Tuesday, 9 June 2020

आईटीएम काव्योत्सव की 111 वीं गोष्ठी आभासी रूप में 7.6.2020 को खारघर (नवी मुंबई) में संपन्न

निर्धन किस्मत के मारों का नहीं कहीं भगवान?

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दिनांक 7.6.2020 को निर्धारित समय पर व्हात्सप्प ग्रुप में आईटी एम काव्योत्सव की आभासी कवि  गोष्ठी संपन्न हुई.  नवी मुंबई ही नहीं पूरे देश के विभिन्न प्रान्तों से अनेक जाने-माने प्रतिष्ठित कवि- कवयित्रियों और शायरों ने इसमें भाग लिया जिनकी कुल संख्या 36 के आसपास थी. इसकी अध्यक्षता की विश्वम्बर दयाल तिवारी ने और संचालन किया अनिल पुरबा ने. ध्यातव्य है कि इस काव्योत्सव के पिछले लगभग नौ सालों से चलते रहेने में इसके प्रमुख संयोजक विजय भटनागर की प्रमुख भूमिका है और इसके प्रमुख स्तंभों में ऊपर उल्लिखित सदस्यों के अलावा चन्दन अधिकारी, सेवा सदन प्रसाद, सतीश शुक्ल आदि प्रमुख हैं. 

सबसे पहले वंदना श्रीवास्तव ने अपने सुरीले कंठ से सस्वती बंदना प्रस्तुत की फिर भारत भूषण शारदा के नेतृत्व में सदस्यों ने अपने अपने घरों में एक ही समय में विधिवत पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय गान किया। ततपश्चात कवि गोष्ठी की कार्यवाही का शुभारंभ हुआ।

आईटीएम काव्योत्सव अपने अनुशासन के कठोर अनुपालन हेतु जाना जाता है जिसका  शेय  मुख्यतः विजय भटनागर सदृश दूरद्रष्टा संयोजक को तो जाता है है जो सदस्यों की राय लेकर न सिर्फ पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते हैं बल्कि पूरे कार्यक्रम के दौरान किसी नियम के टूटने पर तुरंत मोबाईल से फोन कर उस सदस्य को आगाह करते हैं. और सबसे गज़ब तो अनिल पुरबा का  धैर्य, सुह्रुदयता और अहम्  रहित व्यवहार है जो ऐसे आभासी कवि गोष्ठी को उस अनुशासन से लगभग पूरी सफलता के साथ संचालित करते हैं जैसा कि वास्तविक कवि सम्मलेन में होता है. जिन्हें बुलाया जाता  वही अपनी रचना पटल पर रखते फिर सारे सदस्य 'ताली' या अन्य आइकन द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त करते लेकिन प्रतिक्रिया में शब्द लिखने की अनुमति नहीं थी वरना यह गोष्ठी कभी दो घंटे के अन्दर संपन्न नहीं हो पाती.

भाग लेनेवाले सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं -
१)  श्री विजय भटनागर  
२)  श्री किशन तिवारी
३)  श्री विमल तिवारी
४)  श्री प्रकाश चन्द्र झा
५)  श्री भारत भूषण शारदा
६)  श्रीमती मधु श्रृंगी
७)  श्री विशम्बर दयाल तिवारी
८)  श्री पुरषोत्तम चौधरी
९)  श्री सेवा सदन प्रसाद
१०) श्रीमती चन्द्रिका व्यास
११) श्रीमती कुमकुम वेद्सैन ,
१२) श्री दिलीप ठक्कर
१३) श्रीमती शोबना ठक्कर
१४) श्री रामेश्वर गुप्ता
१५) श्रीमती वंदना श्रीवास्तव
१६) श्री हरी दत्त गौतम
१७) श्री विजयकांत दुबे
१८) श्री राम स्वरुप साहू 'स्वरुप'
१९) श्री अशोक वशिष्ट
२०) श्री अरविन्द श्रीवास्तव ‘असीम’
२१) श्रीमती निरुपमा शर्मा
२२) श्री ओम प्रकाश पाण्डेय
२३) श्री चन्दन अधिकारी
२४) श्री हेमंत दास 'हिम'
२५) श्री सतीश शुक्ल 
२६) श्रीमती दीपाली सक्सेना
२७) श्री रामप्रकाश विश्वकर्मा
२८) श्रीमती अलका पाण्डेय
२९) श्री सत्य प्रकाश श्रीवास्तव
३०) श्री उमेश 'राही'
३१) श्रीमती विजया वर्मा
३२) श्री अशोक प्रितमानी
३३) श्री समर भाई 'काविश'
३४) श्री हनिफ मौहम्मद 'हनिफ'
३५) श्री ओम प्रकाश पांडेय
३६) अनिल पुरबा 

अलग अलग कवियों द्वारा अलग अलग विषयों पर विभिन्न शैलियों की कवितायेँ पढ़ी गईं जिनमें गंभीर, श्रृंगार और हास्य प्रमुख रहे. पढ़ी गई कविताओं की एक झलक प्रस्तुत है - 

......
            
विमल तिवारी-
शीर्षक ---जीवन
करुणामयी जीवन को करुणामयी रखना।
विपदाओं से तो तुम हिम्मत से लडा़ करना
कर्तब्यों पर अपने तुम अथक बढे़ चलना।  -
करुणामयी ...
सूनी सूनी गलियां
मुसकाती हुईं कलियां
श्रृंगार प्रकृति का खुशियों की दिखीं लडियां
पुष्पों के सुगंधों से जग आनन्दमयी रखना।
करुणामयी ...
स्थितियां हुईं विपरीत
पर प्यार की बनी रही रीति
मन शांत रहे हर पल 
 जन जन की हो ये नीति
सदाचार की छांव मे तुम वाणी, कीर्तिमयी रखना।
करुणामयी ...
अब अनिल अनल नभ जल, सकल आनन्द भरे दिखते
वृक्षों के हर पत्ते स्रोत उमंग के बनते
तुम शीतल शशि सा बन
बन सुधामयी झरना।
करुणामयी ...
अब जिधर दृष्टि जाती मुझे पाप पुंज दिखते ,
टूटा है मन मेरा, टूटे हैं मेरे रिश्ते।
संकट की ये घडी_
यां, कुछ पल मे टल जायेंगी।
उदयकर तू भाव विमल, इसे ममतामयी रखना।
करुणामयी ...
…….........

मधु श्रृंगी -
कन्या भ्रूण-हत्या
जुल्म इतने क्यों मुझ पर तू ढाने लगी,
कौंख में ही तू मुझको मिटाने लगी ।
मेनें जीने के ख्वाब संजोए थे माँ ,
फिर क्यों मौत की आवाज़ आने लगी।।
तेरे गर्भ के कोने में छुपती हूं माँ,
मौत के डर से मरमर के जीती हूं माँ।
गर्भगृह की ये हलचल डराती मुझे,
मैया एसी क्यों साजिश रचाने लगी।।
मेनें जीने के-----------
मुझमें भी तो माँ सुन तेरा अंश है,
बेटियों से भी बढ़ता सदा वंश है।
तेरी मखमल सी गोदी मुझे चाहिए,
फिर क्यों शूलों की शैया बिछाने लगी।।
मेंने जीने के---------
मां तू कहती है बेटा ही अभिमान है,
कुल का दीपक व घर की वही शान है।
बेटी दो - दो कुलों का उजाला है माँ,
फिर क्यों नन्ही सी लौ को बुझाने लगी।।
मेंने जीने के---------
 ….........

रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
कोपरखेराने, नवी मुंबई ।।
शहरीकरण पर प्रहार।
कंक्रीट जंगल बनाकर,
प्रकृति से खिलवाड़ किया।
वातानुकूल घर में लगाकर,
ग्लोबल ताप बढा दिया।।
कंक्रीट..............1
संभल जाओ शहर वालों,
लौट चलो नहीं विनाश हुआ।
वायरस जो फैल गया,
यह शहर अब उजाड़ हुआ।।
कंक्रीट................ 2
बहुत हो गया अंध दौड़,
अब नया चमत्कार हुआ।
लौट चलो पुरानी दुनिया,
ये दुनिया से बिगाड़ हुआ।।
कंक्रीट.................. 3
पंछियों की चहक मधुवन,
फिर वही गुन्जार हुआ।
नये पल्लव खिला उपवन,
प्रकृति का संचार हुआ।।
कंक्रीट............…...... 4
......

निरूपमा शर्मा ( नवी मुंबई )
ऐ वतन
जला कर अंधेरे उजाले किए हैं,
अंधेरों के साये डराते नहीं हैं ।
राहों में तेरे सजदे किए हैं ,
मगर सर को मैंने झुकाया नहीं है।
हवाएँ हमारा रुख़ बदलेंगी कैसे ,
थपेड़े तूफ़ाँ के हमने सहे हैं ।
ऐ वतन तुझसे मोहब्बत है ऐसी ,
कि रिश्ते सभी तुझ पे क़ुर्बान किए हैं ।
तेरी आन हरदम रहे बस सलामत,
तमग़े गोलियों के सिने पर सिए हैं ।
याद आती है माँ  मुझे जब भी तेरी,
तिरंगे को तेरा आँचल किए हैं ।
..........

भारत  भूषण शारदा, 
कोपरखैराने
--मंजिल--
मै मंजिल तक जाऊँ कैसे,
कोई तो मेरे साथ नही!!
एक दीपक था बुझ गया अरे
वह भी तूफ़ानों मे पड़ कर,
रह गया अकेला केवल मै जीवन
झंझावातों से लड़कर!
इतना तो ज्ञात मुझे मंजिल है
दूर अभी तो दूर बहुत ही!
पथ वीहड़ है कंटक मय
दिखती कोई राह नही!!
मै मंजिल तक जाऊँ कैसे
जब कोई मेरे साथ नहीं!!
हर ओर दिखता तिमिर मुझे
उजियारे का हाथ नहीं!
मै मंजिल तक जाऊँ कैसे
जब कोई मेरे साथ नहीं!!
अनजान राह है मेरी और
पहचान किसी से ना मेरी!
तय करूँ राह को कैसे मै
हर ओर निराशा जब चेरी!!
हँस रही अकेला देख मुझे
क्या कहूँ दिशाएं भी सारी!
मै विजय चाहता हूँ पाना पर
हर आशा मेरी है हारी!
मै मांग सहारा रहा मगर
बढ़ता है कोई हाथ नहीं!!
मै मंजिल तक जाऊँ कैसे
जब कोई मेरे साथ नहीं!!
जब कोई मेरे साथ नहीं!!
.......

शोभना ठक्कर -
(आज़ाद नज्म )
चल इस शहर से दूर गाँव चले जाएँ
मिले सुकून  माॅ की गोद में
जा कर वही फिर बस जाएँ
चल इस शहर से,,,,,
बडी बडी बातें बडी इमारतें
बडी गाड़ी बडे बडे  वादे
चारो और रोशनी रोशनी
फिर भी घरमें अंधेरा हमारे
चल इस शहर से....
लिबासो के बीच छुपी रहती हैं
यहा अधूरी सी आशा पुरानी
मिलते है लोग लाखो दिन भर
पर लगते है सभी बेगाने से
चल इस शहर से ......
बेबसी लाचारी दिखती हैं हर और
चल रहा है पैसो का यहां हर दौर
देते नही लेना चाहते है यहा सभी
आदमी संग बिकता है ईमान यहां
चल इस शहर से ....
.....

ओमप्रकाश पांडेय -
गलतियां करने  का अपना ही मज़ा है...
कभी कभी अपनो से दिल
खोलकर बातें किया करो
बिना कोई बात हुए भी
खुल कर हंस लिया करो
जो तुम्हारी बेवजह हंसने
पर है हंसते , आज  हंसने दो उन्हें
गलतियां करने   का अपना ही मज़ा है ......१
जरूरी नहीं  हमेशा गम्भीर रहना
व हर बात को गंभीरता से लेना
कुछ बातें छोड़ दो औरों पर
उन्हें समझने व समझाने दो
वर्जनाओं को कर के किनारा
बिंदास होकर जियो अपनी  जिंदगी को
गलतियां करने का अपना ही मज़ा है ........२
बुद्धू बनकर भी कभी रहा करो 
होकर बेफिक्र ज़मानें से रहा करो
खुद से होकर लापरवाह भी रहा करो
कभी  चलो तो किसी अनजान रास्तों पर
कभी घूमों  तो किसी अनजान  बस्तियों में
कभी बन्द करके आंखे भी देखो इस जमाने को
गल्तियां करने का अपना ही मज़ा है .........३
सीखना अगर तुम चाहते हो
जीना अगर तुम चाहते हो
यूं ही चला करो नये  रास्तों पर
कुछ ठोकरें खा्ओगे व कभी गिरोगे भी तुम
लगती हैं  चोटें अगर तो लगने दो
पर है नहीं प्रश्र  रुकने का कभी
गल्तियां करने का अपना ही मज़ा है .........४
है यहां पर कौन जिंन्दा आदमी
जो यूं ही बना हो आदमी किसी काम का
गलतियां सिखा देती हैं खुद ब खुद
गलतियां दिखा देंती हैं राहें सही
दोस्त रिस्ते नाते चाहें वे हों करीबी
तुम्हारी गलतियां ही  करती हैं बेनकाब उनको
गलतियां करने  का अपना ही मज़ा है ........५
........

विजय भटनागर -
हम शीघ्र ही क्रोना से विजयी होकर
कुदरत के नजारे फिरसे देखेंगें।   
9224464712
जहां भी देखो,क्या दिलकश कुदरत का नजारा है
लगता है,रब ने सारा प्यार कुदरतको दे डाला है।
ये खुशबूदार पेड़,हंसते फूल, कलकल बहती नदियां
लगता है जैसे इनका कभी ,न,पड़ा गमों से पाला है।
ये कुछ नहीं करते बस हरदम तेरी इबादत करते रहते
शायद इन्हे देखने को खुद को तूने इंसा बना डाला है।
जाने क्यों लोग कुदरत से होकर  दूर, हो रहे मजबूर
कहते फिरते, क्यो खुदा ने हमें गम ही गम दे डाला है।
ये ऊचें मस्तकवाले पर्वत, ये झरने, ये सुंदर सुदंर झीलें
इन कुदरती नजारों ने हमको खुशी से पागल कर डाला है।
जगमग करते जुगनूं, मस्त चांदनी में विचरते लैला मजनूं
चांद बना, रात बना, हुस्न पे खुदा ने पर्दा डाला है।
विजय जर्रे जर्रे में तुझे देखता, पत्ते पत्ते में तुझे देखता
जीने का तूने उसे क्या नायाब नजरिया दे डाला है।
….....

सतीश शुक्ल -
दो जून
दो जून की रोटी की खातिर
छोड़ा अपना घर और द्वार
उसी की खातिर  भटके हम
फिर भी मिला हमे धिक्कार .
जा परदेस महल बनाये
और बनाये गली चौबारे 
जिनकी खातिर खटे हम
दिवस बासर साँझ सकारे .
वही है  मुँह फेरे
हमें बेघर कर
दुर्दिन  जब आये
कैसे दुर्भाग्य है हमारे .
आज हम लौटे है
अपनी धरा  पर
उसकी खातिर स्वेद बहाएंगे
नहीं लौटेंगे तुम्हरे स्वर्ग में
उसको की स्वर्ग बनायेगे
.......

दीपाली सक्सेना 
खारघर नवी मुंबई
वधू चाहिए
विवाह योग्य इकलौते पुत्र राधेश्याम का घर बसाने की जिम्मेदारी
सीताराम जी को लगती थी भारी हमने समाधान सुझाया कि विज्ञापन छपवा दो
वे बोले बेटा मेरा 25 साल का है बहन जी विज्ञापन आप ही बना दो
हमने भी पूरी लगन से बनाया विज्ञापन
25 वर्षीय स्वरोजगार, युवक हेतु शिक्षित, गृहकार्य दक्ष, मिलनसार, गोरी, सुंदर वधू चाहिए
देखकर विज्ञापन यूँ सुधार करवाया कि
शिक्षित बहू की हमें तो क्या जरूरत
हमें कौन उससे नौकरी करवानी है
डिग्रियों का क्या हम क्या अचार डालेंगे
हमारे बेटे को तो अनपढ़ ही चल जानी है.
गृहकार्य दक्ष की तो कोई जरूरत नहीं होटल से ही उसका खाना भिजवा देंगे हम
घर पर दिनभर करे आराम वो आलसी हो, कामचोर वह, भी चल जानी है.
सास होती जिंदा तब मिलनसार ठीक होता
पर मंगते पड़ोसियों को  तुम ना  जाने हो 
कभी कटोरी चीनी का मांगते हैं और कभी दूध वह
होगी मिलनसार तो बजट बिगाड़ देगी 
वह झगड़ालू होगी तो बनेगा घर जन्नत सा आने वाली पीढ़ियों को भी सुधार देगी वह.
गोरी और सुंदर की हमें तो जरूरत नहीं हम बाप-बेटे तो सुबह के गए देर रात आएंगे
उसके बाद का नजारा होगा रोज पड़ोसी सारे उसे तकने में लेकर जाएंगे
देख अकेला उसे मोहल्ले के आवारा लड़के लाइन मारने की होड़ में जुट जाएंगे
गोरी ना हो सुंदर ना हो यह गुण हमें तनिक भी ना भाएगे संशोधित विज्ञापन का हुलिया कुछ ऐसा है
आप जो पढ़ेंगे तो दंग रह जाएंगे - 
25 वर्षीय स्वरोजगार युवक हेतु अनपढ़, आलसी, कामचोर, झगड़ालू, काली-कलूटी कन्या चाहिए
आपकी नजर में हो तो आप ही बता दो
शादी में राधेश्याम  की आप भी लड्डू खूब खाएंगे
दूसरों का घर बस आने का जो नेक काम करो 
आप आपके  7 जन्मों के पाप धुल जाएंगे
..  ...


कुमकुम वेद सेन -
  एक नन्हे बालक की संवेदना
कविता का शीर्षक है
मां की सुंदरता
मां की गोद में बैठा बालक निहारता चेहरा मां का
मां तुम कितनी सुंदर हो
मां तुम दूध जैसी सुंदर हो
     तूतलाती बोली में बोला
     मां तुम रोटी जैसी सुंदर हो
       फिर बोला तुम चांद जैसी सुंदर हो
मां तुम लगाओ लिपस्टिक बिंदिया
मां तुम लगाओ बड़ी बिंदिया
मां तुम कितनी सुंदर हो
मां का प्रशंसक लाडला
 नाच रहा है मां के इर्द-गिर्द
मां तुम गांव ना गाना
मां मैं भी जाऊंगा
मां तुम कितनी सुंदर हो मां तुम कितनी सुंदर हो
मां के जैसा कोई टीचर नहीं
मां तुम बनकर टीचर मुझे पढ़ाओ
मां के जैसा कोई मित्र नहीं
साथ मेरे तुम खेलो मां
मां तुम कितनी सुंदर हो
पकड़कर मां का हाथ
चला पार्क में कहता बार-बार
मां तुम मुझको पकड़ो ना
मां तुम मुझको पकड़ो ना
  मां की ममता का मोल नहीं मां की ममता का मोल नहीं मां का प्यार अनमोल है
.....

 डॉ. अरविंद श्रीवास्तव' असीम' -दतिया मध्य  प्रदेश
मोबाइल 94 25726907
*दुख दर्द की आवाज*       
                    (नवगीत)
गांव की कच्ची गली से
 जब निकलता हूँ
 हर समय दुख दर्द की
आवाज सुनता हूं ।
            यह शिकायत खेत की
             फिर मेघ ने धोखा दिया
               उग सके कुछ खेत में
               यह हौसला कम कर दिया
                 मेढ से नजरें चुराकर
                   मैं खिसकता हूं
               गांव की कच्ची गली से •••
चरमराती चारपाई
रात भर रोती रही
और टूटी जूतियां
 कोने में  चुप सोती रही
 देख कर भूखा बुढ़ापा
मैं तड़पता हूं ।
गांव की कच्ची गली से      •••••
                हो गई है सांझ
                 बापू लौट कर कब आएंगे
                  दर्द की पीड़ा बहुत है
                   कब दवाई लाएंगे
                   इन दुखद अनुभूतियों से
                   मै नित गुजरता हूं
             गांव की कच्ची गली से •••••         
......

विजयकान्त द्विवेदी -
(. मोबाइल   8827186175,  9967424639)
छवि पर   एक श्रृंगारिक रचना
 दिवस का मार्तण्ड नहीं
किन्तु अभी "उजास " है।
है अभी लोहित  गगन
व्योम में भरा प्रकाश  है।।१!
प्रेम के पावन पंथ पर
है खड़ी वह  द्वार मेरे !!
समर्पिता, अनुरागिनी
है उसे ,जज्बात घेरे ।‌।२!
मन -मंदिर में है स्वागत
कामना  की उस कली का।
उर-उदधि हो बेचैन पाने
सान्निध्य ज्यो हिम-लली का।३!
आया हो मधुमास असमय
विपिन के झुलसे तरु-तल ।
है खड़ी वेतस -लता सी
ले प्रणय के भाव निर्मल ।।४!!
मंजुल-मसृण परिधान में
पीत सरसों के सुमन‌ सी ।
कनक सा कमनीय आभा
छरहरे सुन्दर वदन की ।।५!!
मौन मुख -सरोज -सौम्य
थे मुखर अन्तस औ नयन ।
प्रीति की  प्रतीति की वे
कर रहे सम्यक कथन ।‌।६!!
 संघर्ष क्षण में हौसला
कातरता में वह हुंकार है ।
जीत वह जिन्दगी की
वह गले की हार है।।७!!
......

राम प्रकाश विश्वकर्मा 'विश्व'*,
*कोविड, कोरोना और चीन*
कोविड-19 का यहां, बहुत कठिन है साल।
जाने क्यों लगता हमें, समय बड़ा विकराल।।
शहरों से लाखों लोग निकल पड़े गांव को।
नन्हे की खातिर मां तरस रही छांव को।।
कितने तो पैदल चल, भूखे हैं सड़कों पर।
छोटे बड़े अपनों संग बच्चे भी डगरों पर।।
शहरों के साथी सब, छोड़ चले गांव को।
पथरीली राहों पर, तरस रहे छांवों को।।
*ज्योति* पिता को ले चली, साइकिल पर दरभंग। 
गुरुग्राम से सात दिन, पिता मोहन भी दंग।।
बसें चली, रेल चली, आस उठी, पहुंच गए।
ट्रेन से दो-चार तो, अंतिम छोर पहुंच गए।।
दुनिया की कौन कहे, भारत के कई लोग।
इसके प्रभाव से तो, दुनिया ही छोड़ गए।‌।
खेल रहा है चीन अब, दुनिया भर के संग।
कोरोना फैला दिया, ये वुहान के रंग।।
*डोकलाम, गलवान* सब हैं, भारत के अंग।
दोष दिखा मत चीन अब कहत *हरिंदर सिंह*।।
.....


डॉ अलका पाण्डेय पर्यावरण -
धरा का आवरण फट गया
पर्यावरण खंड खंड हो गया !!
प्रदूषित हो रहा है प्रर्यावरण !
यही मानव के चिंता का कारण!!
प्रकृति  का करने लगे विनाश
धरा के लिये बना है अभिशाप !
ख़त्म कर रहे है देखो हरियाली
धधक रही है सूरज की प्याली !
प्रदूषण ओज़ोन परत को डँस रहा
दिन पर दिन बढ़ रहा नहीं कोई अंत !
आओ मिलकर प्रदूषण को रोके प्रकृति की करे रक्षा
वृक्षारोपण का प्रण ले , धरा की करे सुरक्षा !
प्रकृति का करे सम्मान हम , स्वच्छता का रखे ध्यान
हरित वसुधंरा की सुदंरता है , देश का अभिमान !
पेड की पेड कट रहे नहीं रही है कही छांव
कालोनियाँ कट रही है प्रकृति को देती घाव !
कंक्रीट के जंगल पनप रहे नहीं आयेगी खुशहाली
मरघट पर क्या पनपती है कभी भी हरियाली !
प्रकृति हमारी जीवन दाता , पाल पोष कर बढ़ा करती
आओ बचाए धरती माँ को साँसें वहीं देती !
हमें फ़ैसला करना होगा जन जन से वृक्षारोपण करवाना है !
देश को महामारी से बचानाहोगा
हरित क्रांति लानी है !
प्रदूषण को रोक कर करेंगे इसका सम्मान !
नहीं होने देंगे अब हम धरा का ज़रा भी अपमान !!
.......


विजया वर्मा :
 *जीवन कल आज और कल*
कोरोना से जूझ रहे थे
     इसके संग जीना सीख रहे थे
   लॉक में थे , अनलॉक हो गए
      खतरे आशंकाएं और बढ़ गए
 मानो पंछी के पंख काट
      कह दिया उस उड़ जाने को
हिम्मत बटोर कर , धीरज धर कर
       आगे बढ़े चले थे हम
बांट जोहते वर्षा ऋतु की
     बैठे हुए घरौदो में थे सहसा
चक्रवाती निसर्ग ने दस्तक दी आकर,
  टूटे सपने ,आंख मिच कर
      और जुटाई हिम्मत कुछ
 साहस करके खेल गए हम
      विपदाओं के ये भी पल
चीनी धमकी, धरा का कम्पन
   सभी डरा रहे थे  प्रति पल
किन्तु समय की धारा के संग
      हमने जीना सीख लिया
क्षण भंगुर इस जीवन में
   नहीं जिएंगे डर डर कर
जंग लड़ेंगे और जीतेंगे
    यह विश्वास रखें मन में
परीक्षाओं की इस विषम धड़ी में
   इतने क्यों मायूस हो हम
विपदाओं से हांथ मिलाकर
   प्यार से जीना सीखें हम
घर के छोटे छोटे गमलों में
   कलम लगा के बीज रोप के
पर्यावरण दिवस मना लें हम
  हरी चुनरी ओढ़ी धारा को
देख देख  हरशाएं हम
    मान रखें , सम्मान रखें
कर्मठ वीरों का ध्यान रखें
   कोरोना के इस महा युद्ध में
 मन में ये विश्वास रखें
   जीत जाएंगे हम
      गर सभी संग है
जिदंगी हर कदम
        इक नई जंग है
......

डा.रामस्वरुप साहू 'स्वरुप'
9323538010
लाचार गरीबी-
बेबस कितनी लाचार गरीबी ,
पैसे पैसे को मोहताज गरीबी,
खेतों में धन धान्य उगाती ,
रेल सड़क नये बांध बनाती,
फिर भी पेट नहीं भर पाती ,
दुनिया का अभिशाप गरीबी।
   सड़क नदी फुटपाथ किनारे,
   मंदिर मस्जिद गिरजे गुरु द्वारे,
   चिपकी रोज नजर आ जाती,
   कहीं भीख मांगती  मन मारे,
   झोपड़ियों में पली-बढ़ी यह,
   जीवन का उपहास गरीबी।
हर अन्याय पर आंसू बहाती
सुख-दुख के गम पी जाती
गुजर बसर जीवन की आशा,
प्रेम मृदु व्यवहार की भाषा,
चिथड़ो में लिपटी शर्मसार,
हिंदू ना मुसलमान गरीबी।
   लाती दुनिया में खुशहाली,
  सारे जग की करती रखवाली,
   कर्म भाग्य दो सरित किनारे,
   बीच में बहते कर्मों के धारे,
   अंबर ओड़न धरती बिछावन,
   अभावों का अंबार गरीबी।

......
दिलीप ठक्कर "दिलदार"
  गजल
आंख से अश्क गिराया ना करो,
हाले दिल सबको सुनाया ना करो!
बात दिल की जुबां पे ला भी दो ,
अंदर अंदर ही दबाया ना करो!
ऐक सा वक्त नही रहता कभी,
किसी निर्बल को सताया ना करो!
अपने  पलकों पे सजा लो मुझको,
अपनी नजरों से गिराया ना करो!
वो भी है यार तुम्हारी ही तरह,
अपनी ताकत से दबाया ना करो !
मन की बगिया मे लगा दो पौधे,
फूल ख्वाबों में खिलाया ना करो!
जो भी है हाथ में देदो "दिलदार",
यूं इसे आप छुपाया ना करो!
.....

चंदन अधिकारी
कोरोना विजयी
जो कुछ आज है वह कल को गुज़र जायेगा
वक़्त की धार में सब कुछ बह जायेगा
कल कल हो गया आज भी  कल हो जायेगा
वक़्त की मुट्ठी से सब कुछ फिसल जायेगा /
आयेंगी मुश्किलें मगर बुरा वक़्त गुज़र जायेगा
दुःख के जख्मों पै सुख  का मलहम फरक लाएगा
कल सुनहरा होगा मेरा  ये जज़्बा असर लाएगा
उम्मीद पै दुनियाँ जीती है फलसफा असर लाएगा /
चिलचिलाती धूप में चलते  छायादार वृक्ष आएगा
थकान से चकनाचूर तुम्हें शीतल पवन सहलायेगा
तलवों में उभरे छालों को विश्राम औषधि सुखायेगा
मैं घर जरूर पहुंचूंगा ये  जज़्बा तुम्हें घर पहुंचाएगा /
ये भारत  माँ के लाल बेबसी का वक़्त गुजर जायेगा
ये बुरे दिन फिर जायेंगे अच्छा वक़्त  जरूर आएगा
तुम जरूर घर पहुंचोगे करोना कुछ न कर पायेगा
तुम्हारे जीवट के सामने करोना  घुटने झुकायेगा /
......

डा० हरिदत्त गौतम "अमर" .
गगन प्रभंजन, भू में कम्पन, सागर में तूफान
कोरोना को रोना दिशि दिशि करता दिल हलकान---
साॅंय साॅंय कर प्रलय हवाएँ टिन छत हुईं पतंग
टूट टूट कर पेड़ गिर रहे रोतीं सड़कें तंग
दीपक की लौ जैसे थर-थर बड़े-बड़े जलयान---
लहरें उछल चूमतीं नभ को, तटबंधों को तोड़
कार ट्रकों को उलट गिरातीं,तट के भवन झिंझोड़
अन्धड़ बरसा, ले ज्यों फरसा परशुराम गतिमान---
काॅंच दिवारें, खिड़कीं काॅंपें ज्यों गुण्डों के बीच
चीरहरण देखते युगपुरुष कायर आँखें मींच
धर्मराज, देवव्रत,सूरज, इन्द्र पवन-संतान---
मारे मारे से मछुआरे,घर वे मटियामेट
काट काट तन पेट, उधारी माॅंग कबाड़ समेट
निर्धन किस्मत के मारों का नहीं कहीं भगवान?---
धड़ धड़ अन्धड़, फिर फिर हल्लन,नये नये तूफान-----
.....

अशोक वशिष्ठ
● खरी-खरी ● कुण्डलियां
(एक)
ध्यान रखो यदि जान है , तब ही मिले जहान।
थोड़ी सी भी चूक से , पहुँचोगे शमशान ।।
पहुँचोगे शमशान ,    न कंधा कोई देगा।
जो ज़िंदा रह जाय , वही सब सुख भोगेगा।।
मानो तुम सारे नियम , तबहिं बेचेगी जान।
कोरोना से बचोगे ,   अगर रखोगे ध्यान।।
(दो)
एक अदना-सा वायरस , दिखा गया औकात।
थर-थर-थर काँपने , लग गयी आदम जात।।
लग गयी आदम जात , मौत का भय जो छाया।
भूल रहा सब तेरा , ही है किया - कराया।।
विश्व विजेता बनता है , पर है इतना-सा ।
थर्राता है छू ले वायरस , एक अदना-सा।।
(तीन)
राम भला कब होएगा ,  कोरोना का अंत ।
विश्व समस्या बन गया , यह तो बहुत ज्वलंत।।
यह तो बहुत ज्वलंत , दिखाई यह नहीं देता।
छिप कर करता घात , प्राण जल्दी हर लेता ।।
दुनिया थर-थर काँपती,  सुन कोरोना नाम।
अभय दान सब माँगते , भली करो हे! राम।।
.....

हनीफ मोहम्मद -
अब तो हालात बदले हैं।
नहीं मेरे खयालात बदले हैं।।
लकीर का फकीर ना रहा कभी।
वक़्त के साथ जज्बात बदले हैं।।
ज र आलूद फिजा में जीना मुस्किल।
करोना ने हमरे त्सौरात बदले हैं।।
 ....

सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव -
हम हैं दुनियां जीतने वाले,
कोरोना को भी जीतेंगे।
आओ मिलकर खुशी मनायें,
अब तक हम ही जीते हैं।
 सबसे बढ़कर श्रद्धांजली उनको,
जिन्होंने कर दी जान निछावर,
सेवा करते करते अलविदा कहगये।
भाई, बहिन, नर्सेज, डा. और जांबाज सिपाही।
.........

  वन्दना श्रीवास्तव -
श्रमिक देवता रूठ गए हैं!
अब भीतर तक टूट गए हैं!
उदासीनता तिरस्कार लिए,
ये श्रम के अवधूत गए हैं!!
नदियों के रुख को मोड़ा था,
पत्थर मुट्ठी से तोड़ा था!
जग को छत देकर खुद,
रवि को वितान सा ओढ़ा था!!
लेकिन सारे साहस को अब,
रोटी के छलिया लूट गए हैं।
सब के सपनों को पंख दिए,
खुद पर ही सारे दंश लिए!
अपनी निष्ठा और मेहनत पर,
कठिन बहुत अनुबंध किए!
वक्त था ये अभिनन्दन का,
विस्मृति के सब तट छूट गये हैं!!
श्रमिक देवता रुठ गए!!
नाखूनों से जोत जोत कर
खेतों में फसल उगाई थी!
स्वेत कणों से सींचा था,
तब सबकी थाली आई थी!
वो दो रोटी को तरस रहे,
अब सारे धीरज छूट गए हैं!!
श्रमिक देवता रूठ गए हैं!!
चल दिए विकल मन लिऐ हुए,
आंसू का दरिया पिए हुए !
हर रस्ते पर ये चेहरा है,
सूनी आंखें, लब सिए हुए !
लम्बे रस्ते, कंकड़-पत्थर,
पांवो के छाले फूट गए हैं!!
श्रमिक देवता रूठ गए हैं!!
.....

नेहा -
छन छना छन जैसे मीठी पैंजनी के स्वर।
याद तेरी आज फिर से आई मेरे घर।।
1.याद तेरी जैसे किरणों का बसेरा,
आ गई जीवन में करने को सवेरा
हो गया फिर से रुपहला दिल का ये अम्बर।
याद तेरी आज फिर से आई मेरे घर।।
छन छना छन...
2.याद है या इक खजाना
ताल,सुर,लय का,
गा उठा मन गीत फिर से
प्रीति की जय का,
मौन मन की ज बांसुरी में प्रीत के स्वर-भर।
याद तेरी आज फिर से आई मेरे घर।।
छन छना छन...
.....

अशोक 'यारनिर्विकार' -
जिन पत्तों में नमी बचेगी
पेड़ पर वे रह जाएंगे
शेष हवा के साथ गगन में
दूर कहीं उड़ जाएंगे
विधि का है यह खेल अनोखा
सम सब पे यह देता न धोखा
सांठगांठ ना अनबन इसकी
एक दृष्टि है सब पर जिसकी
बचे रहेंगे झंझावाती तेज हवा से
वृक्ष जो झुक जाएंगे
जिन पत्तों में नमी बचेगी
पेड़ पर वे रह जाएंगे
शेष हवा के साथ गगन में
दूर कहीं उड़ जाएंगे
भांति-भांति पृथ्वी का दोहन
क्यों न थके है, ये मानव मन
पाषाण युगीन आखेट खेलते
कीर करि केहरि मृत्यु झेलते
यूं ही सब कुछ चलता रहा तो
निरंतर क्रम यही, बना रहा तो
नरक बनेगी धरनी समूची
द्वार स्वर्ग के पट जाएंगे
जिन पत्तों में नमी बचेगी
पेड़ पर वे रह जाएंगे
शेष हवा के साथ गगन में
दूर कहीं उड़ जाएंगे
त्रुटिपूर्ण दोष का मढ़ना,
प्रकृति पर
घाव बहुतेरे हमने रोपे,
प्रकृति पर
क्षमा मांग कुछ प्राश्चित कर लें
नयनों में कुछ अश्रुजल भर लें
तब संभव है पाप घटेंगे कटना
पेड़ जो रुक जाएंगे
जिन पत्तों में नमी बचेगी
पेड़ पर वे रह जाएंगे
शेष हवा के साथ गगन में
दूर कहीं उड़ जाएंगे
......

सेवा सदन प्रसाद -
बदलाव
पता नहीं क्यों
अब पत्नी ये नहीं कहती --
 इतनी रात तक
 कहां  थे   आप  ?
 बेटा - बेटी भी
  यही कहता ---
   डैडी सदा हैं साथ
    बन कर के  बाप ।
    आधुनिक युग में
     लोग भूल रहे थे
      दिन- रात अब करते
       राम नाम का जाप ।
       पत्नी  बाथरूम में
        किचन में  पति
         हाथ धुलता  रहता
          कहीं नहीं दीखता छाप।
            हर पल
             सारा परिवार
               जांचते  रहते--
               एक - दूसरे का ताप ।
               जो करेगा
                लापरवाही या ढिलाई
                  उसे लग जायेगा
                   कोरोना  का श्राप ।
                     $$$$SSSSS$।

   .......

प्रकाश चन्द्र झा -
*श्रमिकों का पलायन *
 $$$ लौट के आना मगर जरूर $$$
घर जाने को मन करता है,
कष्ट भी हुआ  तुम्हें भरपूर.
राह   तुम्हारी   हम देखेंगे,
लौट के आना मगर जरूर.
किसे पता यह घातक विषाणु,
यूँ  बनके    कहर    टूटेगा.
लाखों लाख श्रमिक जनों का,
अपना  प्यारा  शहर   छूटेगा.
संक्रमण  का  विस्तार  हुआ,
जाने   कैसे   यह   भूल  हुई.
मिलजुल कर सब साथ में रहते,
बात   यही   प्रतिकूल   हुई.
यह काल विषम विकराल हुआ,
आखिर  किसका  कहें   कसूर.
राह  तुम्हारी  हम  देखेंगे,
लौट के ------
इसी शहर की गलियों में ही,
सपने    तेरे    साकार    हुए.
मिट्टी, पानी, हवा  यहीं की,
सब धूप- छाँव स्वीकार हुए.
जी तो करता है  रख लें हम,
तुम्हें लगा कर निज सीने से.
सींचा है इस  चमन को तूने,
नित  अपने  खून पसीने से.
हुनर  पे  तेरे  नाज हमें  है,
है  तुम सब  पर हमें गुरूर.
राह  तुम्हारी  हम  देखेंगे,
लौट के -----
यह  विषाणु  बड़ा विचित्र है,
लाखों   लोग   बीमार  हुए.
दवाई  पर  शोध  है   जारी,
अब तक मौत कई हजार हुए.
एक उपाय  सामाजिक  दूरी,
वायरस  पर   लगे  लगाम.
रोक  लगी  आने जाने पर,
काम धंधों पर लगा विराम.
रोजी -  रोटी के  लाले पडे़ ,
हुए  तुम  जाने को मजबूर.
राह   तुम्हारी  हम  देखेंगे,
लौट के ------
तुमसे थी  रौनक  शहर की,
थी    शोरगुल   बाजारों में.
वीरानी  अब  उतर  पड़ी  है,
मंदिर मस्जिद औ मजारों में.
चहल - पहल  अब हुई नदारद,
कम  दिखते लोग  कतारों में.
छोले  चाट   गोलगप्पे  कहाँ,
ताले  पडे़   बीयर  बारों  में.
यह  शहर  कभी  सोता नहीं,
बनाया  कितनों  को  मशहूर.
राह  तुम्हारी   हम   देखेँगे,
लौट के -----
परिवर्तन है  नियम  जगत का,
यह  तिमिर  भी  छँट जाएगा.
मुश्किल  का  यह  दौर  सही,
ये  वक्त  भी तो  कट जाएगा.
निकलेगी  फिर  शोर  सुहानी
उन   बंद   पड़ी  मशीनों  से.
मस्ती   के   मौसम  लौटेंगे,
जो  शिथिल  पडे़  महीनों से.
महफिल में फिर छलकेगा जाम,
चढ़ेगा   फिर   से   वही   शुरूर.
राह   तुम्हारी   हम     देखेंगे ,
लौट के --------
यहाँ  मुंबा  देवी  का  आंचल,
वहाँ   पावन   गंगा    माता.
जन्मभूमि  और  कर्मभूमि में,
देवकी   यशोदा   सा  नाता.
दोनों तुम्हें प्राणों से प्रिय हैं ,
उन चरणों में शीश नवाता.
भय का जो माहौल बना है,
इसमें   तेरा   जी   घबराता.
खींच रही  है  माँ की ममता,
पुकारती  राखी  और  सिंदूर.
राह   तुम्हारी   हम  देखेंगे,
लौट के ------
.....

किशन तिवारी,  भोपाल -
कब कहां फैसला हुआ  कैसे
कोई छोटा  बड़ा हुआ कैसे
ये जमी आसमा हवा सब की
इन पे हक आप का हुआ कैसे
साथ सच्चाइयो का दे लेकिन
कोई इन्सा बिका हुआ कैसे
खून पीने का है नशा जिसको
मय से उस को नशा हुआ कैसे
जो है मुजरिम यहाँ वही सबसे
पूछता हादसा हुआ कैसे
.....

हेमंत दास 'हिम' -
हास्य केविता / कोरना काल में झगड़ा
कल पड़ोसी ने मुझसे झगड़ा किया
1 मीटर की दूरी पर रहते हुए
जब उसे गाली देने का मन हुआ
तो अपने दोस्त से मांगे हुए एन95 मास्क लगा लिया
फिर घूँसेबाजी के ख्याल से पहन लिया मोटा ग्लव्स
फिर सोचा कि मेरे जैसे दुष्ट का कोई भरोसा नहीं
सो पूरा पीपीई किट ही पहन लिया
यूँ मैं किसी आदमी से नहीं डरता
पर उस नकाबपोश भूत को देखकर थरथर कॉप उठा
सच कहता हूँ मेरा तो बुखार ही चढ़ गया
अब उसने झगड़ा शुरू करने के पहल
लेजर डिवाइस से मेरा टेम्परेचर लिया
फिर कहा कि शैतान कहीं का !
टेम्परेचर 98डिग्री से बढ़ाकर आया है
वरना तेरी हड्डी पसली तोड़नेवाला था मैं
फिर मुझे कुछ टेबलेट्स देते हुए कहा- ये हाइड्रोक्लोरोक्विन है।
बिना चिकित्सीय सलाह के एलाउड नहीं है
पर में डॉक्टर हूँ तो तू मेरे कहने पर खा सकता है।
में आश्चर्यचकित था कि कोरोना ने तो
झगड़े का रूप ही बदल दिया था।
.........

अनिल पुरबा-
अररे ओ सांभा”. 
अररे ओ साभा, 
लॉकडाउन कब खुलेगा रे, 
कब… कब… कब….
पता नहीं सरकार, 
इस बार हमका भी कोई खबर नहीं, 
लॉकडाउन खुले तो मुश्किल बा, 
नहीं खुले तबहू मुश्किल बा, 
करिये तो का करियें. 
अररे ओ सांभा, 
यहाँ से पचास कोस दूर, 
गाँव में क्या हाल है रे…
पता नहीं सरकार, 
आंकडे कम होते नज़र नहीं आ रहे, 
लोगबाग अपनी हरकतों से बीमारी फैला रहे. 
अररे ओ सांभा, 
ठाकुर और बसंती की
कोई खबर….
पता नहीं सरकार, 
ठाकुर अपनि हवेली में क्वारंटाइन में है, 
और बसंती वीरू के साथ क्वारंटाइन में है.
अररे ओ सांभा, 
कालिया गया था रामगढ, 
कुछ राशन-पानी मिला…
पता नहीं सरकार, 
बाकि सब तो मिल गया पर नमक नहीं मिला, 
कहता है हम सबको गोली खिलायेगा .
अररे ओ सांभा, 
मोगाम्बो और शाकाल को बुलाया था, 
उनका का हुआ रे….
पता नहीं सरकार, 
हमारे बन्दे उनके अड्डे गए रहे, 
और जबसे लौटे हैं, बेंतेहा खांस रहे…
अररे ओ सांभा, 
क्या उनको भी कोरोना 
संक्रमण हो गया रे….
पता नहीं सरकार, 
कितने आदमी थे,
दो सरकार, 
दो थे, फिर भी वापस आ गए, 
कोरोना लेकर, 
मास्क नहीं पहना था क्या, 
क्या समझ कर आये थे, 
के सरदार बहुत खुश होगा, 
शाबाशी देगा क्यों…
अररे ओ सांभा, 
इसकी सज़ा मिलेगी…
बराबर मिलेगी…
क्या सरकार…
पहले से ही बीस बीस गोलियां खा रहे है, 
आप भी न सरकार सठिया गए हो…
अररे ओ अनिल पुरबा, 
उठा तो ज़रा बन्दूक, 
और लगा निशाना इस गब्बर पर…
डीश्कियों…
डीश्कियों…
डीश्कियों…
…..


चंद्रिका व्यास,  खारघर ,नवी मुंबई मोबाइल - 8779614233
विषैली गंध
सांसे हो रही है कम
आओ पेड लगायें हम
(1) महानगर के बादलों में / कैसी है यह धुंध
विष बन रही है अब तो /  अमृत की हर बूंद !
(2) उपर ,
विष से भरा फलक है /  नीचे प्रदुषित है हवा
तारे भी हैं , /  अब व्योम से ओझल /  सुधाकर भी लुप्त हुआ !
(3) हैरान है अब प्रकृति भी /  क्यों अक्ल इन्हें नहीं आती
जिस डाली पर बैठा है / काट रहा है उसको !
(4) रसा हुई अब तार तार
इस जननी को छोडो /  प्राण वायु देते हैं जो वृक्ष
उनको तो न तोडो !
(5) स्वर्ग से सुंदर धरा न ढ़क दे
तुम्हारे , /  भौतिक सुख का यह धुआं
विग्यान के वरदान को /  अभिषाप बना ,
मानव तु कैसे दानव हुआ !
(6) समुद्र-मंथन से निकले विष का
नीलकंठ ने पान किया /  भौतिक-मंथन के विष को पीने
अब न आयेगा कोई /  डमरु धारी विष पीने को !
(7) प्रकृति के विरुद्ध जाओगे
कुछ न बचा पाओगे / तो ,
आओ पेड़ लगायें हम /  सांसे हो रही है कम !
(8) जगह जगह हम पेड़ लगायें
वसुंधरा को हरित बनायें /  उत्कृष्ट उपवन को लहरायें
शीतलता संग अमृत बरसायें !
(9) आओ हम सब दृढ़-संकल्प करें
समुद्र-मंथन से मिले अमृत को दे /  मां पृथ्वी को विष मुक्त करें !
सांसे हो रही है कम /  आओ पेड़ लगायें हम !
......


पुरुषोत्तम चौधरी 'उत्तम',  मुम्बई !
जीवन ... भूल-भुलैया
चहुँ दिशि संकट घोर खड़ा है,
पर मानव मन मोह बड़ा है।
छल-प्रपंच से बाज न आता -
जबकि तन मिट्टी का घड़ा है।।
तेरे सर जो ताज पड़ा है ,
मन पक्षी को ले वो उड़ा है ।
उर में अपने झाँक जरा अब-
मनमानी पर व्यर्थ अड़ा है ।।
तुझमें क्यूँ संताप जड़ा है,
स्वजनों से बेवजह लड़ा है ।
नभ मंडल के दर्पण में तू -
लुटा-पिटा अधनंग खड़ा है ।।
तेरे मन जो बीज गड़ा है,
अन्तर्मन से खूब लड़ा है ।
भूल-भुलैया से बाहर ला -
माना पहरा बहुत कड़ा है ।।
......

उमेश राही -
जीवन में तुम आये अतिथि बनकर
लौट कर गये, फिर तुम नहीं आये!
श्याम पट पर लिखा नाम, सांस की कक्षा
तुम्हारा आना न आना, तुम्हारी इच्छा!
कहानी कह रहीं तुम्हारी, हैं तितलियाँ
यह मधुमास के दिन, करते हैं प्रतीक्षा!
नयन में दूजा नहीं, तुम समाये
लौटकर गये, फिर तुम नहीं आये!
जीवन को दे गये तुम, नीर अमृत का
दे नहीं गये तुम, मंत्र कोई विस्मृत का!
पौध तुलसी की तुमने लगायी, व फली
तुम्हारे नाम पर लिखा है,नाम कृति का!
हर कहीं , तुम्हारे ही गीत गाये
लौटकर गये ,फिर तुम नहीं आये!
यह भी नहीं कहा तुमनें, है विवशता
याद आती है हमे ,तुम्हारी सरलता!
रुठ कर गये हो, या गये भूल मुझकों
कभी तुमने सोचा भी, मेरी विकलता!
आंख मे आंसू , सपन थे सजाये!
लौट कर गये, फिर तुम नहीं आये!
..........

विश्वम्भर दयाल तिवारी -
महक
सुमनों से सौरभ उड़ता रहे
तो गृह-पथ-उपवन महक चले ।
सुबह-शाम अभिराम नजारे
दिशा सुगन्धित पवन पुकारे
भय बिन तितली उड़ती रहे
तो शान्ति-सुरक्षा महक चले ।
मेहनत माली की रंग लाती
पुष्पित डाली फलित सुहाती
कुल-दल-सुमन खिलते रहें
तो गृह-पथ-उपवन महक चले ।
सुन्दर सुरभित सुमन शाख पर
खिलते हिलते मुदित डाल पर
वीरों के पग-तल बिछते रहें
तो गृह-पथ-उपवन महक चले ।
ऋतुओं का व्यवहार निराला
स्वच्छ नेह मन सुमति उजाला
दूर प्रदूषण होता रहे
तो गृह-पथ-उपवन महक चले ।
कभी न उजड़े उपवन अपना
कभी न टूटे माली का सपना
पंछी कलरव करते रहें
तो गृह-पथ-उपवन चहक चले ।
वीर सपूतों का अभिनन्दन
भारत माता का नित वन्दन
प्रगति पुष्प महका दें जीवन
धर्म सुकर्म की जयति फले ।
........

रपट के प्रस्तुतकर्ता - हेमन्त दास 'हिम'
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

































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