एक बार फिर मेरा भारत विश्व गुरु जग में बन जाए!
हर चेहरा खुशियों से चमके मिटे सभी के दुख और क्लेश, 
रोम रोम पुलकित हो बोले जय भारत जय मेरा देश!!

हरि दत्त 'गौतम' -
संस्कृत पढ़ बने सुसंस्कृत सब गुण कूट-कूट कर भरे हुए
थे पूर्ण अहिंसक वीर, नहीं कायरता से वे मरे हुए
अमरीकी शह पर उछले पाकिस्ताॅं का घुस मारा शिकार-----
**अमरीका गाजर घास विषैली संग गेंहू देता उधार
अपनी शर्तों पर घुटने टिकवाने कर कुत्सित विचार
पर नहीं झुके,भारत ने उनके संग किया व्रत सोमवार---
**सादगी महा सरलता अहा, फैलाते पग जितनी चादर
कुछ फटे पुराने कपड़ों में ही काटा कुल जीवन हॅंसकर
अपमान जनक शर्तें ठुकरा कुचला अमरीकी अहंकार---
**देकर किसान को अत्यादर, फिर जगा जवानों का+भिमान
दुनिया चोंका दी नूतन भारत में ला कर स्वर्णिम विहान
समुचित उत्तर देकर उतार डाला चढ़ता चीनी बुखार---
**अद्भुत नेतृत्व पूर्ण साहस दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई थी
बन शौर्य प्रतीक बहादुर ने हर अरि को धूल चटाई थी
सूरज श्री लालबहादुर का चमकेगा पा शाश्वत  निखार----

दिलशाद सिद्दीकी -
तख्त पर काबिज है जिसने झूठ
की बरसात की 
सर उसका गयाहै जिसने सच्ची
बातकी।
राख कर दी बस्तियां जालिम ने
सोचा न कभी
कितनी मेहनतसे घरों की घुरबा
ने तामीर की।
आज मुन्सिफ बिक रहे हैं जर के बदले मुल्क में
ये हकीकत है बयां बस आजके
हालात की
अबसे पहले कोई भी देखानथा
उसका करम
राज है कुछ इसमें उसने पेश
जो सौगात की।
अहले ईमान को अगर अल्लाह
ने दी दौलत 
खोलकर दिल उसने घुरबा को
बड़ी इमदाद दी।
गम मेरे बच्चोंको हो सुनकर के
मेरी दास्तान
बात इस वजह से छुपाई हैमैंने
हर फिकरात की।
मुश्किलें दिलशाद ये सब हैं
गुनाहों की सजा
क्यों शिकायत फिर करो मुश्किलों आफात की।
(लिप्यांतरण - विजय भटनागर)
आफात = बहुत मुसीबत
घुरबा = गरीब

सतीश शुक्ल, खारघर  -
सुख दुःख की छाया ये जीवन 
सुख दुख अातीजाती परछाई  है 
कभी प्रचंड धूप कभी बदरी छाई है 
जीवनकली काँटों के बीच मुस्काई  है 
यहीजीवन की एक. बड़ी सच्चाई है 
करले कुछ और नए जतन 
मत हो विचलित उद्ग्विन  मन 
पाषाणी पर्वत से ही सरिता बहती
जग तृप्ति दे सागर में  जा मिलती 
जीवनधारा तो निरंतर  आगे ही बढ़ती 
बाधाओं को पार करता साहसी  जीवन 
मतविचलित हो उद्ग्विन मन

चंद्रिका व्यास, खारघर नवी मुंबई -
*हौसला*
 हौसले बुलंद हो तो
 पंख भी आ जाते हैं !
 पिंजरे में कैद पक्षी 
मौके को तलाशता है
 निरंतर पर को झटक 
 अभ्यास वह करता है !
 एक दिन उड़ जाऊंगा 
हौसला वह रखता है 
कटे पंख लिए चिड़िया
 मायूस नहीं होती है 
संघर्ष कर हर तिनका
 उठा वह लेती है !
 चिड़ा (पति) से वह कहती है 
एक दिन उड़ जाऊंगी 
पंख मेरे जब आएंगे
आकाश को चूमती 
चिड़िया पति से कहती है
हौसले बुलंद हो तो
 पंख भी आ जाते हैं !
 हौसले बुलंद हो तो 
सपने भी होंगे पूरे
अंधियारा छट जाएगा
जीवन महकाएगा
हौसला ना छोडूंगी 
तिनका तिनका जोड़ मैं
घोंसला बनाऊंगी !
 जीत गई चिड़िया 
घोंसला बना अपना
 बच्चों को जनम दे 
हौसला उन्हें दिलाया 
पंखों के आ जाते ही
 चुमोगे आकाश तुम भी
 संघर्ष है हमारा जीवन
हिम्मत ना हारना तुम 
गर हौसले बुलंद हो  तो
विजय तुम्हारी होगी !
संघर्ष का जीवन माता
बच्चों को सीखाती है !
गर हौसले बुलंद हो तो
सहारे की जरुरत नहीं
मेरु चीरकर भी बीच से
नदी निकल आती है !
थक कर न बैठना संघर्ष कर
राह अपनी खुद ढूंढना
हौसले बुलंद हो तो 
आगे मंजिल मिल ही जाएगी..2

राम प्रकाश विश्वकर्मा "विश्व" -
कल बसे थे आज वीराने हुए हैं।
उस शहर के लोग पहचाने हुए हैं।।
दोस्तों की शक्ल वाले लोग भी कुछ,
सामने संगीन क्यों ताने हुए हैं??
लड़ रहे हैं जो ग़रीबों का मुकदमा,
हाथ अपने ख़ून से साने हुए हैं।।
लोग कहते हैं कि ये का़तिल नहीं हैं,
इस जगह के आदमी माने हुए हैं।।
काश बातें *"विश्व"* की तुम तो समझ लेते,
क्या कहें उनको जो दीवाने हुए हैं??

दिलशाद शिद्दीकी -
इन्होने अपनी ग़ज़ल रोमन लिपि में दी.

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, कोपरखेराने, नवी मुंबई - 
श्री लाल बहादुर शास्त्री मेरे, 
पूर्व प्रधानमंत्री भारत लाल। 
छोटा कद होकर भी जिसने, 
हुये कामयाब देश के लाल।। 
श्री लाल...................… 1
2 अक्टूबर का पावन दिन है,
जन्में देश में लोकप्रिय लाल।
लाल बहादुर शास्त्री नाम है, 
कर दिया देखो बहुत कमाल।।
श्री लाल...................... 2
छोटे कद के आप थे नेता, 
ताशकन्द में जा हुये हलाल।
यह दुनिया भी अजब भाई, 
नहीं किया कोई भी सवाल?।।
श्री लाल..................…. 3
वह पूर्व प्रधानमंत्री जी थे,
सत्ता में थे कुछ गिने साल।
जै जवान जै किसान बोले,
ऐसे प्यारे थे  अपने लाल।। 
श्री लाल................…....4

अनिल पुरबा 'एहमक' -
मैं मजबूर हूँ, चलो कोई बात नहीं,  
अब छोड़ो भी यार, इसे मेरी पहचान ना बना I
मुझे मोहब्बत है उससे, सिर्फ वही बेखबर है, 
दिल तोड़ने का रकीब, तू कोई नया सबब ना बना I
बेगैरत है दुनिया, आजमा के देख लिया सबने, 
अपनी ईमानदारी का दोस्त, तू इसे गवाह ना बना I
मैं सब हार चुका, तक़दीर ने कैसी बाज़ी खेली,
लाचरियों का मेरे, तो कोई खरीदार ना बना I
पीता नहीं हूँ, यह तो ज़िंदगी का सुरूर है,
ठोकर लगी है बस, तू मुझे शराबी ना बना I
मैं निराशावादी नहीं, बस वक़्त साथ नहीं मेरे, 
सब तबाह हो जाएगा, तू रेत के किले ना बना I
आस्तीन के साँप, कब के डस कर चले गए, 
मेरी फितरत को, तू और जहरीला ना बना I 
नासमझ हूँ भी-नहीं भी, अब कैसे साबित करूँ खुदकों, 
आँकने का मुझे, तू कोई पैमाना ना बना I
सियासत मेरे खून में नहीं, अभी ज़मीर नहीं बेचा मैंने,
गोया लहू को मेरे, तू सफ़ेद ना बना I
मेरी तरक्की का जिम्मा, तेरे हाथ में दे दिया, 
फ़ासलों को हमारे, तू फैसलों पर हावी ना बना I 
मेरी असलियत क्या है, यह जानते हो तुम, 
एहमक ही रहने दे, तू मुझे आदिल ना बना I

शोभना थककर
मुबारक हो मुबारक हो 
तुम्हे जन्म दिन मुबारक हो 
तुम हँसते रहो हसाते रहो
गज़ल गीत गुन गुनाते रहो
दीपक की तरह उजाला 
चारो और फैला ते रहो
फूलों की तरह खुशबू जीवन में 
फैलाते रहो
मुबारक हो मुबारक हो 
तुम्हे जन्म दिन मुबारक हो 

दिलीप ठक्कर " दिलदार"-
साथ में चलने वाले मुझको छोड़ गए, 
न जाने किस बात पे वे मुख मोड़ गए!
जिस डाली पर जीवन के सुख मिलते थे, 
लोग वही पेड़ो की डाली तोड़ गए!
मेरी नज़र में लोग वही सब श्रेष्ठ हुए,
दिल से दिल का रिश्ता यां जो जोड़ गए!
भटका ना मैं राह से सीधा चलता रहा, 
जीवन के इस राह में कितने मोड़ गए!
पत्थर था किस का "दिलदार"पता नहीं, 
कौन थे वे जो लोग मेरा सर फोड़ गए!

हनीफ मोहम्मद -
तीर भी मै हूँ तलवार भी मै हूँ 
 दोनो ही तरफ से बेजार भी मै हूँ। ।
रूह कांपती इस दुनिया में सनम 
बदहवास भी मै हूँ गमखार भी मैं हूँ।।
मिटा दिया हम ने तवारीख के हर हरफ़
मोशननीफ भी मै हूँ नासीर भी मै हूँ।।
हर रात मे रे घर का दिया जलता है 
यह आग भी मै हूँ शरर भी मै हूँ

अलका पाण्डेय -
*आओ याद करें* 
आओ आज याद करे 
बापू के बलिदानों को 
सत्य अंहिसा की लाठी से 
खादी वाली धोती से 
अंग्रेज़ों को ललकारा था 
देश प्रेम जगाया था 
देश का बच्चा बच्चा जाग उठा था 
बापू के क़दमों से कदम मिला 
माँ की रक्षा का , लिया गया था प्रण
माँ को आजादी करायेगे 
जान पर खेल जायेंगे 
बापू 
की सत्य अंहिसा की बाते 
आओ आज याद करे गांधी की बातें 
घर घर में चरख़ा पहुँचाया 
चरखे के ताने बाने से सूत बनाया 
खादी की इस क्रांति  से 
घर घर में खुशहाली आई 
हिंदू - मुस्लिम- सिख - ईसाई 
सबको आपस में गले मिलाया 
एकता का रहस्य समझाया 
गांधी की शांति और अमन से 
डर गये सभी फिंरगी 
नई चाल वो चलने लगे 
घात पर घात करने लगे 
फूट डाल शासन करने लगे 
बापू का तब सर चकराया 
यह रहस्य उन्हें जब समझ आया 
भारत का नया इतिहास रचा 
उठाई सत्य अहिंसा की लाठी 
सत्याग्रह पर बैठ गये 
काँप उठे तब सारे फ़िरंगी 
सत्य प्रेम का पथ अपना कर 
घर घर नव प्रकाश फैलाकर 
बापू तुमने आजादी दिलाई 
आओ आज याद करे 
बापू के बलिदानों को 

नेहा वैद्य -
तितली और कबूतर जैसा दिल अपना,
पता किसी को क्या हम कितना डरते हैं।।
**दिन निकला जब आंखें खोले
टाई सूट बूट संग डोले,
मांगों की भारी गठरी ले खाते रहते हैं हिचकोले
सांसों की दुल्हन को, तन की डोली को ये हिचकोले सचमुच बहुत अखरते हैं।
तितली और कबूतर जैसा दिल अपना पता किसी को क्या हम कितना डरते हैं।।
**शकुनि के पासे-सा हर दिन
चाल बदलता रहता अनगिन
रही प्रतिज्ञा कभी अटल तो समझौते हैं कभी हृदय-बिन
कभी मिलाकर, कभी झुकाकर आंखों को 
जीवन-समर भूमि में रोज़ उतरते हैं। 
तितली और कबूतर जैसा दिल अपना पता किसी को क्या हम कितना डरते हैं।

 हेमन्त दास 'हिम' -
(मैथिली गीत के नीचे हिंदी अनुवाद है)
देशक धरती मुक्त करौलनि, कटलनि सामाजिक बंधन
सच्चाई आ सादगी केँ ओ अजस्र स्रोत केँ नमन।
देशक उर मे बसल रहय छथि ओ महात्मा गांधी अपन।
महात्मा गांधी-2
अत्याचारी अंग्रेज सँ सभ देशवासी तड़पै छल
छूआछूत, जातिपात आ साम्प्रदायिकता केँ छल अनल
सत्याग्रह सँ शत्रु के भगा प्रेम सँ कयलनि अग्निशमन।
देशक उर मे बसल रहय छथि ओ महात्मा गांधी अपन।
महात्मा गांधी-2
धन अरजी मुदा अपना पर नहि, जन के वास्ते खरची
आत्मनिर्भर हो गांव गांव, तहि लेल कुटीर उद्योग, चरखी
हिंसा के जे दूर भगौलानि, बढौलनि हिंदीक प्रचलन।
देशक उर मे बसल रहय छथि ओ महात्मा गांधी अपन।
महात्मा गांधी-2
----
(हिंदी शब्दानुवाद)
देश की धरती मुक्त कराये, काटे सामाजिक बंधन
सच्चाई और सादगी के उस अजस्र स्रोत को नमन
देश के उर में बसते हैं आप महात्मा गांधी अपने।
महात्मा गांधी-2
अत्याचारी अंग्रेज से सभी देशवासी तड़प रहे थे
छूआछूत, जातिपात और साम्प्रदायिकता की फ़ैली थी अग्नि
सत्याग्रह सँ शत्रु को भगा, किया प्रेम से अग्निशमन।
देश के उर में बसते हैं आप महात्मा गांधी अपने।
महात्मा गांधी-2
धन अरजें पर निज पर नहीं जन के वास्ते खरचें
आत्मनिर्भर हो गांव गांव, उस लिए कुटीर उद्योग, चरखी
हिंसा को जो दूर भगाये, बढ़ाये हिंदी का प्रचलन।
देश के उर में बसते हैं आप महात्मा गांधी अपने।
महात्मा गांधी-2

चन्दन अधिकारी - 
आओ चलें हम
 प्यार का सागर बन जायें 
परदुख के हर आँसूं  को हम 
प्यार- पथ्य  से पोंछ आयें /
अंधे की हम लाठी बनकर 
राह के साथी बन जायें 
लंगड़े की हम बग्घी बनकर 
मुकाम तक उसे पंहुचा आयें /
वृद्धजनों के हाथ पकड़कर 
कुछ पल उनसे बतियायें 
स्नेह दुआओं की बूटी अपने 
झोले में हम भर लायें /
 ये ऐसा क्यों, वो ऐसा क्यों 
दोषबुद्धि से बच जायें 
प्यार  के कुछ बोल सुनाकर 
हर दिल में हम  बस जायें /

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
*अनुशासन*
अगणित जीवन हैं धरती पर
सबके अलग-अलग आकार ।
रखते हैं सब कर्म-धर्म सुधि
क्षमता शक्ति क्षुधा अनुसार ।
 **विविध जीव हैं सृष्टि पालती
सुर दुर्लभ मनुज जीवन है ।
गुण-अवगुण बल-बुद्धि परीक्षा 
प्रजनन जनन निरूपण है ।
**ईश्वर अंश जीव अविनाशी
अनुशासित सदभावों से ।
आकृति प्रकृति धर्म धूपावत
पूर्व कर्म फल छाँवों से ।
उत्कर्षित संप्रेरित रसना 
सुरभित मन सत्संग सुनीति ।
योग-भोग-तप सुख-दुःख तृष्णा 
संकट कष्ट व्याधि पथ रीति । 
अनुशासित है जीव गुणों से
कर्मों से प्लावित आकार ।
रखे अक्षुण्ण गुप्त सद्भावना 
मन ऊर्जित अर्जित संस्कार ।
अनुशासित हो जीव दण्ड से
सुने पढ़े भय देख विचार ।
घर-बाहर जग जाने समझे
भाग्य कर्म-फल विधि अनुसार । 

राजेन्द्र भट्टर -
*कोरोना का उधम* 
 कोरोना वाइरस ,करे उधम 
कर रखा नाक में सबकी दम  
ये कई रंग दिखलाये हमे 
ये तरह तरह से सताये हमें 
कभी खांसी कभी जुकाम करे 
ये सबकी नींद हराम करे 
ये सांस सांस में तंग करे 
कभी खुशबू आना बंद करे 
कभी ये बुखार में तड़फाये 
कभी ऑक्सीजन को तरसाये 
ये तरह तरह के ढाये सितम 
कर रखा नाक में सबकी दम 
इससे बचने की मजबूरी 
तुम रखो बना सबसे दूरी 
मुंह और नाक पर मास्क रखो 
सेनेटाइजर ,सब पर छिड़को 
मत 'हैंड शेक 'का करो 'ट्राय '
दूरी से नमस्ते ,बाय  बाय 
जहाँ भीड़भाड़ हो जाना नहीं 
बाहर का खाना ,खाना नहीं 
घर में घुस ,बैठे रहो हरदम 
कर रखा नाक में सबकी दम 
बंद मनना अब सब त्योंहार 
ना शादी ब्याह में भीड़भाड़ 
बंद है बाजार ,दुकाने सब 
होटल सारे ,मयख़ाने सब 
अब झाड़ू पोंछा ,सब घर का 
खुद करना ,काम न नौकर का 
ऑफिस का काम करो घर से 
ना  निकलो ,कोरोना  डर  से 
ये अब जल्दी न सकेगा थम 
कर रखा नाक में सबकी दम

अंत  में  अध्यक्ष मधु श्रृंगी ने पूर्व में पढ़ी गई रचनाओं पर अपनी टिपण्णी की और अपनी कविता पढ़ी. -
मैं मात्र एक साया हूं,
मेरा अब कोई वजूद नहीं।
मैं जा चुका हूं,सदा के लिए इस दुनिया से दूर,
लेकिन तुम्हारे करीब रहता हूं हर पल।
जब तुम मुझे चारदीवारी में खोजते हो न,
तो दीवार पर चंदन माला में टकीतस्वीर की आंखें,
हर पल पीछा करती रहती है तुम्हारा।
खिन्न हो जाता है मन ,जब देखता हूं,
उजड़ी मांग, सूना ललाट,रूखे होंठ,
बिन चूडियों की कलाइयां, पथराई आंखें,
श्वेत साड़ी में लिपटी, कोई जोगन सी।
ऐसा नहीं है कि तुम मुझे महसूस नहीं करती,
तुम्हारे केश की टपकती बूंदों से भीगता हूं मैं,
रात्रि के आगमन पर तकिए में समा जाता हूं और,
खोजने लगता हूं तुममें, उस अतीत की सुंदर परी को।
तुम अनजाने मे ही लिपट जाती हो मुझसे,
और अनायास ही रोने लगती हो फफक फफक कर।
क्यों करती हो ऐसा?
पौंछ देता हूं, कपोल पर लुढ़कते उन अश्रुओं को,
खोजने लगता हूं,कुदरत की बनाई हुई सुंदर कृति को।
तुम्हें भी तो अहसास होता है मेरे होने का,
कल से तुम फिर सजना, सवंरना।
वही लाल चुनरी,दमकता सिंदूर ,सूरज सी बिंदिया,
होठों पर लाली, देखना चाहता हूं मैं,
फिर वही शौख अदाएं मचलती जवानी वही चुलबुलापन,
मर कर भी अमर हो गया हूं मैं,तुम्हारे प्यार में।
क्यों कि आत्मा हमेशा अमर होती है
                                            
 फिर धन्यवाद ज्ञापन के बाद एक सफल  कार्यक्रम का समापन हुआ.
......
रपट की प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com