Tuesday, 8 September 2020

आईटीएम काव्योत्सव की 114वीं गोष्ठी नवी मुंबई में 6.9.2020 को संपन्न

वसुधैव कुटुंबकम् की जय जयकार चतुर्दिक होगी

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कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए आईटीएम काव्योत्सव के संयोजक विजय भटनागर के बाद दूसरे  सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ अनिल पुरबा ने बताया कि क्रोना के कारण हमे आभासी गोष्ठी के द्वारा संपर्क  साधना पड़ रहा है। हमने पिछले माह 9वां वार्षिक उत्सव भी आप सभी के सहयोग से आभासी गोष्ठी द्वारा सफलता पूर्वक सम्पन्न किया था।  पांचो आभासी गोष्ठियों के अध्यक्षों को तथा पाचों गोष्ठियों के कार्यक्रम प्रबंधक अनिल पुरबा  को ईमेल से प्रशंसापत्र प्रदान कर 9वे वार्षिक उत्सव को गौरवान्वित  किया। इस में हेमन्त दास हिम ने काव्य रसिकों  के फोटो तथा कविताए बेजोड़ इन्डिया की ब्लाग रपट मे प्रकाशित कर कार्यक्रम की स्मृति को अमरता प्रदान की।

दसवें वर्ष की इस प्रथम गोष्ठी  का शुभारंभ   वंदना श्रीवास्तव  की सरस्वती वंदना से हुआ। तत्पश्चात राष्ट्रीय गान विशंभर तिवारी ने किया ।इस दिन कवि गोष्ठी के अध्यक्ष गजलकार दिलीप ठक्कर थे और संचालन विमल तिवारी ने किया।

विजया  वर्मा ने अपनी  कविता  के माध्यम से नारियों में जागृति लाने का प्रयास किया - 
नारी तुम क्यूं इतनी विवश बनी हुई हो?
शोषित होते रहना ही, तुम्हारी नियति नहीं है।
तुम केवल अंक - शायिनी , नही हो ।
तुम जन्म दायिनी हो, मां हो तुम सबकी।
इस जग की आधारशिला हो तुम।
अपनी इस गरिमा को पहचानो तुम ।
नारी तुम क्यूं इतनी विवश बनी हुई हो ?
रिश्ते तो सामाजिक अनुबंधन हैं,
इन्हें निभाना भी आवश्यक है।

नारी विमर्श को नई ऊँचाई पर ले जाते हुए भारत भूषण शारदा ने पत्नी को परमेश्वर घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी -
पत्नी को परमेश्वर मानो,
बाहर से जब भी घर लोटो साथ में कुछ भी लाया करो,
बड़े प्यार से पास बिठा आग्रह कर उन्हें खिलाया करो!
श्रीमती जी जब बाहर जाएं बच्चे लेकर पीछे हो लो,
वह तो नादानी करेंगे ही उन पर न तनिक झुंझलाया करो!
बाहर घूमते समय यदि मित्र कोई उनका मिल जाए,
तुम दूर खड़े होकर उनसे बिजली के खंभे देखा करो!

सेवा सदन प्रसाद ने भष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ी - 
किसी ने साथ नहीं दिया, अकेले लड़ता रहा भ्रष्टाचार से
भीड़ बिखड़ गई चौराहे पे, मैं जूझता रहा अत्याचार से
किस किस जो बताऊँ मैं, तांग आ गया हूँ अब ब्यभिचार से
शहर की शक्ल बिगड़ती गई, हर ओर फैल अनाचार से
उन्नति, प्रगति भी खूब होगी, ऐसे लोगों के पूर्ण बहिष्कार से

वंदना श्रीवास्तव ने अपनी सृजनशीलता के हौसले पर रूढ़ियों से बगावत का फैसला कर लिया -
कागज की  नाव हूँ
बगावत का फैसला
समुंदरों में तैर के जाने का हौसला
सूरज को ओढ़ के सिर पर विमान सा
चलती रहूंगी, लाख हो कांटों का सिलसिला

सतीश शुक्ला ने अबोले रह गए बोल की चर्चा की - 
ये स्वर क्यों अबोले  रह गए ,
दृष्टि मिली अधर बिन बोले रह गए .
फिरभी हम निखरते  निखरते रहे 
कुम्हलाना  हमारी फितरत रही न कभी 
हरमौसम में हर कज़ां में हम खिलते रहे 
मुड़कर देखता हूँ इस मुक़ाम से 
कितनेलोग बिछड़े कितने मिलते रहे 

शोभना ठक्कर  ने दिलों के राज खोलने की बात की-
वो आज बहोत बोलेगा 
राज़ दिल के ही खोलेगा 
हर बात को वो अपनी 
नज़रो से ही तोलेगा
बिन किसी भी वजह 
वो तो जरुर डोलेगा

मधु श्रृंगी ने श्रंगार मुक्तक रखे- 
तुम मुझे पूनम का चांद कहते हो,
मुझपे जीते हो और मुझपे मरते हो।
क्या मेरे चेहरे पे कोई दाग नज़र आता है,
फिर क्यों तुम मुझको चांद सी कहते हो।
मुझे तुम प्यार से सुनना मैं शायर की गज़ल सी हूं,
ठहर जाए मिलन का जो उसी सुंदर से पल सी हूं।
मुहब्बत में मेरे कोई न छल कोई कपट है प्रिय,
जरा छूकर तो देखो तुम मैं पावन गंगाजल सी हूं।

 नेहा वैद ने  कोरोना युग में हर पल डर से गुजरने के भाव पर आधारित गीत सुनाया-
तितली और कबूतर जैसा दिल अपना,
पता किसी को क्या हम कितना डरते हैं।।
दिन निकला जब आंखें खोले
टाई सूट बूट संग डोले,
मांगों की भारी गठरी ले खाते रहते हैं हिचकोले
सांसों की दुल्हन को,
तन की डोली को ये हिचकोले
 सचमुच बहुत अखरते हैं

ओमप्रकाश पाण्डेय ने रोटी की महिमा रखी - 
एक छोटा सा प्यारा बच्चा
कन्धे पर लटके उसके एक झोला
होटल के बाहर पड़े कूड़ेदानों में
ढूंढ़ रहा था कुछ दोनों हाथों से
उसके बगल में खड़े  थे कुत्ते कई
दोनों ढूंढ रहे  बस रोटी का एक छोटा टुकड़ा........१
जीवन केवल सिद्धांत नहीं है
जीवन केवल आदर्श नहीं है
जीवन केवल  स्वपन नहीं है
जीवन केवल एक सत्य  नहीं है 
जरा भूखे इस बच्चे से तो पूछो
उसे तो चाहिए बस रोटी का एक छोटा  टुकड़ा .......

डा रामस्वरुप साहू 'स्वरुप'ने नाव पथ के राही बनने को जहां-
नव पथ का राही-
नव पथ का में राही हूं,
गीत प्रेम के गाता हूं,
भावनाओं के सागर में,
शब्दों के कमल खिलाता हूं।
विहंग रागिनी सुन लहरों की,
रातों को जग जाता हूं,
कलम उठा फिर कागज पर,
मनभावन चित्र बनाता हूं।

कुमकुम वेदसेन ने प्रेमपत्रों को तिलांजलि देने के वक़्त मन में घुमड़ रहे भावों को रखा- 
इश्क की दास्तान पर
लग गया   पूर्ण विराम
वर्षों से लिखा गया खत्
बन गया आखिरी खत
प्यार मेरा बेदाग रहे
समाज में बदनाम ना हो
जला दिया उस खत
जिसे तुमने लिखा

विश्वम्भर दयाल तिवारी ने जीवन गति के मर्म को दार्शनिक भाव से समझाया - 
जीवन विमान की परछाई ।
गतिमान वेग से चले उड़े 
मंजिल छोड़े मंजिल पहुँचे
देखता शून्य की ऊँचाई  
संग धूप-छाँव सी तरुणाई 
जीवन विमान की परछाई ।
ऋतु मौसम की परवाह करे
संवेग क्षितिज की थाह धरे
विप्लव आकर दे कठिनाई
ले लेता पथ पर जमुहाई 
जीवन विमान की परछाई ।

अशोक वशिष्ट ने ख़री-खरी सुनाई- 
चैनल वालों को रहा , सिर्फ़ एक ही काम।
बस सुशांत पर बोलना, हर दिन सुबहो-शाम।।
हर दिन सुबहो-शाम  , चीखते और चिल्लाते ।
बनते स्वयं वक़ील , स्वयं ही जज बन जाते।।
आम आदमी के मुद्दों , पर नज़र घुमा लो।
कुछ तो ज़िम्मेदारी , समझो चैनल वालो ।।

हरि दत्त गौतम ने आज के दौर में मदमस्त अदाओं में खोए लोगों का विश्लेषण किया - 
चिन्ता खाए जाती अपने साहित्यिक दादाओं की
नहीं पूर्ति हो पाएगी उनकी मदमस्त अदाओं की।
तूफ़ानों में जीवन नौका कहीं न धोखा दे जाए
कोई भी गुलबदन चुरा कर हमसे उन्हें न ले जाए।
कुछ क़ीमत तो अदा करो उनकी अलमस्त बफाओं की
करो आरती मिलकर सारे दिलकश कशिश अदाओं की।

अनिल पुरबा ने "ज़ख्मी इंसानियत" की पंक्तियाँ सुनाई-
आज भी इंसानियत मेरे साथ ही आयी है, 
आप मिलेंगे उससे, थामेंगे उसका हाथ, 
बड़ी उम्मीद है उसे, मुझसे, हमसे, 
हमारी जमात से ..
कहिए.. मैं और वो, आपके जवाब के
इंतज़ार में हैं ...
आयें, अपनाएँ उसे, थामे उसका हाथ, 
और हैवानियत के इस दौर में, 
इंसानियत को उसका अभिमान और 
स्वाभिमान लौटा दें I

सत्य प्रकाश श्रीवास्तव सबको साथ लेकर चलनेवाले हैं पर लोग कुछ गलतफहमी पाल लेते हैैं. उन्हें समझाते हुए उन्होंने कहा -  
'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
मैंने कह दिया उनसे,
न मेरा इन्तजार करना।
मुझे कुछ काम जरूरी है,
हो न सकेगा कल मेरा आना।।1।।
 मगर उनकी समझ में,
 मेरी ये बात आती ही नहीं है।
और तब जन्म होता है जिन्दगी में,
गलत फहमियों का।।2।।
अगर गलत फहमियाँ,
हम होने न दें पैदा।
तो धरा पर स्वर्ग होगा,
न होंगे अभाव इस उस के,
धरा पर अमर शांति होगी।।3।।
 न ये मेरा न ये तेरा,
अभाव कोई नहीं होगा।
नहीं दुष्टता होगी जग में,
वसुधैव कुटुंबकम् की अपनी,
कल्पना की जय जयकार 
चतुर्दिक होगी।।4।।

राजेन्द्र भट्टर ने हास्य के अंदाज़ में प्रभु  से मनाते दिखे कि लॉक डाउन के जैसा दिन  कभी  न आये  -
 घर का काम पड़े खुद करना ,
ना महरी का आना जाना 
झाड़ू पोंछा ,गृह कार्यों में ,
पत्नीजी का हाथ  बटाना 
बरमूडा ,टी शर्ट पहन कर ,
दिन भर रहना घर में घुस कर 
कब तक अपना वक़्त गुजारें ,
टी वी चैनल ,बदल बदल कर 
दिन भर पड़े  रहें बिस्तर में ,
हरदम अलसाये अलसाये 
प्रभु ऐसे दिन कभी  न आये 

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ने शिक्षक दिवस पर कविता सुनाई - 
शिक्षक छात्र का है,
भाग्य विधाता।
वह हर दिन अपने,
 छात्र को गढता।।
अंदर से वह उसको,
 प्रेम से सहलाता ।
ऊपर से वह उसको,
थपकी है लगाता ।।
तपा तपा कर वह,
 छात्रों को बनाता।
 तब जाकर वह,
सच्चा इंसान हैं बनता।।

अलका पांडेय ने अपनी कविता के माध्यम से अपने जीवन की सार्थकता ढूंढ ही ली नारी के रूप में घुटन और संत्रास को झेलते हुए भी - 

अपने लिए अब मैंने जीना सीख लिया ! 
घुट घुट के अब मरना मैंने छोड़ दिया !!
करने लगी मोहब्बत अपने आप से मैं
लोग कहेंगे क्या ये सोचना बन्द किया !
सब कुछ भूला रही हूँ यादें दफ़ना दी
अपने लिए ही अपने को नया सपना दी
नहीं वास्ता दुनियाँ वालों से अब कुछ
सारा प्यार खुदी से खुद को अपना  दी
मुझे नहीं अब दूजों को है फर्क पड़ा,
मेरा मन भी लाठी लेकर हुआ खड़ा
मुझे हिलाने वाले अबकी हिल उठे
नारी ने जब अपने हक़ का चाटा जड़ा

चन्द्रिका व्यास ने कविता में बताया कि - शिक्षा वही जो राष्ट्र पर गौरव करना सिखाए 
जीवन की पहचान है शिक्षा
    संस्कार का गहना है शिक्षा
   मात-पिता की आशा है शिक्षा
   राष्ट्र की परिभाषा है शिक्षा !
**शिक्षा वही जो सम्मान कमाये
      शिक्षा जो संस्कार जगाए 
      अपने गांव के मिट्टी की खुशबू
     देश के कोने कोने में महकाए !
**शिक्षा वही जो ज्ञान बढ़ाए 
     संस्कृति की मर्यादा रखे बनाए
      देश प्रेम पर बलि बलि जाए
      राष्ट्र का गौरव कहलाए !

किशन तिवारी भोपाल बदहवास हालात में राहत की तलाश करते दिखे -
कब से भटक रहे हैं कोई काम तो मिले
बेनाम  हम नहीं  हैं कोई  नाम  तो मिले
हम भी हैं आप की तरह हम ये तो कह सकें 
दिल को  सुकून  ज़ेहन को आराम  तो मिले 
मैं थक  गया  हूँ और  पसीने  से  तरबतर 
ठण्डी हवा महकी हुई इक शाम तो मिले 
देखा है  अजनबी की  तरह हर निगाह ने 
हमको कहीं से प्यार का पैग़ाम तो मिले 
महफ़िल से तेरी कोई  भी प्यासा नहीं गया 
हम भी हैं तश्ना लब हमें इक जाम तो मिले 
अब तक तो बेवजह ही गुज़ारी है ज़िन्दगी 
मक़सद  मिले  हमें कोई  मक़ाम  तो मिले 

हेमन्त दास 'हिम' बेवजह के शोर से परेशान दिखे जिससे सिर्फ आप भरमा सकते हैैैं कोई राह नहीं दिखा सकते -
यूं ही छुपा हूँ रहता, कोई राज़ नहीं है
शोर ही शोर है सब, कोई आवाज़ नहीं है
वबा ने तो दी है बस दो मीटर की दूरी
रहनुमा ने पनपाई जो अंदाज़ नहीं है
कोई सूरत हो इसकी कि 'हिम' न गलत करे
और ये भी सुने कि साहब नाराज नहीं है.
वबा = महामारी

विजय कुमार भटनागर ने हिंदी को अधिकाधिक अपनाने पर बल दिया -
हिंदी हिंद का गौरव भारत मां के
माथे का सिदूंर है
जब तक अपनाओगे न हिंदी चित्त का चैन हमसे दूर है।
ढो रहे हैं अंग्रेजी के मुर्दों को हम
तिहत्तर वर्षों से
जिंदा मां बापको डेड तथा मम्मी
कहने को मजबूर हैं।
क्या चीन ने अपनी जबान छोड़ी
,जापान ने जापानी 
तरक्की के नाम पर बोल रहे अंग्रेजी
हिंदी हमसे दूर है।
साठ फीसदी जनता है गांव मे
अंग्रेजी नही आती
हिंदी छोड़ अंग्रेजी पर जोर तभी गांव वाले मजदूर हैं।
अंग्रेजी पर विजय पाना हम को  अब बहुत जरूरी है  
नारा हो, हिंदी राष्ट्रभाषा हो, तो
वो लक्ष्य नहीं दूर है।

चंदन अधिकारी ने हिंदी पर फक्र व गुमान जताया - 
इस बात पर अभिमान है
 मुझे फ़ख्र व अति गुमान है
कि हिंदी मेरे प्यारे वतन की
आन- मान और पहचान है 
अति कष्ट ह्रदय में समेटे
बहनों को प्रशय देती है ये
एकता राष्ट्र की अक्षुण रहे
सीना तान के कहती है ये 

विमल तिवारी ने देेेेवप्रिय भारत भूमि पर मर्यादाओं के टूटते जाने से गंभीर चिंता व्यक्त की -
जहाँ देवों की थी  लगी होड़
 अवतरित होने को धरती पर 
त्राहि त्राहि मचा रखा है, 
कुछ शैतानों ने  धरती पर l
वही  धरा आज अकुलाई है, 
कुछ कहने में  सकुचाई है, 
दुष्प्रवृति देख संतानों में,   
मन ही मन वह शरमाई है l
आह्लादित थे हर प्राणी जहाँ, वे 
रहना न चाहें  जगती पर l
बस धैर्य रखो न  वैर रखो, 
बस चाह रखो निर्वाह रखो, 
आनंदित पल तब ही आएंगे, 
जब मर्यादित रहें हम धरती पर l

अंत में इस दिन की गोष्ठी के अध्यक्ष दिलीप ठक्कर ने अपनी ग़ज़ल में नज़ारों में दिलकशी कम पड़ने की बात की -
चाँद में आज चांदनी कम है 
क्यों नज़ारों में दिलकशी कम है!
चाँद छत पर नहीं आया शायद,
मेरी आँखों में रौशनी कम है!
ख़ुश्क पत्तों से हो गया ज़ाहिर,
इन बहारों में ताज़गी  कम है!
शक्लो सूरत तो आदमी की है,
दर हक़ी पाकर के यूं लगा मुझको,
प्यार करने को ज़िन्दगी कम है!
इतना फैला दिया है नफरत को,
आज लोगों में दोस्ती कम है!
बस दिखावा है रेयाकारी है,
वरना बंदों में  बंदगी कम है!
इस तरह से प्रेम और सौहार्द के माहौल में लगातार चली आ रहै मासिक काव्योत्सव का दसवें वर्ष में प्रथम गोष्ठी का समापन हुआ।
.....
रपट की प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम' 
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com




















1 comment:

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