Monday, 24 August 2020

अजगैबीनाथ साहित्य मंच सुल्तानगंज भागलपुर की आभासी कवि-गोष्ठी 23.8.2020 को सम्पन्न

 हैं मुश्किलें हजार लबों पर हँसी तो है

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दिनांक 23/8/2020 को अजगैवीनाथ साहित्य मंच सुलतानागंज भागलपुर के तत्वावधान में आभासी (ऑनलाइन) अंतरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी का आयोजन मंच के संस्थापक सदस्य डॉ. श्यामसुंदर आर्य की अध्यक्षता मशहूर ब्रह्मदेव बंधु के समन्वयन और अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत के संचालन में हुआ। कार्यक्रम में  महाराष्ट्र, नेपाल, झारखण्द, राजस्थान, यूपी और बिहार के कवियों ने अपनी साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करायी । विभिन्न प्रदेशों के अनेक कवियों को मंच की ओर से साहित्य रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। 

मुंबई से कवियित्री कुसुम तिवारी ने कविता सुनाकर रिश्तों के किरदार पर अपनी भावनाओं को यूँ रेखांकित किया - 
ये माना कि नाता छूट गया 
शाखों से रिश्ता टूट गया 
मन से बाँधी डोर प्रीत की 
उसको तोड़ न पाओगे 
मधुकर तुम वापस आओगे। 

वहीं पटना से वरिष्ठ गजलकार घनश्याम ने अपनी गजल से चिरपरिचित अंदाज में कहा - 
कोठी नहीं है एक अदद झोपड़ी तो है 
हैं मुश्किलें हजार लबों पर हँसी तो है। 

बदायू  यु पी से मनोज कुमार मुन ने अपनी गजल में कहा - 
हम तो बस गम के गुबारों को गजल कहते हैं 
तेरे संग चलती बहारों को गजल कहते हैं 
जिसपे चढ़के हम तुझे खूब सताते थे कभी 
उन्हीं टूटी सी दीवारों को गजल कहते हैं। 

जयपुर राजस्थान से कवियित्री शोभना ऋतु ने प्रेम की प्रज्ञा को परिभाषित किया- 
उसे हम हाले दिल अपना सुनाकर चले आये 
मुहब्बत उसके दिल में हम जगाकर चले आये 
न उनको नींद आती है न उनको चैन आता है 
हमीं तो आग पानी में लगाकर चले आये । 

राँची झारखंड से पुष्पा सहाय ने कहा -
हम तो सपनों को हकीकत बनाए बैठे हैं ...,

भागलपुर से कवि पारस कुंज ने कहा -
भुलाता नहीं कोई एहशां किसी का
कोई हो तो उसका पता दीजिये

अंगिका और हिन्दी के कवि सुधीर कुमार प्रोग्रामर ने कहा - 
पाँव जमी पर रख देने से धरती पुत्र नहीं होता 
चंदन को घसना पड़ता है पौधा इत्र नहीं होता ..

वहीं खड़गपुर से राजकिशोर केशरी ने अपनी रचना में आँगन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया - 
बार -बार आँगन को चीरा जाना 
गाड़ देना उसके सीने पर दीवार ...।

काठमांडू नेपाल से कवियित्री अंजु डोकानिया ने अपने गीत के माध्यम से कहा -
विभावरी नींद न आए 
प्रभाकर नित्य उग आए 
श्रवण सुत भानु कर परित्याग 
अकार्यम पीर तडपाए । 

खडगपुर से कवि व शतदल पत्रिका के संपादक प्रदीप पाल ने कहा - 
सबसे बुरे दिनों में भी आसरा है प्रेम  
है प्रेम ही जो देता है साहस 
बाँटता है संबल 
तो तय है इस बुरे दिनों मे भी 
सबसे बेहतर दिनों का एहसास जीवित रहेगा ।

गजलकार दिलीप कुमार सिंह दीपक ने कहा - 
फूलों का मुरझाना कहाँ अच्छा लगता है 
हया के नूर का जाना कहाँ अच्छा लगता है । 

कार्यक्रम का संयोजन कर रहे वरिष्ठ  गजलकार ब्रह्मदेव बंधु ने अपनी गजल में कहा - 
इश्तहार हो गये लगते हो 
अखबार हो गए लगते हो 
बेच रहे हो जिस्म और इमां 
बाजार से  हो गए लगते हो ।

कवि मनीष कुमार गूंज ने अंगिका में कोरोना पर कहा -
कोरोना बहुत खतरनाक लागै छै 
जेकरा धरै छै खौफनाक लागै छै।

वरिष्ठ कवि रामस्वरूप मस्ताना ने कविता में अजगैवीनाथ की महिमा पर बेजोड बखान किया -
ये अजगैवीनाथ दरबार है, 
यहाँ की महिमा है बड़ी न्यारी 
डमरु वाले है त्रिपुरारी ।

मंच के संस्थापक सदस्य डॉक्टर श्यामसुंदर आर्य ने अपने गीत में कहा - 
उम्रभर की बात है कहो कैसे कटेगी 
बीती हुई जो बात है, यादें से भी कैसे हटेगी । 

वहीं संचालन कर रहे मंच के अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत ने कहा - 
तुम्हारा दर्द मेरे अंदर क्यों है 
मेरी आँखें आज समंदर क्यों है 
जिनके हाथों मे थी कभी कलम 
आज उनके हाथों में खंजर क्यों है। 

अंत में राष्ट्रीय कवि गोपाल सिंह नेपाली को उनके जन्मशती पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। यह कार्यक्रम उनको ही समर्पित था।
...

रपट की प्रस्तुति - भावानंद सिंह प्रशांत
प्रस्तोता का ईमेल आईडी -
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Friday, 21 August 2020

भा. युवा साहित्यकार परिषद का आभासी लघुकथा सम्मेलन 17.8.2020 को सम्पन्न

"लघुकथा समुद्र को अंजलि में भरने का काम":- डाॅ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल 
विशिष्ट लघुकथाओं के सारांश के साथ पूर्ण रपट

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पटना।17/08/2020 सर्वाधिक पठनीय और संभावनापूर्ण विधा है लघुकथा। युवा रचनाकारों ने राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक असंगतताओं के निवारण के प्रति, बेचैन दिख रहे हैं। यही बेचैनी लघुकथा का प्राणतत्व होता है। "

समकालीन लघुकथा की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा करते हुए सिद्धेश्वर ने कहा कि  "इन्टरनेट के इस आधुनिक युग में लघुकथा की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। एक कमरे में बंद होकर लघुकथा पाठ करने के बजाए व्हाइटस एप या फेसबुक पर लघुकथा का पाठ करना और अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा करता है। क्योंकि इस मंच पर दुनिया भर के लोग और कोई भी, कहीं भी, कभी भी देख सुन सकता और त्वरित प्रतिक्रिया भी व्यक्त करने के लिए वह स्वतंत्र होता है। 

उन्होंने कहा कि - "अपनी संस्था द्वारा लघुकथा को पहली बार हमने आनलाइन प्रस्तुति देकर, इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने का प्रयास किया है, कुछ दिनों पूर्व प्रख्यात सहित्यकारों द्वरा इसके उद्घाटन के बाद से  हमने लगभग हर माह लघुकथा की आनलाइन चर्चा और पाठ करवाकर, लघुकथा को जन समुदाय से जोड़ने का प्रयास किया है। देश - विदेश के साहित्यकारों का सहयोग अतुलनीय है। भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में और "अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के फेसबुक पेज पर आनलाइन आयोजित "हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन" के संयोजक सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया। 

मुख्य अतिथि की भूमिका में योगेंद्रनाथ शुक्ल के अलावा, देश-विदेश के कुछ जाने-माने लघुकथाकार जैसे विभा रानी श्रीवास्तव, रामयतन यादव और कमल चोपड़ा जैसे देश के लब्ध प्रतिष्ठित लघुकथाकारों ने भी अपनी लघुकथा बांची।      

मुख्य अतिथि योगेंद्रनाथ शुक्ल (जो 7वें  दशक से लघुकथा लेखन में सक्रिय रहे हैं) ने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बातें साझा की। उन्होंने बताया कि " खलील जिब्रान पहले लघुकथाकार हैं, जिन्होंने विधिवत लघुकथा लेखन की शुरुआत की। लघुकथा के विषय में उनका कहना था कि -" लघुकथा का सृजन करना, समुद्र को अंजलि में भरने का काम है। और उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि - "हमें भरपूर अध्ययन करना चाहिए। तभी हम अच्छी लघुकथा  या कविता लिख सकते हैं।  उनके अनुसार लघुकथा की भाषा सहज और सरल होनी चाहिए, उसकी पहुंच आमजन तक होनी चाहिए। वरना लघुकथा का भी वही हश्र होगा जो कविताओं का हुआ है, उनके क्लिष्ट भाषा के कारण। 

इस आन लाइन लघुकथा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, लेखिका ऋचा वर्मा ने, लगभग पचीस लघुकथाकारों की पढ़ी गई लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी देते हुए कहा कि - "समकालीन लघुकथाओं में सकारात्मक सोच उभरकर सामने आ रही है, जो कुछ बेहतर करते हुए प्रगतिवादी है। कुछ लघुकथा, लघु कहानी जैसी है, इससे बचने की जरूरत है।" 

पठित लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी देते हुए उन्होंने कहा कि - " आज के कार्यक्रम में सबसे पहली प्रस्तुति विजय आनंद विजय (मुजफ्फरपुर) की लघुकथा 'नुमाइश' थी, जिसमें उन्होंने एक व्यक्ति को अपनी होने वाली बहू को किसी भी तरह के कपड़े पहनने की अनुमति देने की बात कही है, यह समाज में होने वाले परिवर्तन की ओर इशारा करती है कि अब लोग बहू के रूप में कोई नुमाइश करने वाली लड़की की खोज नहीं कर रहे हैं। 

दूसरी प्रस्तुति संजय कुमार अविनाश (लक्खीसराय ) की 'एफ आई आर' जिसमें सिस्टम की खामियों और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार किया गया है। सविता मिश्रा मागधी (बेंगलुरु) की रचना 'लोरी' जिसमें एक  मां कोरोना के कारण अपने मरे हुए बेटे को देख कर उसे सोया हुआ समझती है और इसी विक्षिप्तता की अवस्था में सड़क पर आकर लोरी सुनाती है, क्योंकि उसकी बहू के वर्क फ्रॉम होम में बाधा ना पड़े। विनोद प्रसाद (खगौल) की रचना 'पश्चाताप' जिसमें किसी के बहकावे में आकर एक महिला किसी डॉक्टर को पत्थर मारती है, बाद में वही डॉ उस कोरोना संक्रमित महिला का इलाज कर उसे ठीक भी कर देता है। यह धर्म के आधार पर भेदभाव न करने का संदेश देती हुई लघुकथा है। 

डाॅ योगेंद्रनाथ शुक्ल (इंदौर) की लघुकथा 'बेचारी तख्तियां' इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि कैसे किसी भी किसी बड़े साहित्यकार का फोटो हिंदी दिवस के दिन बस एक दिन के लिए सम्मान पाता है और उसके बाद उसे कोई नहीं पूछता। प्रियंका त्रिवेदी (बक्सर) की लघुकथा 'स्वार्थ "' बताती है कि जिस बाप को पेंशन नहीं मिलता उसकी जिंदगी का कोई महत्व नहीं रहता। पूनम सिन्हा श्रेयसी की लघुकथा 'शिकारी' सोशल मीडिया पर फैले झूठ, व्यभिचार और  दोस्ती के नाम पर महिलाओं के शोषण पर प्रकाश डालती है। संतोष गर्ग(चंडीगढ़) की लघुकथा  'छोटी सी बात' हमें अपने माता-पिता को समय देने के लिए प्रेरित करती है। नरेंद्र कौर छाबड़ा (म प्र) की 'पतंग' यह बताती है कि हमें बुजुर्गों को भी अपने खेल-कूद और मनोरंजन में भाग लेने का अवसर देना चाहिए और साथ ही बुजुर्गों को भी अपने अपना आत्मविश्वास कायम रखना चाहिए। ऋचा वर्मा की लघुकथा 'विवशता' और राजप्रिया रानी की 'आजादी' स्वतंत्रता दिवस पर जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए  उनके द्वारा द्वारा  झंडे बेचे जाने पर सवाल उठाती है। 

सिद्धेश्वर की लघुकथा 'अंधी दौड़' में साहित्य में पुरस्कारों को रेवड़ी की तरह बांटे जाने पर व्यंगात्मक रूप में एक सवाल उठाती है। मीना कुमारी परिहार अपनी रचना द्वारा 'पावनी' की प्रतिभा को सामने लाने की बात करती हैं  बजाय इसके कि पावनी के घर वाले ऐसा नहीं चाहते। प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र की लघुकथा 'अकेला कमरा' जिसे हम लघु नाटिका भी कह सकते हैं बहुत ही अच्छी प्रस्तुति और बहुत ही अच्छे विषय को लेती है जो आज के  समाज और सरकार का बेहद प्रिय नारा है 'घर घर शौचालय' और 'कोई भी खुले में ना जाए' इस तरह वह मनोरंजन के साथ एक सुंदर सामाजिक और सरकारी संदेश भी दे देती हैं। विभा रानी श्रीवास्तव (अमेरिका) की लघुकथा 'एकांत का दंश' बुढ़ापे में किए गए पुनर्विवाह की पैरवी करती है। डाॅ सतीश राज पुष्करणा (बरेली) की लघुकथा "पत्नी की इच्छा" एक मनोवैज्ञानिक तथ्य को रेखांकित कर्ता है। प्रेमलता सिंह की 'बिछोह' एक बेटी के मन का संताप बताती है जो अपने बीमार पिता को पानी नहीं पिला सकी, क्योंकि डॉक्टर ने मना किया था, और वह पिता मर गये। कमल चोपड़ा (नई दिल्ली) की 'खेलने का दिन" बच्चों के 'खेलने के दिन' घर में बेकार पड़े खिलौनों को गरीब बच्चों में बांटने की बात की पैरवी करती है। और रामयतन यादव(फतुआ) की लघुकथा 'विधवा' यह बताती है कि एक बच्चे को *शराबी बाप* के साये से ज्यादा जरूरी है कि उसके जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हों, इसके लिए वह बच्चा बिना बाप का भी होना पसंद करता है। 

इस तरह कुल मिला कर यह गोष्ठी बहुत ही सफल और एतिहासिक रही। जिसमें ने - पुराने हर स्तर के रचनाकारों ने भाग लिया। हो सकता है किसी की रचना लघुकथा के मापदंडों पर खड़ी नहीं उतरी हो, पर प्रस्तुत किया गया और प्रयत्न करते करते  हो सकता है, कोई लघुकथाकार एक प्रिय लघुकथाकार के रूप में पाठकों के बीच में पसंद किया जाए।अपने प्रभावपूर्ण संचालन में, ऐसे सफल और यादगार आनलाइन अंतरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन के संयोजन के लिए, संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर जी धन्यवाद के पात्र हैं। 
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रपट के लेखक - ऋचा वर्मा
रपट-लेखक का ईमेल आईडी -
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी -editorbejodindia@gmail.com

                               ० ऋचा वर्मा (सचिव) /भारतीय युवा साहित्यकार परिषद (पटना) (मो:9234760365)

Wednesday, 19 August 2020

"विन्यास साहित्य मंच" के तत्वावधान में ऑनलाइन गीत गोष्ठी 16.8.2020 को सम्पन्न

कृत्य से अपने सदा निज राष्ट्र का गौरव बढाएं
 चेन्नै, दिल्ली, ग़ाज़ियाबाद और बिहार के प्रखर गीतकार शामिल
गीतों में गहरी संवेदना और मनुष्यता के प्रति पक्षधरता - भगवती प्र. द्विवेदी 

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पटना। “गीत लोगों को न सिर्फ संवेदनशील बनाने में सहायक होता है बल्कि समय-समय पर यह लोगों में जोश भी भरता है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान भी जो गीत रचे गए, उसने स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंकी. वर्तमान समय में भी गीतकार ऐसे गीतों की रचना कर रहे हैं, जो सिर्फ प्रेम की अभिव्यक्ति ही नहीं, वरन लोगों को अपने अधिकारों और राष्ट्र के प्रति जागरूक भी करते हैं. ”कुछ यही भाव विन्यास साहित्य मंच के तत्वावधान में रविवार 16 अगस्त को आयोजित गीत गोष्ठी में गीतकारों ने अपने गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया. 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ गीतकार और सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि “कविता अगर देह है, तो गीत उसकी आत्मा है। कविता यदि जिंदगी है, तो गीत उसकी धड़कन है । आज पठित अधिकांश गीतों में गहरी संवेदना और मनुष्यता के प्रति पक्षधरता परिलक्षित होती है।” 

करीब तीन घंटे तक चले इस कार्यक्रम का शुभारम्भ भागलपुर के गीतकार राजकुमार ने वाणी वंदना से किया। कार्यक्रम में देशभर के कई राज्यों से शामिल चर्चित गीतकारों ने राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत और प्रेम गीतों की प्रस्तुति दी। गीत गोष्ठी में गाज़ियाबाद से पीयूष कांति सक्सेना, गजरौला (उप्र) से सुविख्यात गीतकार एवं वरिष्ठ कवियित्री मधु चतुर्वेदी, मुंगेर से शिवनंदन सलिल, दिल्ली से शैल भदावरी, कुसुमलता कुसुम, बिहारशरीफ से अल्पना आनंद, पटना से आचार्य विजय गुंजन, मधुरेश नारायण, सुभद्रा वीरेंद्र, चंडीगढ़ से हरेंद्र सिन्हा, चेन्नई से ईश्वर करुण, समस्तीपुर से हरिनारायण सिंह 'हरि' और पूर्णिया से डॉ मंजुला उपाध्याय ने एक से बढ़कर एक गीत सुनाए। 

कार्यक्रम के अंत में पिछले दिनों दिवंगत तीन साहित्य विभूतियों  कैलाश झा किंकर,  मृदुला झा एवं शायर राहत इंदौरी के सम्मान में दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। गीत गोष्ठी का संचालन दिल्ली से युवा साहित्यकार चैतन्य चंदन ने तथा धन्यवाद ज्ञापन विन्यास साहित्य मंच के अध्यक्ष पटना के वरिष्ठ शायर घनश्याम ने किया। गूगल मीट ऐप्प के माध्यम से सम्पन्न इस कार्यक्रम में अंत तक दर्जनभर श्रोता जुड़े रहे और सुरीले गीतों का रसास्वादन करते रहे।

गीत गोष्ठी में गीतकारों द्वारा सुनाए गीतों की एक झलक प्रस्तुत है -

गीत गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पटना के वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने वर्तमान परिवेश पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा”
मुक्तछंदी इस नगर में गीत बंजर हो गया है
गाछ सूखे सर्जना-संवेदना के कौन सींचे, 
कंकरीटी फ्लैट में सहमे कबूतर आँख मींचे  
साँस खूँटी पर टँगी तन अस्थिपंजर हो गया है.

गाज़ियाबाद से कार्यक्रम में शिरकत कर रहे कवि और गीतकार पीयूष कांति ने राष्ट्र की आराधना कर निज गौरव बढ़ने की बात की -
हर घडी हम राष्ट्र की आराधना के गीत गाएं
कृत्य से अपने सदा निज राष्ट्र का गौरव बढाएं
मुंगेर के वरिष्ठ कवि शिवनंदन सलिल ने सुनाया:
सांझ होते ही नभ के सितारे जगे
कुछ हमारे लिए, कुछ तुम्हारे लिए

गीतकार मधु चतुर्वेदी ने अपने गीत के माध्यम से राष्ट्रहित में जीने-मरने की बात कही -
राष्ट्र आराधना, राष्ट्र की अर्चना, राष्ट्र की वंदना हम करें
राष्ट्र ही कर्म हो, राष्ट्र ही धर्म हो, राष्ट्रहित हम जिएं और मरें

समस्तीपुर से प्रसिद्ध कवि हरिनारायण सिंह ‘हरि’ ने अपने किसी प्रिय को याद करते हुए सुनाया -
जाने कितने आए कितने चले गए
मगर तुम्हारी याद सदा ही बनी रही
तुम ही मेरे मन में गहरे उतर सकी
मेरे मन की पीडाओं को कुतर सकी

दिल्ली से कवयित्री कुसुमलता ‘कुसुम’ ने प्रेम को परिभाषित करने में असमर्थता जताते हुए कहा -
प्रेम क्या है लिख सकूं मैं है नहीं सामर्थ्य मेरी
‘छंद-शब्दों में समेटूं है असंभव है असंभव
एक घट में हो भला कैसे समाहित प्रेम वैभव

पूर्णिया से कवियित्री डॉ. मंजुला उपाध्याय ने प्रेम में सुख-दुःख बांटने की बात कही:
आओ चलो हम लव-लव खेलें
सुख बाँटें और दुःख सब ले लें

चेन्नई से कार्यक्रम में शिरकत कर रहे गीतकार और कवि ईश्वर करुण ने भारत देश को विश्व का सिरमौर बताया -
विश्व की संस्कृति का जो सिरमौर है
मुल्क ऐसा जहाँ में कहाँ और है
ये उठाता है गिरते हुओं को
पोंछता है दुखी आंसुओं को
इसकी रहमत से वाकिफ हरेक दौर है

भागलपुर से गीतकार राजकुमार ने एक दीपक के संघर्ष को चित्रित करते हुए कहा -
दीप हूँ मैं, जला हूँ जला आ रहा
जल रही अनबुझी मौन तनहाइयाँ
सिलसिला जूझने का रहा स्याह से
घन घिरे मौत ले लाख अंगड़ाइयाँ

पटना से वरिष्ठ गीतकार आचार्य विजय गुंजन ने गीत के बोल को पुकारा -
आ जा मेरे पास गीत के बोल
अमिय-कण पोर-पोर में घोल
कई दिन बीत गए हैं ...

दिल्ली से गोष्ठी में शिरकर कर रहे हिंदी गौरव संस्था के संस्थापक कवि शैल भदावरी ने अपने गीत से इतिहास बदलने के तरीके को बताया -
ईर्ष्या भरे प्रयास करोगे,सिर्फ कयास बदल पाओगे|
तन के बदलावों में उलझे,सिर्फ लिवास बदल पाओगे|
कथनी, करनी, सत्य मिलाकर, दृढ़ता संग विश्वास लिये, 
खून पसीना एक करोगे, तब इतिहास बदल पाओगे|

पटना से कवि और गीतकार मधुरेश नारायण ने अपने गीत के माध्यम से मानव जीवन को अनमोल बताया -
ये मानव जीवन कितना अनमोल है,तुम इसे यूँ न जाया करो
जो मिला है तुमहें,ये तो रब की दुआ इसे दिल से लगाया करो।
कभी किसी का वक्त यहाँ एक सा न रहा, जाते हुए लम्हों ने कानों में ये कहा।

चंडीगढ़ से कवि हरेन्द्र सिन्हा ने सपनों में अमृत घोलने की बात कही:
यह जीवन है अनमोल सखी, मीठे मीठे तू बोल सखी 
मैं जीवन गीत सुनाता हूं,  सपनों की बात बताता हूं ।
सपनों में तू अमृत घोल सखी, मीठे मीठे तू बोल सखी।

बिहारशरीफ से युवा कवियित्री अल्पना आनंद ने अपने गीत में देश के लिए शहादत की बात की -
खून से लथपथ इस धरती को फिर से हरा कर जाना
देश तकेगा राह तुम्हारी लौट के जल्दी आना।
पाना अगला जन्म तो फिर इस धरती पर ही पाना
देश तकेगा राह तुम्हारी लौट के जल्दी आना।

पटना से गीतकार सुभद्रा वीरेंद्र ने विरह की वेदना को गीत में पिरोते हुए कहा -
तुमसे बिछड़ के हम बहुत रोये
छलका रहा मौसम बहुत रोये।

इस तरह से यह देशभक्ति गीत पर आधारित यह विशेष कार्यक्रम देशभक्ति का अलख जगाते हुए एक अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में सम्पन्न हुआ।
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रपट की प्रस्तुति - चैतन्य चंदन
प्रस्तोता का ईमेल आईडी - luckychaitanya@gmail.com
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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच द्वार 15.8.2020 को कवि सम्मेलन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न

विश्व शीर्ष पर सदा भारत विराजमान रहेगा

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मुम्बई अग्निशिखा के जश्न-ए-आजादी पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम राष्ट्रभक्ति से रंगा हुआ रहा. मुख्य अतिथि श्रीराम राय, समारोह अध्यक्ष हरिप्रसाद शर्मा, विशिष्ट अतिथि  आशा जाकड और डॉ रश्मिनायर थीं.

संरस्वती वंदना पद्माक्षी शुक्ला व शोभारानी तिवारी ने की. मंच संचालन - डॉ अलका पाण्डेय, चंदेल साहिब, डॉ प्रतिभा परासर, विजेन्द्र मेव, सुरेश हेगड़े ने दो सत्रों में किया. ऑनलाइन इस कार्यक्रम के बारे में मंच की अध्यक्ष अलका पाण्डेय ने बताया की सबको तिंरगे के साथ रख कर काव्य पाठ व नृत्य या "74 वर्ष आजादी के बाद क्या खोया क्या पाया" पर मत देना था.

आठवीं क्लास की आद्रिका शर्मा ने सुदंर काव्यपाठ किया आबूदबी से शेखर तिवारी. मलेशिया से गुरविन्द्र गील यूएस से पूर्णिमा ने राष्ट्र ध्वाजा को सलामी दे देश को याद किया. ऐसा लग रहा था कि हम घर पर  ही वास्तविक कार्यक्रम का आन्नद ले रहे थे. पाँच घंटे कार्यक्रम चला सबने बहुत आनंद लिया देश भर के 90 लोगों ने भाग लिया.

मीना पराशर व रश्मि शुक्ला रानी अग्रवाल, सुषमा शुक्ला, अलका पाण्डेय ने नृत्य प्रस्तुत किया तो ढोलक थाप पर गोवर्धन लाल बंघेल  ने और गीत गया पूरी तरह तिंरगे की तरह बनकर  शुभा शुक्ला, साधना तोमर और गीता पाडेंय ने.

पढ़ी गई रचनाओं की एक झलक प्रस्तुत है - 

जागृति वशिष्ठ देहरादून - 
मगर न भूलो ये, 
इस आजादी में शहीदों की शहादत शामिल
न जाने कितनी मां के लालो का लहू शामिल

शुभा शुक्ला निशा, रायपुर, छत्तीसगढ़ - 
पंछी है बोल पाए कब
दर्द उसका है वहां ।

शेखर तिवारी -
ऐ वतन वतन मेरे आबाद रहे तू
मैं जहां रहूं जहां में याद रहे तू

स्मिता धीरसरिया, बरपेटा -
सफ़ेद शांति का धागा पहनूं
प्रेम का सुरमा लगाऊं
हरियाली की चादर ओढ़
 अमन शांति सबको सिखाऊं

पद्माक्षी शुक्ल -
हर आहट पे मां राह देख रही
सूनी गलियां अश्रु से, भिगोती रही,

ज्योति भाष्कर 'ज्योतिर्गमय', सहरसा (बिहार) -
हे पूज्य जननी, हे जन्मभूमि भारत
पतित-पावन-पुष्पित तेरे चरण हैं!
अमर-अतुल-अमिट इति आलोकित
लक्ष-लक्ष, कोटि-कोटि तुझे नमन है!
    
मीरा भार्गव सुदर्शना -
आजादी का जश्न मनाओ,  गीत शहीदों के गाओ ।
याद करो उन बलिदानों को,  वीरों को शीश नवाओ ।

मीना गोपाल त्रिपाठी -
देश की अस्मिता पर अब न कोई आंच होगी
विश्व शीर्ष पर सदा भारत विराजमान रहेगा
न जाएगा व्यर्थ अमर सपूतों का बलिदान
सदा अमर ये मेरा हिंदुस्तान रहेगा...
बात करें जो इतिहास के पन्नों की,
तो लहू से लिखे हुए दिखते हैं।
आजादी के संघर्ष को बयां करते,
अश्रु आँखों में नहीं टिकते हैं

सुनीता चौहान हिमाचल प्रदेश 
जांबाज सिपाही बंदूक तान
 देश की रक्षा कर रहे
भेज रही बहना रक्षा सूत्र
माथे चंदन टीका लगाया
भाई की सुरक्षा करे देश की रक्षा

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया" इंदौर मध्यप्रदेश -
तिरंगे में लिपट आए जो वीर
वह देश की शान है

सुरेश हेंगडे -
मै कारगिल पर लिख नही  पाया कविता
नहीं दे सका जवानों को शाबशी!

डाॅ.पुष्पा गुप्ता, मुजफ्फरपुर बिहार -
हे भारत के वीर सपूतों, तेरे ही कारण
आजाद है वतन 
भारत माँ के रणबांकुरे शत-शत तुम्हें नमन ...

रागिनी मित्तल, कटनी, मध्यप्रदेश -
1947 की वो आजादी याद है
भारत किन मूल्यों पर स्वतंत्र हुआ
 हमको बर्बादी याद है।

डा. महताब आज़ाद -
मेरे दिल पूरा यह अरमान हो
प्यारा तिरंगा मेरे कफन की शान हो!

जहा देश प्रेम की भावना हो,
अपने झंडे के प्रति सम्मान हो,
अपने देश के नियम कायदे कानून का पालन हो
अपने नागरिकों,बुजुर्गो के प्रति सदभावना हो,

संजय कुमार मालवी (आदर्श) -
,शहादत देने वालों की,
खून पसीना बहाने वालो की,
आजादी का सच्चा सम्मान,
तभी होगा उनका सार्थक बलिदान
*जय हिंद , जय भारत , वन्देमातरम
यह सबका अभिमान है
हा तभी होगा उनका सार्थक बलिदान ।

इसमें भाग लेनेवाले अन्य प्रतिभागी थे -शकुन्तला, वैष्णव खत्री, जनार्दन शर्मा, छगनराव, शरद नारायण खरे,  उपेन्द्र अजनवी, संजय माववी ने अंजूल कंसल सुनिता चौहान, मंजूला वर्मा, निक्की शर्मा, वंदना शर्मा, सुनिता अग्रवाल, मुन्नी गर्ग, विजया बाली, सिमा निगम, अर्चना पाडेंय, पदमा तिवारी अंजली तिवारी, रजनी अग्रवाल, लीला कृपलानी, ममता तिवारी, रानी नांरग, देवेन्द्र कौर, दिनेश मिश्रा आनंद जैन, ओमप्रकाश पांडेय, रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, निलम खरे प्रेरणा सेन्द्रे, रेखा पाडेंय, मनोज बरनवाल, सुरेन्द्र परमार, ज्योति  ज्यतिगर्मय भाष्कर, अनिता झा, द्रोपदी साहू, रविशंकर कोलते, सुरेंद्र कुमार जोशी, रवि नारायण,डॉ अविनाशी, मीरा भार्गव किरण जागृति वशिष्ठ देहरादूनग, सिमा दुबे, रागनि मित्तल 7मीना गोपाल त्रिपाठी,  अनुपपुर (मध्यप्रदेश)  अरविंद कुमार, सुपौल बिहार  डॉ जनार्दन सिंह नीलम पाण्डेय गोरखपुर  ज्ञानेश कुमार मिश्र अजमेर  प्रतिभा द्विवेदी मुस्कान सागर, डाॅ0 उषा पाण्डेय, माधवी अग्रवाल आगरा, डॉ ज्योत्सना सिंह लखनऊ, अर्चना पाठक, पुष्पा गुप्ता, चंदा डागी अंकिता सिंहा सुनिल दत्त मिश्रा , ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी,, अश्मजा प्रियदर्शनी, डॉ महताब अहमद, ओजेन्द्र तिवारी , शोभा किरण,  विजय कान्त द्विवेदी आदि जिन्होंने बहुत  अच्छा प्रदर्शन किया. सभी ने घर बैठ कर आज़ादी का पर्व मनाया.
......

रपट की प्रस्तुति-  डॉ अलका पाण्डेय (मुम्बई)
प्रस्तोता का परिचय - अध्यक्ष- अ. भा, अग्निशिखा मंच
प्रस्तोता का ईमेल आईडी - alkapandey74@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com




Saturday, 15 August 2020

ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा / कवि - अर्जुन प्रभात

गीत
 
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    ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।
    तेरा हरेक कण है प्राणों से हमको प्यारा ।।

     नगपति मुकुट तुम्हारा तेरी छटा निराली 
      फल  फूल  से  लदी  है  तेरी  हरेक  डाली 
     लगता कुशल करों ने तेरे रूप को संवारा  ।
     ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।

       नित शस्य श्यामला है तेरी तमाम धरती 
       सरिता प्रवाह द्वारा यशगान तेरा करती 
       पग को पखारती है सागर की शुभ्र धारा ।
       ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।

         तेरी पूरी श्रृंगेरी, मथुरा, गया अयोध्या 
         अजमेर, स्वर्णमंदिर सब में तुम्हारी माया 
         कन्याकुमारी तेरी, कश्मीर भी तुम्हारा ।
        ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।

        उत्तुंग  शीर्ष  तेरा  उदात्त  सा  हृदय  है
      ममता की छाँव तेरी जग को न कोई भय है
       हारे थके पथिक को, मिलता यहीं सहारा ।
       ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।

     तू सभ्यता की जननी, तू संस्कृति की माता 
      तुझ से जुड़ा है जग का सदियों से नेह नाता 
      इंसानियत के तूने नव रूप को निखारा ।
     ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।

      क्षमता क्षमा दया का तुझमें अनोखा संगम
     महिमा तुम्हारी गाएँ शब्दों की शक्ति है कम
     हो जन्म जग में लेना, जन्में यहीं दुबारा ।
     ऐ जन्मभूमि तुमको सादर नमन हमारा ।।
...
कवि- अर्जुन प्रभात
कवि का ईमेल आईडी - arjunprabhat1960@gmail.com
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कवि - अर्जुन प्रभात

Tuesday, 4 August 2020

आईटीएम काव्योत्सव का नौवाँ वार्षिकोत्सव 2.8.2020 को व्हाट्सएप्प ग्रुप में सम्पन्न

नौ बरस पूरे होने पर काव्योत्सव कर रहा अभिनंदन

( FB+ Bejod  -हर 12 घंटे पर देखिए / ब्लॉग में शामिल हों- यहाँ क्लिक कीजिए  / यहाँ कमेंट कीजिए)





बरसों पहले साहित्य जगत में सुंदर एक फूल खिलाया था
सकल समाज की सेवा करने का मन में उद्देश्य बनाया था। 
वही फूल अब विकसित होकर आगे बढ़ता जाता है
अपने सौरभ से धरती के हर कोने में खुशबू फैलाता है। 
भारत भूषण शारदा के इन शब्दों में आईटीएम के नौ वर्षों की गौरव गाथा का सारांश है। इतना आसान नहीं होता नौ वर्षों के लम्बे अंतराल में इतनी सुव्यवस्थित ढंग से विशाल संख्या में इतने उत्तम कवि-कवयित्रियों को लेकर इतने प्रेम और मिल्लत के साथ काव्योत्सव करते चले जाना और वह भी हर महीने । पढ़ी जानेवाली रचनाओं का स्तर सामान्य से काफी ऊंचा रखनेवाले और हर विचारधारा के लोगों के लिए मंच खुला रखनेवाले इस काव्योत्सव के पीछे मूल संकल्पना और संयोजन एक उम्रदराज किन्तु समत्कारी व्यक्तित्व वाले कवि विजय भटनागर की सर्वप्रमुख भूमिका रही है। इन्हें सहयोग देनेवाले भी असाधारण रूप से क्षमतावान जीवट प्राणी हैं जिनमें अनिल पुरबा, विश्वम्भर दयाल तिवारी, सेवा सदन प्रसाद, सतीश शुक्ल आदि प्रमुख रहे हैं। स्त्री पक्ष से उतना ही सशक्त समर्थन इन्हें प्राप्त है जिनमें माधवी कपूर (अध्यक्ष), वंदना श्रीवास्तव आदि शामिल हैं। निश्चित रूप से नवी मुंबई की यह अनूठी साहित्यिक संस्था बधाई की पात्र है । 

दिनांक 2.8.2020 को नवी मुम्बई की सबसे सक्रिय काव्य संस्था का यह स्थापना दिवस होने के कारण  विशेष कवि गोष्ठी ऑनलाइन मनाई गई जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध लघुकथाकार सेवा सदन प्रसाद ने की. कुल सैंतीस लोगों ने रचनाएँ पढ़ी. इस गोष्ठी के सफल निर्वहन में इसके प्रमुख संस्थापक सदस्य विजय भटनागर और कार्यक्रम प्रबंधक अनिल पुरबा जी का प्रमुख योगोदान रहा । 

इस वार्षिकोत्सव के अवसर पर कुछ चुने गए साहित्याकारों को उनकी विशिष्ट सेवाओं हेतु साहित्यिक गौरव पत्र देकर सम्मानित भी किया गया। सम्मानित होने वाले साहित्यकार हैं - किशन तिवारी, विश्वम्भर दयाल तिवारी, सेवा सदन प्रसाद, अनिल पुरबा,  हेमन्त दास 'हिम' एवं  प्रकाश चन्द्र झा।

पढ़ी गई रचनाओं की झलक नीचे प्रस्तुत है- 

अनिल पुरबा / महाकुंभ -
काव्योत्सव का यह हमारा महाकुटुंब, 
है, शायरों और कवियों का महाकुंभ  I
माधवी माँ का आशीर्वाद, जानकी मैय्या का प्यार, 
लगता कवियों का मेला, हर माह के पहले रविवार I
दिपालीजी की हंसी ठिठोली, प्रमिलाजी की अद्भुत ब्रजबोली, 
विजयाजी ने झूठ की पोल खोली, चन्द्रिका जी की मृदु बोली, 
भर देती हम सबकी, खुशियों से झोली I
भारत के हम भूषण, सत्य का ऊजला प्रकाश, 
इनकी भावनाओं से ना होते, कभी हम निराश  I
रामेश्वर, राम प्रकाश, सतीश, शामिल होते सारे इश, 
विशम्बर जी की प्रगाढ़ भाषा, कहती नित विशेष I 
गौतम जी का अंदाज़ अनुपम, अनिल के अंदाज़ में दम-ख़म,  
सेवा सदन जी के अंदाज़ में भरा जोश, हेमंत का तकनिकी जुलूस I
मधु श्रृंगी जी का अनोखा अंदाज़, है कलम की वे सिपहसालार, 
वंदना जी का कोई नहीं सानी, करती शब्दरूपी तीखा वार,
अशोक, विजयकांत, ओम प्रकाश भी अब तो आते, 
रचनायें अपनी नयी-नवेली पढ़कर हमे सुनातेI
निरुपमा जी के काव्य-पाठ में अनूठा एहसास, 
राम स्वरुप जी की प्रस्तुति में विशेष उल्हास I
अलकाजी की रचनाओं में होता सामाजिक संदेश, 
कुमकुम जी की रचनाओं में ज्ञान का समावेश I
दिलीप भाई, नज़र, त्रिलोचन, दिलशाद, चारों शायरी के उस्ताद, 
ग़ज़ल, शेर, और मिसरे, करते मीठी उर्दू को जिंदाबाद  I
अधिकारी जी कराते अध्यात्म का आभास,
पुरषोत्तम जी की रचना में होता विश्वास I
प्रकाश चन्द्र  कराते मुद्दों पर गौर, विमल का अपना अलग ठौर, 
कटु सच कहते हमेशा ही, बुरा लगे तो बदल दो अपना तौर I
विविध विचार, विभिन्न उचार, कभी कल्पनाओं की नयी उड़ान, 
शब्दों के कैनवास पर, साधते इन्द्रधनुष से रंगीन बाण I
गीत, कविता, दोहे, ग़ज़लों का छलकता नया रंग, 
विचारों और विचारधाराओं का होता काव्योत्सव में संग I
श्रोताओं की कमी तो है, पर ना गिला, ना शिकवा ना नुक्सान, 
क्योंकि किशन तिवारी जी के रूप में, स्वयं आ जाते भगवान्  I
सरस्वती माँ से है आग्रह, शारदा माँ से है बिनती, 
फले फुले हमारा महाकुटुंब, हो काव्योत्सव की उन्नति I
साहित्य की सेवा हेतु, शब्दों की फसल बोई, 
किस के अथक प्रयास से, जीत हमारी हुई  
मित्रों इस अपार सफलता का किसे दें हम श्रेय, 
एक ही नाम है, विजय, विजय, विजय I
......

भारत भूषण शारदा  - 
(काव्य उत्सव की नोवी वर्षगांठ पर)
बरसों पहले साहित्य जगत में सुंदर एक फूल खिलाया था,
सकल समाज की सेवा करने का मन में उद्देश्य बनाया था। 
वही फूल अब विकसित होकर आगे बढ़ता जाता है,
अपने सौरभ से धरती के हर कोने में खुशबू फैलाता है। 
कभी ना हिम्मत हारी इसने आगे ही आगे कदम बढ़ाया,
हर बाधा से हर मुश्किल से साहस से बढ़कर टकराया। 
भटनागर जी की सकल साधना माधवी जी का शुभ आशीष,
मानो मिलकर आज कह रहे कृपा करें सब पर जगदीश। 
नौ बरस पूरे होने पर काव्योत्सव कर रहा अभिनंदन,
हर चेहरे पर खुशियां दमके रहे महकता जीवन उपवन।
.....

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
● बिन भय जीवन कब रहे ,
जग से कब मिटे व्याधि ।
ईश्वर की ही कृपा वश ,
सुख वर्षा गृह साधि ।।
● माँ वाणी की वन्दना , राष्ट्रगान जयघोष ।
मधु श्रँगी स्वर साधना ,
भारत भूषण जोश ।। 
● अनिल बहाए मन महक ,
विजय संगठन शक्ति ।
पथ पर सत्य प्रकाश है ,
साथ नीति गुण युक्ति ।।
● सेवा सदन अध्यक्ष पद ,
करें सुशोभित आज ।
एक कुटुम्ब हैं साथ सब ,
रचना सुधि सिर ताज ।।
 ● शमर विमल पुरुषोत्तम , 
कुमकुम वेद सेन ।
उन्हें बधाई जन्म दिन ,
भगवद्कृपा सुदेन ।।
● सैंतीस रचनाएँ पढ़ें ,
कवि कवयित्री साथ ।
नेह भाव आदर लिए ,
पर न मिल रहे हाथ ।।
 ● रचनाएँ प्रेषित सकल ,
उत्तम प्रकृति विचार ।
आभासी संगोष्ठी ,
कोशिश दमन विकार ।।
● हटे व्याधि बैरी हटें ,
बरसें बादल नीर ।
मिटे प्रदूषण *विश्व* से
जीवन रहे सुधीर ।।
● धन्य भूमि माँ भारती ,
धन्य देह परमार्थ । 
सेवा निष्ठा प्रेम धन ,
धन्य प्रकृति सत्यार्थ ।।
...

दिलीप ठक्कर "दिलदार" -
वो मेरा हमसफ़र जिस रोज़ मेरे साथ हो लेगा,
हमारे दरमियां जो राज़ है हर राज़ खोलेगा!
हमारा फैसला इंसाफ के पलड़े में तोलेगा,
फिर उसके बाद जो बोलेगा वो हक बात बोलेगा!
मेरे गम को हमेशा ही वो अपना गम समझता है,
मेरे आंसू जो देखे गा तो मेरे साथ रो लेगा!
नहीं आता मुझे गैरों की थाली पे नज़र रखना,
किसी के माल पे 'दिलदार'क्या ईमान डोलेगा!
.....

किशन तिवारी भोपाल  -
बहुत बेचैन हूँ मैं आजकल अच्छा नहीं लगता
कठिन ही ठीक है जीवन सरल अच्छा नहीं लगता 
घरों के साथ सन्नाटे शहर में भी चले आए 
इन्हें डर हादसों का कोई पल अच्छा नहीं लगता 
नदी सूखी है जलती रेत जंगल कट गए सारे 
है मृगतृष्णा कहाँ से लाएँ जल अच्छा नहीं लगता 
कभी बस्ती कभी जंगल चले हम बन के बंजारे 
तुम्हारा प्यार तुम रक्खो ये छल अच्छा नहीं लगता 
किशन तिवारी भोपाल
.......

विजय भटनागर - 
अपने जीवन की डोर 
खींचो तुम मन कीओर।
कट जायेगे कष्ट तिहारे 
नही मचेगा मन मे शोर।
विजय जबये रचना सुनाए
श्रोता कह उठे वन्स मोर।
.....

हेमन्त दास 'हिम' - 
दोस्तों की महफ़िल में 'हिम'आइये जाइये
पर कानून हाथ में लेनेवालों को न बचाइए
जात पर, धर्म पर देश को, समाज को
जो बांटे उनकी तरफदारी में कभी न जाइये
इतिहास में जुल्म हुए औरत, दलित, धर्म पर
बदला न लेकर समानता को ही लागू कराइये

हनीफ मोहम्मद -
खुद को खुद  से मैं ने जब जोड़ दिया
मुकम्मल हुई बेखुदी कलम जब तोड़ दिया
हर परवेज हो यादगार  जरूरी तो नहीं
हर याद को  पीछे  सनम के कब छोड़ दिया।
खुद को खुद से मैं ने जब जोड़ दिया। ।
........

रजनी साहू "सुधा" -
जलराशि को धरती पर 
नुपूर बाँधकर नाचती देखती हूँ
तब मैं भी मयूर बनकर
नृत्य करना चाहती हूँ
........

सत्यप्रकाश श्रीवास्तव -
पूजा काल में पूजा करें,
कर धारण मन श्री राम।
स्वप्न पूर्ण होंगे सभी के,
जो हों दिल में भाव निष्काम
......

कुमकुम वेद सेन -
देखते देखते
बेटी से बहू बन गई
मां से दादी नानी बनी
बना अनुभवों का एक अनोखा सफर
हर सुबह एक
नया रंग है जीवन का
कई सपने हुए नहीं पूरे
बिन चाहे मिले नए सपने
.......

शमर देवबन्दी 'जुगाड़' / अनुवाद : विश्वम्भर दयाल तिवारी -
हम जो सरसों को हथेली पे जमाने लग जायें 
आप सोचें भी जो ऐसा तो ज़माने लग जायें ।
भेद खुल जायेंगे सब दूधिया पोशाकों के 
हम भी अगर लोगों पे दाग लगाने लग जायें ।
बे गहरी दर बदरी बे सरो सामानी है 
शायरी छोड़ के कुछ पैसे कमाने लग जायें ।
सोच के सोते हैं कि सुबह को जब आँख खुले 
खाली हाथों में किसी रोज खजाने लग जायें ।
वो तो शायर भी गायक भी अदाकार भी हैं 
भैरवी बोलें तो मल्हार सुनाने लग जायें ।
दोस्तों ने तो बजाया है ले तबला अपना 
और दुश्मन भी अगर ढोल बजाने लग जायें ।
....

शोभना ठक्कर -
मैं चूप हुं गुमसुम ये शमाँ है 
उसकी भी खामोश ज़ुबाँ है
तुम गम से बेजान हुए हो
तो मुझमे भी जान कहाँ है
चूमा था कभी प्यार से तुमने
हर गुल पे वो अब भी निशां है
अम्न का घर-द्वार जिसे कहिए
वो तो मेरा हिन्दुस्ताँ है
पाइ हुँ तहजीब जहाँ से
वो मक्तबो मेरी माँ है
"शोभना" जाने उसको पता है 
कौन छुपा है कौन अयाँ है।
....

डॉ. रामस्वरुप साहू 'स्वरुप, कल्याण मुंबई -
भाई बहन का प्यार अनोखा रक्षाबंधन।
माथे तिलक लगा भाई के करती अभिनंदन,
आजीवन रक्षा वृत्त वरदान अभय पाती है।
प्रेम उमड़ता आंखों से गले लग जाती।
पवित्र खून का रिश्ता अभिनव भव बंधन।
स्नेह भरा पूजा आराधना सुरभित चंदन।
सुखी रहे परिवार सदैव आशीष बहना का,
जीवन की सौगात अनोखा रक्षाबंधन।
जब कलाई पर सजते कच्चे प्रेम के धागे,
जन्मों की मुराद पूरी होती है बिन मांगे।
आनंद विभोर हृदय कमल खिल जाते।
कुसुमित स्नेह लता, महके नंद नंदन।
......                                                                                              
प्रकाश चंद्र झा -
या फिर गुल्ली- डंडे का खेल|
पेड़  से   कूद तालाब नहाते,
तोड़ते  अमिया  मार  गुलेल|
होली,   दिवाली,  ईद, मुहर्रम,
और  भी  कितने तीज त्योहार||
मिलजुल   कर सब मनाते ऐसे,
जैसे  पूरा  गाँव  हो एक परिवार||
....

चंद्रिका व्यास, खारघर नवी मुंबई -
भाई होने का
फर्ज वह निभाता है !
सरहद पर जब भाई होता 
 राखी भेजती चिट्ठी में
मेरी उम्र तुझे लग जाये भैया
ऐसा वरदान ईश्वर से वह लेती !
कोरोना  की दूरी  में भी
रेशम के कच्चे धागों से
सदा बंधा रहे भाई बहन का प्यार
   राखी धागों का त्यौहार 
   राखी धागों का त्यौहार !
   ....

विजयकान्त द्विवेदी -
 दिवस का मार्तण्ड नहीं
किन्तु अभी" उजास " है।
है अभी लोहित  गगन
व्योम में भरा प्रकाश  है।।१!
प्रेम के पावन पंथ पर
है खड़ी वह  द्वार मेरे !!
समर्पिता, अनुरागिनी
है उसे ,जज्बात घेरे ।‌।२!
....

पुरुषोत्तम चौधरी 'उत्तम', मुम्बई -
    जिन्दगी किस क़दर बे-वफ़ा हो गई 
    हर खुशी आजकल  बेमजा हो गई ।
    तेरे पहलू में आकर बहुत शाद थे
    तुम ख़फ़ा हो गए जाँ कज़ा हो गई ।
    तिश्नगी लब पे है चश्म पुरआब है 
    जीस्त तेरे बिना इक  सजा हो गई ।
    इश्क बरहक़ है कैसे दिलाऊँ यकीं
    हक़ बयानी मिरी जब जफ़ा हो गई ।
.....

राम प्रकाश विश्वकर्मा, खारघर नवी मुंबई -
नेह की डोर से,
प्रीति के छोर से,
भावों की गांठ बांध,
मन की पतंग उड़ी। 
खींचो न रे, डोर खींचो न रे।। 
प्रियतम के गांव में,
तारों की छांव में, 
मधुबन में प्रेम के, 
अंसुवन की बेल चढ़ी।
सींचो न रे, और सींचो न रे।।
मन की उमंग पर, 
तन की तरंग पर, 
धड़कन की ताल पर, 
स्वर की पुकार बढ़ी। 
नाचो न रे, आज नाचो न रे।।  
हिरदय की पीर पर, 
नदिया के तीर पर, 
कल्पना के पृष्ठ पर, 
पाती सप्रीति लिखी। 
बांचो न रे, आज बांचो रे।।
....

डा० हरिदत्त गौतम "अमर" -
हम कितने सौभाग्यवान जो घड़ी दिव्य पाई
राम लला का मन्दिर बनता देता दिखलाई
पुरी अयोध्या दुलहिन जैसी सज धज इतराई
वाल्मीकि के श्लोक मुग्ध तुलसी की चौपाई
(भयंकर विवाद क बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय होने पर मंदिर निर्माण हो रहा है। इस विवाद के लम्बा खिंचते चले जाने से किसी पक्ष का कोई लाभ नहीं था अत: हम सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं,  साथ ही इस विवाद से सम्बंधित सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार मस्जिद का निर्माण भी होना है। अगर गौर से देखा जाय तो यह फैसला सामाजिक सौहार्द कायम रखने का प्रयास भी लगता है और एक हमेशा चलनेवाले विवाद को पूर्ण विराम दिया गया है जो कि एक अच्छी बात है। देश में आज आवश्यकता है और जैसा कि वर्तमान सरकार और पहले की सरकारें भी कहती रही हैं कि हमें धार्मिक विषयों की बजाय विकासात्मक मुद्दों जैसे -  गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य आदि पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।)
......

विमल  तिवारी, खारघर  नवी  मुंबई -
हुई शाम,  और हुआ आगमन कुछ प्यालों के सेट का,
खुला बॉक्स और चेहरा  चमका  माथा दमका सबका !
प्याले भी तब धन्य दिखे थे पावन  घर के  आँगन  में, 
कृतियां, प्रतिमा बन कर उभरें उन चमकीले भाजन में !
......

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई -
रक्षा बंधन का त्यौहार ,भाई बहन का प्यार ,
भाई बहन का वादा , रेशम का यें धागा !!
ख़ुशियाँ  लाए अपार , प्रेम सुत्र में जोड़े  !!
 राखी का अटूट बंधन , भाई बहन का रिश्ता ।। 
.......

ओमप्रकाश पाण्डेय -
( रक्षा बंधन के अवसर पर बहनों को समर्पित )
मै तो  आज भी हूं तुम सबका प्यारा भईया
मां बाबू के बाद तो  तुम सब  से ही मिला 
अधाह मधुर  प्यार जीवन भर मुझको
आज भी रखा है दिल में मेरे वे सब यादें
मेरी प्यारी बहना हो या  हो वो बड़की दीदी .......१
.....

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, कोपरखेराने, नवी मुंबई -
राखी के पवित्र त्योहार में,
यह काला कोरोना क्यो आया।
दूरियां बनाकर, मास्क पहनकर,
कोरोना को कैसे लताड़ भगाया।।
राखी..........................3
प्रकृति हमारी मित्र है सारी,
करेगी कोई चमत्कार यारा।
फिर खिल जायेगा पुष्प मनोहर,
कोरोना जायेगा थक ये सारा।।
राखी...........................

 इस तरह से अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में इस काव्य वार्षिकोत्सव का समापन हुआ। 






























Monday, 3 August 2020

रक्षाबंधन पर रचनाएँ / रचनाकार - अलका पाण्डेय और चन्देल साहिब

कविताएँ 

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रक्षाबंधन / डॉ  अलका पाण्डेय

रक्षा बंधन का पर्व है आया
कुमकुम अक्षत थाल सजाया
भाई को प्रेम से तिलक लगा
सबने मिलकर यह पर्व मनाया
रक्षा का अनमोल वादा पाया

भाई पर अटूट प्रेम बरसाये
बहनों के मन खूब हर्ष समाये
रक्षा की डोर कलाई में सजाई
बचपन का वो लड़ना झगड़ना
पुरानी यादों से मन हर्षाये

भाई बहन रिश्ता होता खास है
कोई फ़र्क़ नहीं दूर है या पास है
हृदय से जब एक दूजे से प्रेम हो
हर दिन ही होता फिर ख़ास है

घर आँगन में ख़ुशियाँ छाई
बहनें अक्षत, रोली, राखी, ले आई
सजी हुई थाली प्रेम की हाथो मे
अधरो पर मुस्कान सजाकर आई

ह्रदय गगरी ममता रस छलके
प्रीत डोर के प्यार में में बँधके
हरदम दूर रहे विपदाऐ
दुख न हो सुख के अंकुर फूटे

मस्तक चंदन तिलक लगाकर
रक्षा का अनमोल वादा पाकर
बहना की ख़ाली झोली भर जाएँ
 धूमधाम से यह पर्व मनाएँ.
...

कभी डांटे कभी मनाए / चन्देल साहिब

क़भी डांटे क़भी मनाए.
प्यार से जो गले लगाए,
बहन वही है।

रात को ज़ब नींद न आए
लोरी सुनाकर मुझे सुलाए
बहन वही है।

सुबह नींद से मुझको जगाए
कोमल हाथों से सर सहलाए
बहन वही है।

अपने हाथ की चाय पिलाए
पापा की डांट से भी बचाए
बहन वही है।

रक्षाबंधन पर मिलने आए
कलाई पर राख़ी सजाए
बहन वही है।

मस्तक पर तिलक लगाए
लड्डुअन का भोग लगाए
बहन वही है।

गिफ़्ट की आस न लगाए
मुझे ख़ुश देख ख़ुश हो जाए
बहन वही है।
...

रचनाकार - डॉ. अलका पाण्डेय, चन्देल साहिब
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कवयित्री - अलका पाण्डेय 

कवि चन्देल साहिब अपनी एक बहन के साथ

कवि चन्देल साहिब अपनी एक बहन के साथ

चित्र में एक कवि संजय कुमार संज अपनी बहन से राखी बंधवाते हुए